संगोष्ठी-प्रतिक्रिया


सुनीता बुग्गा

काव्य एक माध्यम हैं समाज में प्रचलित विभिन्न धारणाओं , आस्थाओं और परिस्थितियों को अलंकृत कर जनमानस तक पहुचानें का। भावनाएं, जो सामान्य संवाद में कदाचित स्पष्ट नहीं हो पाती। काव्य उन्ही भावनाओं एवं व्यक्तव्यों को शब्द शक्ति के मध्यम से सामान के समक्ष प्रस्तुत करता है। स्वतंत्रता से पूर्व कवियों के समक्ष मानवता, नैतिकता, धार्मिकता आदि मूलभूत विषय उपस्थित थे। देशभक्ति गत दो शताब्दियों से एक आवश्यक विषय बनकर कवि द्वारा जन साधारण को देश के प्रति आहूत होने की प्रेरणा देता रहा है। परन्तु स्वाधीन होते होते देश की शिक्षा प्रणाली एवं पाश्चात्य धारणाएँ भारत भूमि में घर कर गई। अत: आज देश पाश्चात्य एवं आधुनिकीकरण में फंसा हुआ है। आज कबीर, मीरा रहीम, भूषण सुभद्रा कुमारी चौहान, निराला एवं महादेवी वर्मा केवल एक ऐतिहासिक स्वरूप में ही रह गए हैं। एक उचित दिशा, भाव एवं नैतिक मूल्यों का लोप हो गया है। कवि की कविता कहीं गम हो चुकी है। शब्दों में कटुता एवं अश्लीलता का प्रचलन हो रहा है। व्यंग्य के नाम पर भी उच्च कोटि के काव्य का विकृत रूप जनसाधारण के समक्ष आ रहा है। आज आवश्यकता है एक विषय की अभिव्यक्ति की। मानस जीवन के उत्थान के लिए उचित संज्ञा एवं शब्दों की shakti से नैतिकता को वायु मंडल में भरने की। भारत की अमूल्य नैतिक धरोहर हमारे काव्य ग्रंथों में -वाल्मीकि, तुलसीदास एवं कालिदास द्वारा रचित महाकाव्यों के समान संस्कृति को सुगन्धित करने की आज का कवि जागृत है, सक्षम है और सन्वेदनशील भी है। कवि के कर की कलम उस शक्ति को उभरने की आवश्यकता है जिससे सामायिक प्रदूषण के अंधकार की चादर को हटाकर सुरुवर की रश्मियाँ एक आनंदित वातावरण का पुरुत्त्थान कर सकेगी।

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