विचार

इस बार नहीं जागे, तो बहुत पछताएंगे

इस बार दीपावली पर्व की गहमागहमी के साथ चुनावी गहमागहमी भी रहेगी। दीपावली पर्व प्रतिवर्ष निश्चित समय पर ही मनाया जाता है। लेकिन चुनावों का मौसम अब निश्चित नहीं रहा। बेमौसम वर्षा की तरह कभी भी होते हैं। दीपावली घर की साफ सफाई का पर्व है और चुनाव पर्व है राजनीतिक साफ-सफाई का। कोई भी […]

1984: भारतीय इतिहास का काला वर्ष

समकालीन भारत के इतिहास में सन् 1984 निश्चित ही सबसे अशांत वर्ष के तौर पर रहेगा। इस वर्ष उत्तरी भारत में ऑपरेशन ब्लू स्टार के तहत विध्वंसक सिख दंगों और मध्य भारत में विपत्तिपूर्ण ओलियम गैस लीक से पूरा भारत दहल गया। यह वे घटनाएं थीं, जिनका अंत हजारों लोगों की मौत के साथ हुआ […]

आम्बेडकर और राज्य केंद्रित समाजवाद

भारतीय कृषि की उत्पादकता कैसे बढ़ाई जाए, इस बात को लेकर अर्थशास्त्री और योजनाकार हमे शा उलझन में रहे हैं। वर्तमान समय में उद्योगों और सेवाओं में जिस तेजी से वृद्धि हुई है उसकी तुलना में कृषि में हुई वृद्धि जबर्दस्त तरीके से असंगत है। कृषि में 3 प्रतिशत से भी कम की दर से […]

महिषासुर के नाम पर समाज में जहर फैलाने का षड्यंत्र

धीमा जहर कैसे फैलाया जाता है और मिथक कथाओं के माध्यम से सर्वदा विद्यमान जातिगत खाइयों को किस तरह चौड़ा किया जा सकता है, इसका उदाहरण है इन दिनों महिषासुर पर चलाई जा रहीं कुछ चर्चाएं। बस्तर में सिपाहियों की शहादत पर दारू छलका कर जश्न मनाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में कुछ वर्षों […]

अर्थव्यवस्था का निकला दम, उम्मीद के सहारे हम

आज भारत की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से चरमरा गर्इ है, जिसने सबको हैरान कर दिया है। इसमें सुधार के लिए न तो आरबीआर्इ की ओर से कोर्इ उम्मीद है, जिसकी वर्तमान स्थिति के प्रति चिन्ता नाममात्र की है और न ही सरकार की ओर से कोर्इ उम्मीद है जिसके पास कोर्इ उपाय नहीं है और […]

विवेकानंद के शिकागो भाषण के चार अमर संदेश

स्वामी विवेकानन्द ने 11 सितम्बर 1893 को शिकागो की सर्वधर्मसभा में लगभग 7000 लोगों से खचाखच भरे सभागार में एक संक्षिप्त-सा व्याख्यान दिया। उसे सुनकर सब लोगों ने खडे़ हो तालियों की गड़गड़ाहट से आकाश गुंजा दिया और भाषण की समाप्ति के बाद विवेकानन्द को स्पर्श करने के लिए दौड़ पडे़। 480 शब्दों के उस […]

चुनाव सुधार के लिए उठाने होंगे ये 21 कदम

भारत ने अभी हाल ही में अपनी स्वतंत्रता की 66वीं वर्षगांठ तो मना ली किन्तु देशवासियों के मन में अनेक अनुत्तरित प्रश्न अब भी जैसे के तैसे खडे हैं। क्या सच्चे माइने में हम स्वतंत्र हैं? क्या वर्तमान शासन व्यवस्था वास्तव में जनता द्वारा जनता के लिए है? क्या भारत के प्रत्येक नागरिक को रोटी, […]

चीन के कब्जे में हमारा बाजार

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के आदर्शवादी सपनों को धराशायी करने वाले 1962 के युद्ध ने एक दूसरे मुख्य बिन्दु पर भी ध्यान केन्द्रित किया है और वह है कि एशिया की सबसे बड़ी और प्राचीन सभ्यताओं भारत और चीन के बीच संबंध पहले जैसा नहीं हो सकता। तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था की […]

संवाद की यात्रा में सहभागी बनें

भारत की चिन्तन परम्परा में ‘वादे वादे जायते तत्वबोधाः’ के सिद्धान्त का बड़ा महत्व रहा है। ज्ञान-यात्रा और विचार-यात्रा के सातत्य के लिए तो यह आवश्यक ही है कि भिन्न-भिन्न विचारों और वादों को मानने और जानने वाले लोगों के बीच संवाद-परिसंवाद हो, चर्चा-परिचर्चा चले, वैचारिक घर्षण-संघर्षण हो। घोरतम मतभेद होने पर भी संवाद रुके […]

… क्योंकि मीडिया व्यापार नहीं है

पिछले सप्ताह भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने एक सभा में सार्वजनिक रूप से कहा कि मीडिया तो व्यापार (ट्रेड) है और उसके हितों का ध्यान रखना हमारा कर्तव्य है। संदर्भ था भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण का वह फैसला, जिसमें कहा गया था कि एक सितम्बर से टेलीविजन चैनलों को एक घंटे में 12 […]