हिमालयी देशों में चीनी घुसपैठ और मोदी की विदेश नीति


डाॅ. सतीश कुमार

कई दशकों बाद भारत की विदेश नीति में बुनयादी परिवर्तन की ताल सुनाई पद रही है और इसकी कम्पन दुनिया के अन्य हिस्सों में महसूस की जा रही है। दरसल, इसकी बानगी वाजपेयी सरकार के समय ही हो गए थी लेकिन 21 राजनितिक दलों के महागठबंधन में यह सोच दब गई।  मोदी सरकार ने चीन के देंग शयाओ पिंग की तरह विचारों की नीति को दरकिनार करते हुए महज एक सोच राष्ट्रीय हित को सामने रेखा इसके अंतर्ग्रत भारत न केवल हियमलय के तटवर्तीय देशों में अपनी सुरक्षा को चाख.चौबंद किया बल्कि चीन से आर्थिक सम्बन्ध को भी नयी ऊंचाई पर ले जाने की शुरुआत की।

अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान चीन के तेवर इस बार उतने उग्र नहीं थे, जितने की पहले हुआ करते थे। भारत की स्थति आज बैटमिंटन शटलकॉक की तरह नहीं है, जहाँ दो-दो देश अपनी इच्छा के अनुसार उसे उछलते रहे। भारत खुद एक महत्वपूर्ण कंदर बन गया है। चीन में देंग ने 70-80 के दशक में चीन की विदेश नीति को विचारों से मुक्त कर राष्ट्रीय हित में ला दिया था। मोदी सरकार ने हिमालय के तटवर्ती देशों मसलन भूटानए नेपाल में एक नयी शुरआत के साथ भारत की विदेश नीति को नया आयाम दिया।
हिमालय की स्वाभाविक और प्राकृतिक श्रृंखला भारत की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम था। महत्वपूर्ण धर्म ग्रंथों में भी हिमालय श्रृंखला की चर्चा है। भारतीय संस्कृति के अभिन्न स्वरूप के रूप में जाना जाता हैं, जहाँ से करोड़ों की आाबदी का भरण-पोषण के साथ आध्यात्मिक बल का परिचायक रहा है। हिमालय की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर इण्डस और ब्रह्मपुत्र नदियों का विस्तार है। हिंदूकुश, काराकोरम और पामीर हिमालय श्रृंखला से जुड़ जाते है। तकरीबन 2500 कि.मी. तक का पहाड़ी रेंज जो कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम से पूर्व तक भारत की प्रहरी के रूप में काम करता है। प्रसिद्ध कवि कालिदास ने भी महत्वपूर्ण कृति ‘कुमार संभव’ में हिमालय के भौगोलिक और सामरिक महत्व की चर्चा की है। इसकी तलहटी पर कई महत्वपूर्ण देश है, मसलन तजाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, पाकिस्तान, भारत और म्यांमार। इस्लाम, बौद्ध और हिंदू धर्म की अद्भुत समन्वय भी है।

लेकिन दुर्भाग्य है कि पिछले 7 दशकों में भारत की पकड़ हिमालय की सीमाओं पर कमजोर पड़ती गई और चीन निरंतर अपना विस्तार करता गया। भारत में मुगल काल तक हिमालय की सीमाओं में कोई दरार या बदलाव नहीं आया जबकि उस समय चीन में मंगोल साम्राज्य काफी मजबूत था। ब्रिटिश काल में भारत की स्थिति ज्यादा मजबूत थी। ग्रेटगेम के खत्म होने के उपरांत 1914 में तिब्बत के साथ शिमला समझौते की नींव डाली गई और मैकमहन लाइन को भारत और तिब्बत के बीच की सीमा तय की गई।

बात आजादी के बाद बिगड़नी शुरू हो गई। जब भारत के प्रधानमंत्री चीन के झांसे में घिरते गए। शुरू में भावनात्मक रूप में और बाद में डर कर। हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा भी संभवतः असहज और अप्रासंगिक था। जहाँ चीन अड़ियल और हठधर्मिता का रुख अपनाए हुए था, वहीं भारत अत्यंत समपर्ण के मूड में दिखा। जब तिब्बत को हड़पकर चीन ने अपना हिस्सा बना लिया तो भारत ने अत्यंत ही सहजता से तिब्बत को चीन के अभिन्न हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया। भारत के लिए हिमालय के रूप स्थापित सुरक्षा कवच का विघटन उसी समय से शुरू हो गया।

चीन अपनी रणनीति के तहत पहले तिब्बत फिर भारत के पूर्वी राज्यों मसलन अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम पर अपनी गिद्ध दृष्टि डालनी शुरू कर दी। कश्मीर में घुसपैठ शुरू कर दी। अपनी चाल को अंजाम देने के लिए चीन ने नेपाल और भूटान को घेरे में लेने की शुरूआत कर दी। रेल और सड़क के जाल फैलाने शुरू कर दिए। चीन भारत को सामरिक तरीके से घेरने की कोशिश में आज भी सक्रिय है। तिब्बत को हड़पने के साथ ही चीन ने भारतीय सीमा में घुसपैठ भी शुरू कर दी। तिब्बत के हड़पने का खामियाजा महज सामरिक ही नहीं रहा बल्कि प्राकृतिक भी बन गया।

चीन ने तिब्बत के एक बड़े भाग को आण्विक कूड़ेदान की प्रयोगशाला बना दिया। चीन ने ऐसा करने के लिए तिब्बत के घने जंगलों को काटना शुरू कर दिया। उल्लेखनीय है कि भारत के मैदानी इलाकों में बहने वाली महत्त्वपूर्ण नदियाँ तिब्बत से निकलकर नेपाल के रास्ते भारत की ओर अपना उद्गम बनाती है। ये ब्रह्मपुत्र, यांगसी और सतलुज है। न केवल भार बल्कि बंगलादेश, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, थाइलैंड, बर्मा, वियतनाम, लाकोस और कंबोडिया जैसे अन्य और देश भी है जहाँ तिब्बत से निकलने वाली नदियाँ बहती है। ये नदियाँ इन देशों का मेरूदण्ड है।

अगर भारत की विदेश नीति का प्रारंभ नेहरू की सोच और सिद्धांतों पर होता है तो दूसरा चरण वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी के भूटान और उसके उपरांत नेपाल की यात्रा से बनता है। सात दशकों में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने ऐसा कभी नहीं किया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली विदेश यात्रा भूटान की की हो। कई दशकों तक भूटान को हम सामरिक खांचे से बाहर रखते रहे। नतीजा चीन की शक्ति के विस्तार के रूप में देखा गया। मोदी ने भूटान की यात्रा कर कई कुटनीतिक संदेश विश्व को दिए। भारत हिमालय के तटवर्ती देशों में चीन या किसी अन्य देश की दखलअंदाजी को सहन नहीं करेगा। दूसरा, भारत जब तक इन देशों पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं बना पाता, तब तक भारत की छवि एक सशक्त शक्ति केंद्र के रूप में नहीं बन पाएगी।
(लेखक झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची में असोसिएट प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग के विभागाध्यक्ष हैं।)}