विचार

विकास का अनर्थकारी मॉडल

मानव विकास रिपोर्ट (1996) ने विकास के वर्तमान मॉडल की कमियों को उजागर करते हुए कहा था कि इसने हमें रोजगारविहीन, निष्ठुर, मूक, जड़हीन और भविष्यहीन विकास। अत: आज आवश्यकता है कि हम विकास के इस अनर्थकारी मॉडल के चौखटे से बाहर निकलकर किसी अधिक संतुलित विकास मॉडल के बारे में सोचें।

ब्रह्माण्ड और सृष्टि

दृष्टि और सृष्टि से परे सौरमण्डल हो सकता है। हमारा ब्रह्माण्ड कहा जा सकता है। इसी की सृष्टि अर्थात् हमारी वर्तमान सृष्टि के आविर्भाव, जन्म, विस्तार, विकास, निर्माण, प्रकटता के बारे में और सृष्टि के सिकुड़न, ध्वंस, क्षय, नाश इत्यादि के बारे में विद्वानों का ध्यान हमेशा से रहा है। पौराणिक व आधुनिक विचारों का […]

धार्मिक स्थलों और यात्राओं के प्रति सरकार संवेदनहीन क्यों?

भारत का राज-प्रबंधन धर्मनिरपेक्ष है। संविधान में इसकी जो व्यवस्था की गई है उसका मकसद आईने की तरह साफ है कि सरकारें शासन व्यवस्था के वक़्त किसी धर्म विशेष से जुड़ने के बजाय सबको सामान मानेंगी। सभी धर्मों से जुड़े लोगों को यहाँ अपनी-अपनी आस्था के अनुरूप जीने की आजादी है। हिमालय की उत्तंग बर्फीली […]

स्वामी विवेकानन्द के सेवायोग का मर्म समझिए

हमारे विवेचन का विषय सेवा का उद्गम नहीं, बल्कि सेवा का सिद्धांत अथवा सेवायोग Calzoncillos Calvin Klein Baratos है। ये दोनों विषय पूर्णतया पृथक हैं। हृदय की परिपूर्णता, प्रेमातिरेक, सहानुभूति तथा दया से ही सेवा की उत्पत्ति होती है। स्वामी विवेकानंद ने विश्व की जो सेवा की थी, इस दृष्टि उत्पत्ति मानव के दुःख दर्द […]

असफल और असंगत होते जा रहे हैं विकास के मौजूदा मॉडल

औद्योगिक क्रांति की शुरुआत पूंजीवाद के साथ हुई और इसी से मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था का प्रदुर्भाव हुआ। आर्थिक क्षेत्र में हस्तक्षेप न करने की इस नीति का मानना है कि बाजार में स्वतंत्र और पूर्ण प्रतियोगिता के सहारे अधिकतम सामाजिक कल्याण के लक्ष्य को पाया जा सकता है। किंतु अनुभव यह बताते हैं कि यह […]

इस बार नहीं जागे, तो बहुत पछताएंगे

इस बार दीपावली पर्व की गहमागहमी के साथ चुनावी गहमागहमी भी रहेगी। दीपावली पर्व प्रतिवर्ष निश्चित समय पर ही मनाया जाता है। लेकिन चुनावों का मौसम अब निश्चित नहीं रहा। बेमौसम वर्षा की तरह कभी भी होते हैं। दीपावली घर की साफ सफाई का पर्व है और चुनाव पर्व है राजनीतिक साफ-सफाई का। कोई भी […]

1984: भारतीय इतिहास का काला वर्ष

समकालीन भारत के इतिहास में सन् 1984 निश्चित ही सबसे अशांत वर्ष के तौर पर रहेगा। इस वर्ष उत्तरी भारत में ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत विध्वंसक सिख दंगों Golden Goose Francy Pas Cher और मध्य भारत में विपत्तिपूर्ण ओलियम गैस लीक से पूरा भारत दहल गया। यह वे घटनाएं थीं, जिनका अंत हजारों लोगों […]

आम्बेडकर और राज्य केंद्रित समाजवाद

भारतीय कृषि की उत्पादकता कैसे बढ़ाई जाए, इस बात को लेकर अर्थशास्त्री और योजनाकार हमे शा उलझन में रहे हैं। वर्तमान समय में उद्योगों और सेवाओं में जिस तेजी से वृद्धि हुई है उसकी तुलना में कृषि में हुई वृद्धि जबर्दस्त तरीके से असंगत है। कृषि में 3 प्रतिशत से भी कम की दर से […]

महिषासुर के नाम पर समाज में जहर फैलाने का षड्यंत्र

धीमा जहर कैसे फैलाया जाता है और मिथक कथाओं के माध्यम से सर्वदा विद्यमान जातिगत खाइयों को किस तरह चौड़ा किया जा सकता है, इसका उदाहरण है इन दिनों महिषासुर पर चलाई जा रहीं कुछ चर्चाएं। बस्तर में सिपाहियों की शहादत पर दारू छलका कर जश्न मनाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में कुछ वर्षों […]

अर्थव्यवस्था का निकला दम, उम्मीद के सहारे हम

आज भारत की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से चरमरा गर्इ है, जिसने सबको हैरान कर दिया है। इसमें सुधार के लिए न तो आरबीआर्इ की ओर से कोर्इ उम्मीद है, जिसकी वर्तमान स्थिति के प्रति चिन्ता नाममात्र की है और न ही सरकार की ओर से कोर्इ उम्मीद है जिसके पास कोर्इ उपाय नहीं है और […]