नई चुनौती शहरी नक्सलवाद


डॉ अंजनी कुमार झा

शहरी नक्सली कथित बुद्धिजीवियों के साथ कुछ पत्रकारों के गहरे संबंध से चौथे स्तंभ की मर्यादा तार-तार हो
रही है। समाचार लेने की आड़ में कुछ खबरनवीस इनकी मुखबिरी करते हैं तो कुछ इन्हें हीरो बनाते हैं तो कुछ स्वंयभू वार्ताकार बन जाते हैं। हाल में नक्सलिययों से कथित अंत संबध को लेकर सेंट्रल जेल में रह रहे पत्रकार संतोष यादव से पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यिम और आलोक पुतुल में भेंट कर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह तथा उच्च सरकारी अधिकारियों से बिना जांच के रिहाई की मांग कर डाली। साथ ही साथ मानवाधिकार आयोग में जाने की अलग से धमकी देकर खासा हंगामा कर अंतराष्ट्रीय सुर्खियां की कोशिश की। बजाय जांच में सहयोग करने के उल्टे मीडिया में यह हवा बनाने की कोशिश की जा रही है कि पत्रकारों के साथ अत्याचार हो रहा है। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के बस्तर में तेजी से हो रहे विकास कार्यों के कारण उखड़ रहे नक्सलियों के पांव को उखड़ने से बचाने के लिए कुछ शहरी बुद्धिजीवियों ‘लालच’ में लोभी पत्रकारों के साथ घिनौने कार्य में संलिप्त रहते हैं। झूठे प्रचार किये जा रहे हैं कि सभी पत्रकारों की गतिविधियों पर पुलिस प्रशासन की निगाह है, ताकि आम पत्रकार सरकार के विरूद् हो जाए। बस्तर में सिटीजन ग्रुप सामाजिक एकता मंच द्वारा किये जा रहे सराहनीय कार्यों को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। कथित बुद्धिजीवी पत्रकार इनके कार्यकर्ताओं को सरकारी एजेंट बताने में गुजर नहीं करते।
आम विचारधारा को घसीट रह दैनिक देशबंधु के कांकेर (छत्तीसगढ़) के संवाददाता प्रेमराज को 1991-1992 में नक्सली बुद्धिजीवियों को राष्ट्र दो ही दस्तावेज देने के आरोप में टाडा के तहत गिरफ्तार किया गया था। दिसम्बर, 2013 में ग्रामीण संवाददाता साईं रेड्रडी की बीजापुर (छत्तीसगढ़) में नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। कारण पुलिस की मुखबिरी में विलंब। दिलचस्प तथ्य है कि 2008 में बस्तर पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष एस करिमुद्दीन ने बयान में जिक्र किया था कि पुलिस नक्सलियों से गहरे तालमेल के कारण उन्हें गिरफ्तार किया था जबकि माओवादियों का मानना था कि वह पुलिस के लिए मुखबिरी करता था। इसकारण क्रूर राष्ट्रदोहियों ने पहले उसके घर को आग के हवाले किया फिर उसकी नृशंस हत्या कर दी। फरवरी, 2013 में एक और ग्रामीण पत्रकार नेमीचंद जैन की सुकमा (छत्तीसगढ़) में गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या के 45 दिनों बाद माओवादियों ने माफी भी मांग ली। 2015 में पुलिस ने रायपुर से प्रकाशित हो रहे दैनिक नवभारत के संवाददाता संतोष यादव और दैनिक छत्तीसगढ़ के संवाददाता सोमारू नाग को धर दबोचा था। दोनों आरोपियों से जगदलपुर केद्रीय कारागार में जांच टीम ने कई बार पूछताछ की, किन्तु ये सच नहीं उगल रहे हैं।
उधर 8 फरवरी, 2016 को आई.सी.आर.सी. की पूर् मुखिया और स्क्राल के लिए लिख रही मालिनी सुब्रमण्यिम के जगदलपुर निवास पर तड़के हमला हुआ। माओवादियों के समर्थन में खुलकर लिखने, बोलने तथा आदिवासियों को बरगलाने से दुखी, नक्सली समर्थक बस्तर बचाओ मालिनी मुर्दाबाद के नारे खूब लगे। स्थानीय प्रशासन के मत में उनके लेख माओवादी समर्थक और ऐसे ही आरोप जब सामाजिक एकता मंच ने भी लगाया तो जगदलपुर और रायपुर (छत्तीसगढ़) के कुछ धन लेकर नक्सलियों के समर्थन में रिपोर्ट तैयार करने वाले पत्रकारों ने इस संगठन को सरकार की एक इकाई कहना शुरू कर दिया। बस्तर की रिपोर्टिंग कर रहे आलोक पुतुल को बी.बी.सी. हिंदी सेवा से मुक्त इसलिए किया गया कि वह लगातार शहरी माओवादी बुद्धिजीवियों के अंतराष्ट्रीय और भारतीय संस्कृति को गलत बताने के प्रयास को महिमा मंडित करता था। बस्तर से यू.एन.आई. संवाददाता और संभागीय पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष एस.कसीमुद्रदीन ने बताया कि हमें सत्य लिखने पर हत्या की धमकी दी जाती है, इसलिए नगर से बाहर जाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते।कैद सरीखी जिंदगी है। एक दशक से खामोश हूं। ऐसा ही बयां स्थानीय पत्र के संपादक दिलशाद नियाज़ी ने किया। भय के कारण पड़ोसी जिले बीजापुर का दौरा विगत नौ वर्षों से नहीं कर सका। बस जान सलामत रहे।वरिष्ठ पत्रकार कश्यप् के मुताबिक अगर पत्रकार नक्सलियों के समर्थन में लिखते है तो सब ठीक है, वरना कुछ भी खैरियत नहीं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों यथाः कांकेर, जगदलपुर, घाटापारा, बैकुंठपुर, (छत्तीसगढ़), पलामू, चाईबासा, सिंहभूम (झारखण्ड) बालाघट, छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश), चंद्रपुर (महाराष्ट्र) आदि क्षेत्रोंमें पत्रकार ठेकेदार अन्य, निजी कार्य, एन.जी.ओ का संचालन, शिक्षक आदि का काम भी करते हैं। अब वे प्रकाशन मुद्रक बन गये। माओवादी बुद्धिजीवियों को वे सूचना प्रदान करते हैं और इस आधार पर ये सभी नक्सलियों के राष्ट्रदोही कार्यों को न्यायसंगत ठहराते हैं। पुलिस कार्यवाही को ये मानवाधिकार का हनन मान कर पूरे देश में संशय और भय का माहौल बनाने की कोशिश करते हैं। स्थानीय भाषाओं यथाः गोण्डी, हलबी, भील, संथाली की समझ चुनिंदे पत्रकारों को ही है। यलगार परिषद और भीम-फोर गांवकांड के बाद शहरी नक्सल अर्थात नगरों के माओवादी बुद्धिजीवियों का असली चेहरा सामने आ गया। अरबन नक्सल शब्द सब से पहले मई, 2017 में स्वराज्य में फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री के लेख से यह पता चलता है कि माओवादियों का ठिकाना केवल सुदूर क्षेत्र या घने जंगल नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्र में हो गया है। वन में लड़ाई तो खुलआम हो रही है, किन्तु शहरों में अतिगोपनीय ढंग से की जा रही है।

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