समीक्षा

डीयू, जेएनयू और शिक्षा की हू-तू-तू

एक नया समय सामने है। कोई ऑटो चलाने वाले की लड़की चार्टर्ड अकाउंटेंसी की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ हो कर निकलती है तो किसी बस ड्राइवर का बच्चा भारतीय प्रशासनिक सेवा का देदीप्यमान सितारा बन जाता है। ये वे विद्यार्थी होते हैं, जिन्होंने माँ-बाप और अपना पेट काटकर पढ़ाई के संसधान जुटाए हैं। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के ऐडमिशन का कट ऑफ […]

पाकिस्तानी पुस्तकों में भारत विरुद्ध ज़हर का पुट

मोदी सरकार के आने के बाद से पाकिस्तान में बेचैनी और हताशा का माहौल है | पाकिस्तान पहली बार भारत में किसी चयनित प्रधानमन्त्री से भयभीत है | उसे लग रहा है कि भारत की मजबूत सरकार पकिस्तान की जेहादी मंसूबे को किसी भी कीमत पर बर्दास्त नहीं करेगी | मोदी ने स्पष्ट तौर पर […]

एक क्षेत्र से अधिक चुनाव लड़ने की फिजूलखर्ची बंद हो

एक से अधिक सीटों पर एक साथ चुनाव लड़ने से चुनाव खर्च ज्यादा हो रहा है | इसे रोक पाने में किसी भी दल की कोई रूचि नहीं है | संसदीय चुनाव में विधायक का चुनाव लड़ना और विधानसभा चुनाव में सांसद का लड़ना एक रूटीन बन गया है | सीटों की संख्या बढ़ाने के […]

हमारे पड़ोसी देश एंटीनेशन तो नहीं है?

पाकिस्तान पिछले 64 वर्षों में एक नेशन की तरह कम और एंटीनेशन के रूप में ज्यादा सक्रिय था। इसके कई कारण हो सकते है। राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में जिन ठोस चीजों की जरूरत होती है, वो सब किसी न किसी रूप में मृग मरीचिका की तरह अनुपस्थित थी। यह ढांचा केवल पाकिस्तान में ही […]

मार्खेज की रचना में जादुई छाप

बाइबिल को छोड़ सर्वाधिक स्पेनिश में बिकनेवाली  किताब में शुमार  गैब्रिल गार्सिया मार्खेज की लेखन शैली, औपन्यासिक पुट, वैचारिक क्रांति अद्भुत है | अनुवाद में भी भारत के सलमान रश्दी, नाइजीरिया के बेन ओकरी, अमेरिका के टोनी मोरिसन और चीन के मो यान से भी कहीं ज्यादा प्रभाव मार्खेज का है | रश्दी और मो […]

कमजोर, उदासीन और कुपोषित सामरिक रणनीति

एक मजबूत और शक्तिशाली देश की अपनी सामरिक संस्कृति होती है। उस संस्कृति के सांचे में ही कोई भी देश ‘सुपर पावर’ की शक्ल लेता है। पिछले दिनों जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह कहकर सबको अंचभे में डाल दिया कि भारत को एक मजबूत सामरिक संस्कृति की जरूरत है। दरअसल, यह टिप्पणी इसलिए भी […]

मोदी लहर से जड़वत प्रवृत्ति के बुद्धिजीवी हुए परेशान

यदि वर्ष 2014 लोकसभा के तीसरे चरण के चुनाव में मतदाता अधिक संख्या में मतदान के लिए घरों से बाहर निकले हैं, तो इसका श्रेय सिर्फ एक शख्स को जाता है। नरेंद्र मोदी ने अपनी अपील ‘परिवर्तन के लिए मत‘ समाज के विभिन्न वर्गों को प्रेरित करने के लिए की है। परन्तु विडम्बना है कि […]

कांग्रेस के घोषणापत्र पर छाया राजग का साया

कांग्रेस के मानस में केवल भारतीय जनता पार्टी और राजग पैठ जमाए हुए नज़र आया | घोषणापत्र आमतौर पर अपने कार्यक्रमों को बताता है | किन्तु कांग्रेस का 2014 का चुनावी घोषणापत्र का कार्यक्रम व इसके पन्ने भाजपा पर ही केन्द्रित रहा | कांग्रेस भाजपा ग्रसित ही दिखती है;  महंगाई मुद्दा नहीं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, […]

धरोहर से खिलवाड़ : भारतीय रेल निरंतर धीमी गति की ओर

भारतीय रेल एक विडम्बना है, लगातार रफ़्तार कम होती जा रही है | प्रचार के लिए नयी तथाकथित तेज़ रफ़्तार ट्रेन चलाई जाती है पर ऐतिहासिक उन ट्रेनों को जिन्होंने कभी भारतीय रेल को एक पहचान दी थी उन्हें धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है | रेलवे अव्यवस्था के शिखर पर है, तेज़ ट्रेन चलाना […]

2014 के गर्भ में संकट या समाधान?

2014– एक और नया साल। इसका जन्म 2013 के संकटों से हुआ है। क्या यह नई रोशनी लाएगा या विगत वर्ष के संकटों से ग्रस्त रहेगा? यह एक विकट प्रश्न है। यह चुनाव का वर्ष है। अनेक राजनीतिक परिवर्तन के संकेत 2013 के गर्भ में उत्पन्न हुए है। कौन प्रधानमंत्री बनेगा? किस दल का शासन […]