समीक्षा

भारत में स्वास्थ्य सेवाएं: स्थिति, चुनौती एवं समाधान

अच्छे दिन कैसे आयेंगे

‘रंगभूमि’ (1925) का सूरदास उजबक- सा दिखता है, पर पहला आम आदमी है जो अपनी जमीं बचाने के लिए औद्यौगिक विकास के नाम पर ‘लूट’ और राजनैतिक छल-छद्म से दिलेरी के साथ संघर्ष करता है | सोची-समझी रणनीति के तहत सरकार की कार्यप्रणाली किसान वर्ग को कंगाल बना रही है | बड़ें किसानों को कभी […]

सख्त बजट ने किसी को नहीं छोड़ा, दाम बढ़ने के संकेत

यह बहुत ही सख्त बजट है. इसमें प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के साक्षर तो युवानीति, बुजुर्गों के लिए कर छूट, मेक इन इंडिया के तहत विकास की कोशिश में तो दीखते है. पर साथ ही जनता द्वारा बाहर किये गए मनमोहन सिंह के मुहर भी दिखती है. बजट से मुद्रास्फीति बढ़ेगी और लोगों को अपनी […]

मेरा भी नहीं, तेरा भी नहीं, तो फिर किसका है यह बजट

भारतीय संस्कृति की चिंता छोड़ “शाहबानों-पीर-फ़कीरी” पर भी कैमरा घुमाओं

हिमालयी देशों में चीनी घुसपैठ और मोदी की विदेश नीति

कई दशकों बाद भारत की विदेश नीति में बुनयादी परिवर्तन की ताल सुनाई पद रही है और इसकी कम्पन दुनिया के अन्य हिस्सों में महसूस की जा रही है। दरसल, इसकी बानगी वाजपेयी सरकार के समय ही हो गए थी लेकिन 21 राजनितिक दलों के महागठबंधन में यह सोच दब गई।  मोदी सरकार ने चीन […]

दुनिया में बढ़ती असमानता

इस तस्वीर को देखकर गरीबी पर आंसू बहाने की बजाए गहरी चिंता होनी चाहिए। भारतीय प्रजातांत्रिक गणराज्य की कल्पना में सभी तबकों में समाजिक बराबरी बनाने की संकल्पना की गई थी, लेकिन आजादी के छह दशक बाद भी उस संकल्पना पर हम अभी तक खरे नहीं उतर सके हैं। अमीरों और गरीबों के बीच की […]

तबाही के बाद क्यों बढ़ती है जी.डी.पी.

पिछले पांच सौ वर्षों से Nike Roshe One Nm Fb Camo विकास की अवधारणा मानव केन्द्रित उपभोगवादी और प्रकृति विध्वंसक रही है | अक्षय विकास के अपने लक्ष्य को पाने के सूत्र हमें दर्शन में मिलेंगे | पूंजीवादी व्यवस्था ने जो विकृतियाँ पैदा की हैं, अमेरिकी मंदी से उसे आज भी ढक पाना मुश्किल है […]

षड्यंत्रों से संघर्ष करती राष्ट्रभाषा हिंदी

राष्ट्रभाषा होने के बावजूद हिंदी षढ़यंत्रों का शिकार रही है। स्वाधीनता के बाद से हमारे देश में, हिंदी के खिलाफ षड्यंत्र रचे जाते रहे हैं। उन्ही का परिणाम है कि हिंदी आजतक अपना अनिवार्य स्थान नहीं पा सकी है। हम अपनी मानसिक गुलामी की वजह से यह मान बैठे हैं कि अंग्रेजी के बिना हमारा काम […]

पत्रकारिता का ‘नरक’ युग

न्यूज चैनल देखूं या अखबार। जैसे ही किसी शब्द में मात्रा, वर्तनी की अशुद्धि दिखती है तो लगता है जैसे पुलाव खाते हुए, अचानक दांतों के बीच मोटा सा कंकड़ पड़ गया हो। पत्रिकाओं, अखबारों में मैंने काम किया, न्यूज चैनल में काम कर रहा हूं और एक प्रवृत्ति भी देख रहा हूं कि वर्तनी […]