नवगीत


माया सिंह

कितनी बार ना जाने कितनी बार…
सोचा के चल दू अकेले ही सब कुछ छोड़ कर…
हर बार खुद को ही मारा हैं हमने अपने ही हाथों से..
मगर ये फैसला हालात नहीं ले सके…
हर बार हमने सहा हैं तुम्हें।
हद हो ग‍ई दिल को बहलाने की…
कुछ हाथ तो ना आया बस हारे हैं हम बार बार।

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