विचार

हिन्दू चेतना में बहुलवाद के तत्व नहीं हैं

औरंगजेब के गोलकुण्डा को मुगल साम्राज्य में शामिल करने से पहले सन् 1683 में गोलकुण्डा के अंतिम शासक अबू हसन के एक ब्राह्मण प्रधानमंत्री अक्कना ने डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के एक कर्मचारी माइकल जैस्जुन को कहा था, “तुम स्वयं कल्पना कर सकते हो कि कौन-सी सरकार राजा की उत्तम सेवा कर सकती है, ‘हमारी’ […]

कैसा हो नववर्ष हमारा?

अभी हाल ही में एक खबर आई कि क्रिसमस और नए साल के जश्न में सराबोर कुछ युवक गाजियाबाद की सडकों पर हुडदंग करते हुए पकडे गए। बताया गया कि पकड़े गए सभी युवक अच्छे घरों से संबंध रखते हैं। 12वीं कक्षा से लेकर एमबीए डिग्रीधारी 22 से 25 वर्ष के ये छात्र शराब के […]

औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त शिक्षा प्रणाली

शिक्षा प्रणाली का अर्थ है शिक्षा देने की पद्धति।समकालीन शिक्षा प्रणाली अर्थात शिक्षा का वह ढंग जो आज कल हमारे स्कूलों और कॉलेजों में प्रचलित है।कहने की आवश्यकता नहीं कि आज जिस रीति से हमारे कॉलेजों में शिक्षा दी जा रही है वह भारतीय रीति नहीं है, अंग्रेजों के शासनकाल में इस प्रणाली का आरंभ हुआ […]

भयभीत करती है किचलू की ताजपोशी

दिल्ली में आप के सरकार बनाने और न बनाने की बहस में जब मीडिया उलझी थी, जम्मू-कश्मीर में परदे के पीछे कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी। किश्तवाड़ की हिंसा की जांच के लिए बनाये गये एक सदस्यीय आयोग ने अपनी अंतरिम जांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी और आनन-फानन में सज्जाद अहमद किचलू को […]

खून भरी ‘लाल क्रांति’ का असली चेहरा यही है

कौन था नेमीचन्द जैन? कौन है यह सांई रेड्डी?…..छोड़िये इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन पत्रकार मरा है? दूकान खुली है और दिल्ली में ग्लोबलाइजेशन के लिए लॉन्चिंग पैड है बस्तर। यहां बड़े-बडे विश्वविद्यालय हैं, जहाँ बौद्धिकता के नाम पर सिगरेट उंगलियों में फँसा कर दाढ़ी वाले डिबेट करते हैं या बस्तर में सुरक्षा […]

राष्ट्रीय एकीकरण की राह में रोड़ा है अनुच्छेद 370

जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का वैसे ही अभिन्न अंग है जैसे कोई भी अन्य राज्य। जम्मू-कश्मीर का प्रत्येक निवासी भारतीय नागरिक है और उसे वे सभी अधिकार हासिल हैं जो भारत के किसी भी नागरिक को हैं। संविधान का कोई भी प्रावधान उसे मौलिक अधिकार प्राप्त करने से रोक नहीं सकता। अगर अनुच्छेद 370 की आड़ […]

कथा-संस्कृति के बदलते सोपान

भारत संसार का प्रथम और सर्वश्रेष्ठ कथापीठ रहा है। कहानी-कथा के माध्यम से शिक्षा, राजनीति, मानवशास्त्र और जीवन, जीव जगत के हर पहलू पर सम्यक विवेचना की जाती है। पंचतंत्र अद्भुत उदाहरण है। सभ्यताओं के अस्तित्व और टकराहट भी कथाओं के माध्यम से जानी और समझी जा सकती है। वैदिक साहित्य विश्व साहित्य के प्राचीनतम […]

विकास का अनर्थकारी मॉडल

मानव विकास रिपोर्ट (1996) ने विकास के वर्तमान मॉडल की कमियों को उजागर करते हुए कहा था कि इसने हमें रोजगारविहीन, निष्ठुर, मूक, जड़हीन और भविष्यहीन विकास। अत: आज आवश्यकता है कि हम विकास के इस अनर्थकारी मॉडल के चौखटे से बाहर निकलकर किसी अधिक संतुलित विकास मॉडल के बारे में सोचें।

ब्रह्माण्ड और सृष्टि

दृष्टि और सृष्टि से परे सौरमण्डल हो सकता है। हमारा ब्रह्माण्ड कहा जा सकता है। इसी की सृष्टि अर्थात् हमारी वर्तमान सृष्टि के आविर्भाव, जन्म, विस्तार, विकास, निर्माण, प्रकटता के बारे में और सृष्टि के सिकुड़न, ध्वंस, क्षय, नाश इत्यादि के बारे में विद्वानों का ध्यान हमेशा से रहा है। पौराणिक व आधुनिक विचारों का […]

धार्मिक स्थलों और यात्राओं के प्रति सरकार संवेदनहीन क्यों?

भारत का राज-प्रबंधन धर्मनिरपेक्ष है। संविधान में इसकी जो व्यवस्था की गई है उसका मकसद आईने की तरह साफ है कि सरकारें शासन व्यवस्था के वक़्त किसी धर्म विशेष से जुड़ने के बजाय सबको सामान मानेंगी। सभी धर्मों से जुड़े लोगों को यहाँ अपनी-अपनी आस्था के अनुरूप जीने की आजादी है। हिमालय की उत्तंग बर्फीली […]