अंतहीन जीवन


मनोज शर्मा 'मन'

सुरेश के भाई की सास का देहांत हो गया था । ससुराल उसका मथुरा के पास एक कस्बे में था । उसकी तेरहवी में जाना था । बीच में जाना हो नहीं पाया था दूर की वजह से । पत्नी से बात हो गई की सुबह की पांच बजे की ट्रेन से निकलेंगे । क्योंकि साथ में दस लोग और भी जाने थे । सभी सुबह स्टेशन पर पहुच गए थे ।
जाने में करीब छः घंटे लगते है इसलिए उसने श्रीमती को साथ में कुछ परांठे पैक करने के लिए बोल दिया था । श्रीमती ने सभी को कह दिया था । सभी स्टेशन पहुच चुके थे । गाडी पेसेंजेर थी पूरी की पूरी । आज कई वर्षो बाद बिना रिजर्वेशन के सुरेश को जाना था एक पेसेंजेर गाडी में । सीट मिलेगी की नहीं एक नए रोमांच को महसूस करने के लिए । टिकेट ले लिए गए थे । स्टेशन पर आगे की और खड़े हो गए उनकी भतीजी ने बताया की आगे की तरफ खड़े होने पर डिब्बे में जगह मिल जाती है और ये डिब्बा सीधा स्टेशन पर रुकता है ।
ट्रेन एक घंटा लेट थी । जैसे ही आई सभी चौदह लोग डब्बे में चढ़ गए । भाग कर सीट की और दौड़े । सीट मिल गई थी एक जंग जीत गए थे जैसे । दो बन्दे सीट पर सोये थे उनको उठा दिया । एक पुरुष था और एक महिला । दोनों ही गाँव के थे । महिला खिसक कर खिड़की के बगल में बैठ गई थी और उनकी गतिविधि पर नजर रख रही थी । अब सुबह का समय और दिसम्बर का महीना , सभी गर्म कपडे पहने थे पर पेसेंजेर डिब्बे की खिडकिया पूरी बंद नही हो रही थी । रह रह कर हवा आ रही थी । अब सब बैठ गए थे । सुरेश की श्रीमती उनकी पड़ोसन उनका पुत्र उनकी सास और ससुर साथ में भतीजी और छोटे भाई के साढू की पुत्री एक जगह आमने सामने बैठे गए और उनके साढू के साथ दुसरे लोग दूसरी साइड बैठ गए ।
सुरेश ने काला कोट पहन रखा था ठंड लग रही थी तो एक शाल ले लिया । गाडी चल पड़ी थी । मोबाइल कनेक्शन चेक किया तो वो काम नहीं कर रहा था । आठ बज चुके थे बाते चल रही थी । बीच बीच में वो महिला जो खिड़की पर थी वो भी अपनी बात रख रही थी । पर वो उस पर ध्यान नहीं दे रहे थे । सुरेश जी की श्रीमती ने अपने परांठे निकाले , सुरेश ने अपने लिए दो रोटिया कह दी थी । पर उसने सब्जी आलू और गोभी रात में ही बना ली थी , सुबह इतना समय कहा था । बारह परांठे भी लाइ थी , पड़ोसन ने भी परांठे निकाल लिए , करीब पंद्रह थे और सुरेश की सांस ने भी वो बथुए और आलू के परांठे जिन पर मिर्च रखी थी । सबको बाँटने लगे । सुरेश अपनी वो रोटिया खाने लगे तभी उनकी सास ने बथुए वाला परांठा भी रख दिया । सुरेश न कहने की सोचता हुआ फिर भी आधा वो परांठा भी खा लिया । अभी भी काफी परांठे थे तो वो दूसरी तरफ भेज दिए । अब सभी संतुष्ट थे की चलो नाश्ता तो हुआ । कहते है की घर से खाकर चलो तो बाहर भी मिलता है । तभी हिजड़े भी उसमे चड़ गए थे । वो सुरेश के सामने आये तो उसका काला कोट देखकर शायद उसे टी सी समझ कुछ नहीं बोले । आगे निकल गए एक युवा को देखकर उसपर अपने फितरे कहने लगे , अरे सोनू के पापा कुछ तो निकाल , उसने दस रुपये उनको निकाल कर दे दिए । पेसेंजेर डिब्बा था तो ये तो होना ही था मूंगफली वाला भी आ गया तो देखा सामने एक युवा जो पुलिस के ट्रेनिंग पे जा रहा था उसने उससे सौ ग्राम मूंगफली ले ली । थोड़ी उसने एक बाबा दिखने वाले को भी दे दी । अब दोनों खा रहे थे और छिलके डब्बे में ही गिरा रहे थे । सुरेश को कुछ बुरा लग रहा था पर डब्बे में सभी और छिलके बिखरे थे । सुरेश ने परिवार के खाने के भी कागज एक पिन्नी में रखवा दिए थे की इन्हें स्टेशन में डस्टबीन में डाल देंगे । पर वो पिन्नी भी कहा फेक दी गई उसे पता ही नहीं चला । अब बारी बारी फेरी वाले आ रहे थे कभी चाय वाला , कभी नेल कटर वाला , कभी भिखारी , ये सब चल रहा था । बीच बीच में सुरेश कोई स्टेशन आता तो उसे देखने दरवाजे तक आता ताकि पैर खुलते रहे । और देख भी रहा था की कही कोई फीकी चाय का जुगाड़ हो जाये । पर हर तरफ मीठी चाय ही मिल रही थी । वो मन मारकर वापस अपनी सीट पर आ जाता था । अब मथुरा का वो स्टेशन आ गया था ।
सभी उतरे साढू साहब ने तुरंत तीन इ रिक्शा कर ली , किराया प्रति सवारी दस रुपये तय हो गई थी । सभी उनके घर पहुच गए , घर काफी बड़ा था । उनका फलो का बहुत बड़ा व्यापार है । बाजार के बीच में भी उनकी बड़ी दूकान है । और उन्होंने एक होटल भी मैं रोड पर बनाया हुआ था । करीब सत्तर आदमी उनके यहाँ काम करते थे । सुबह सबसे पहले हम ही पहुचे थे तो वो बाहर ही थे और उनके साथ कुर्सी पर चार से पांच लोग वहा थे । किराया पहले ही साढू साहब ने दे दिया था । छोटे भाई के ससुर और उनके पुत्र कुर्सी से खड़े हो गए थे । महिलाओ को ऊपर की मंजिल पर भेज दिया और ससुर साहब सुरेश के साथ नीचे ही बैठ गए । वहा की बहुत बड़ी हस्ती थे । पर मेहनती थे । उनकी मेहनत की वजह से ही आज इतना बड़ा व्यापार वो हुआ था । बाज़ार की दूकान पर बड़ा लड़का बैठता था , छोटे को होटल दे दिया था , एक पुत्र बीच में अभी दो वर्ष पहले ही बीमारी की वजह से भगवान को प्यारा हो गया था । माताजी तभी से उसका सदमा नहीं सहन कर पाई थी और बीमार पड गई थी । ससुर साहब सुरेश को ये ही बता रहे थे की मरने से आधे घंटे पहले भी वो कह रही थी बच्चो को वो अभी नहीं जा रही है चिंता मत करो । उन्होंने बताया की उनकी उम्र पैंसठ वर्ष थी पर कभी सिंगार का शौक नहीं किया , सभी कारीगरों के भोजन का ख्याल रखती थी । सभी आने जाने वालो को देखती थी । मोहल्ले में सभी उसकी तारीफ़ करते थे । मैं तो पूरी उम्र सिर्फ काम में ही लगा रहा । वो कहती भी थी की बालक की तबियत खराब है तो मैं उससे कह देता की देख मैं इस चक्कर में लगा तो धंधा ठप्प हो जायेगा । जितने पैसे चाहिए वो बता दे । वो कुछ न कहती और सारा घर उसने सम्भाला हुआ था । इतना मजबूत आदमी मुझसे ये बाते कर रहा था । सुरेश भी सुने जा रहा था । तभी कुछ और लोग गाडी में आ गए थे शायद उनके दुसरे दामाद की बहन के घर से आये थे ।
तभी सुरेश के ससुर आ गए चलो कुछ घूम आये । चौराहे पर आये तो एक फल वाला खडा था । अमरुद अच्छे लगे , पुछा क्या भाव है उसने कहा की सत्तर रुपये । सुरेश ने कहा की ये दो काट दो , कितने हुए उसने कहा की पच्चीस रुपये । अमरुद अच्छे थे । वापस वही स्थल पर आ गए थे । एक बज चूका था । देहाती परिवेश था । भोजन शुरू हो चूका था । सुरेश ऊपर छत पर चला गया वहा और भी रिश्तेदार थे । महिलाये भी वही थी । बीच बीच में कोई और कोई नई महिला आती तो वो महिलाये फिर रोने लगती ।
वहा बैठे रिश्तेदार से अब सुरेश की बातचीत शुरू हो गई । उन्होंने बताया की वो जालंधर से है ।उनका पुत्र ऑस्ट्रेलिया में पढने गया है । की उसका खर्चा लाखो में आ रहा है । दो साल का कंप्यूटर मैनेजमेंट का कोर्स कर रहा है । फिर बात खर्चो पर आ गई । एक बात बड़ी अच्छी बताई की भाईसाहब रसोई का खर्च अच्छे से अच्छे परिवार का एक तोला सोने की जितनी कीमत होती है उससे ज्यादा नहीं हो सकता है । बात अच्छी थी । अब सन्देश आया की गाडी वापसी की तीन बजे की , खाना खा ले । यहाँ से करीब दो बजे निकलना पड़ेगा । पर पंडितजी अभी अपना प्रवचन कर रहे थे । अब सुरेश ने छोटे भाई के साढू को कहा की पंडित जी से कह कर इस कार्यक्रम को कृपया दो बजे पूर्ण करवाए । उसने कहा की कोशिश करता हूँ ।
अब महिलाओ में शायद बड़ी बहु को कुछ सिंगार की रस्म शुरू की । सुरेश की सास ने कहा की आप लोग नीचे चले जाये । फिर नीचे आये तो पगड़ी रस्म निपटाई जाने लगी । फिर सभी को विदा किया जाने लगा । सुरेश और सभी को उन्होंने भाजी दी , और महिलाओ को मिलाई दी जाती है , उसकी श्रीमती ने बताया की मामा ने दस रुपये और छोटे के ससुर ने सौ रुपये दिए है । महिलाओ की खासियत है सब बता देती है । अब वो भरा हुआ घर अब एक महिला के न होने से सूना सूना लग रहा था ।की ऐसा पहली बार हो रहा था की सुरेश जब भी आया था तो वो महिला अंत में सब को हाथ जोड़कर विदा करती थी । भतीजी बता रही थे की पिछली बार वो आई थी तो उनके बैग में करीब तीस किलो सामान भर दिया था । कहते है की सास न होने के बाद ससुराल में वो बात नहीं रहती । और वो मजबूत आदमी आज हाथ जोड़े सब कुछ होते हुए भी असहाय रूप में सबको विदा करता हुआ । उसके मुह से कोई शब्द निकल नहीं रहा था । शायद उसे आज ये महसूस हो रहा था की उसकी ताकत कही चली गई है । सुरेश भी अपनी भाजी लेकर वहा से ट्रेन न निकल जाये ये सोचता हुआ निकल गया ।
मनोज शर्मा “मन”

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