‘हिन्दू’ शब्द की उत्पत्ति


*महावीर प्रसाद द्विवेदी

images2किसी-किसी का मत है कि ‘हिन्दू’ शब्द नदविवाचक सिंधु शब्द का अपभ्रंश है और इंडस (indusindus) अर्थात् सिंधु शब्द से ही अंग्रेजी शब्द (IndiaIndia) की उत्पत्ति है। किसी-किसी का मत है कि अरबी ‘हिन्दू’ शब्द से अंग्रेजी शब्द इण्डिया निकलता है । कोई-कोई पंडित हिन्दू शब्द की सिद्धि संस्कृत व्याकरण से करते हैं और कहते हैं कि वह हिसि+दो धातुओं से बना है और हीन अर्थात् बे या कुमार्गगामी लोगों को दोष या दण्ड देने वाले आर्यों का नाम है। बहुत से आदमी हिन्दू शब्द को फारसी भाषा का शब्द मानते हैं और उसका अर्थ चोर, डाकू, रहजन, गुलाम, काला, काफ़िर आदि करते हैं। फारसी में हिन्दू जरुर है और उसका अर्थ भी उसका अच्छा नहीं है। इसी से इस शब्द के अर्थ की तरफ लोगों का इतना ध्यान गया है। सिंधु से हिन्दू हो जाना या पुराने ज़माने में हिन्दुओं को तुच्छ दृष्टि से देखने वाले मुसलमानों का उनके लिए काफ़िर और गुलाम आदि अर्थों का वाचक शब्द प्रयोग करना, कोई विचित्र बात भी नहीं। परन्तु पं. धर्मानन्द महाभारती न तो इन अर्थों में से किसी अर्थ को मानते हैं और न हिन्दू शब्द की आज तक प्रसिद्ध व्युत्पति ही को स्वीकार करते हैं। आपने पुराने व्युत्पति और पुराने अर्थ को गलत सिद्ध करके हिन्दू शब्द की उत्पत्ति और अर्थ एक नए ही ढ़ंग से किया है। इस विषय पर तीन-चार वर्ष हुए बंगला भाषा में आपने एक लेखमालिका निकली थी। उसके उत्तर अंश का मतलब हम यहाँ संक्षेप में देते हैं।
फारसी में ‘हिन्दू’ शब्द यद्यपि रूढ़ हो गया है तथापि वह उस भाषा का नहीं है। लोगों का ख्याल है कि फारसी का हिन्दू शब्द संस्कृत सिंधु का अपभ्रंश है, वह लोगों का केवल भ्रम है। ऐसे अनेक शब्द हैं, जो भिन्न-भिन्न भाषाओँ में एक ही रूप में पाए जाते हैं । यहाँ तक कि उनका अर्थ भी कहीं-कहीं एक ही है। एक वे सब भिन्न-भिन्न धातुओं से निकलते हैं। उदहारण के लिए शिव शब्द को लीजिए। संस्कृत में उसकी साधानिक तीन धातुओं से हो सकती है। किन्तु अर्थ सबका एक ही है अर्थात् कल्याण या मंगल का वाचक है। यही ‘शिव’ शब्द यहूदी भाषा में भी है। यह अंग्रेजी अक्षरों ‘Seeva’ लिखा जाता है। किन्तु उच्चारण उसका शिव होता है। वह यहूदी भाषा में ‘शू’ धातु से निकलता है, उसका अर्थ है ‘लाल रंग’। ‘शिव’ नाम का यहूदियों में एक वीर भी हो गया है। अब देखिए, क्या संस्कृत का ‘शिव’ यहूदियों के ‘शिव’ से भिन्न नहीं? लोग समझते हैं संस्कृत का ‘सप्ताह’ शब्द और फारसी का ‘हफ्ता’ शब्द एकार्थवाची होने के कारण एक ही धातु से निकले हैं । यह उनका भ्रम है। हफ्ता एक ऐसी धातु से निकला है, जो संस्कृत- सप्ताह शब्द से कोई संबंध नहीं रखता। फारसी में से (से), स. (स्वाद), स (सीन), श (शीन) ऐसे चार वर्ष हैं, जिनका उच्चारण एक-दूसरे से बहुत कुछ मिलता है। अतएव सप्ताह का ‘स’ हफ्ता के ‘ह’ में कभी नहीं बदल सकता। हफ्ता शब्द सप्ताह का अपभ्रंश नहीं। जो कोई उसे सप्ताह का अपभ्रंश समझतें हैं वे भूलते हैं।
ईसा के पाँच सौ वर्ष बाद मोहम्मद का जन्म हुआ। उनके जन्म के कोई साढ़े सात सौ वर्ष बाद मुसलमानों ने हिन्दुस्तान में प्रवेश किया। यदि हिन्दू शब्द मुसलमानों का बनाया हुआ है तो उसकी उमर बारह सौ वर्ष से अधिक नहीं। परन्तु पाठकों को जानकार आश्चर्य होगा कि ‘हिन्दू’ शब्द ईसा के जन्म से भी कई हज़ार वर्ष पहले का है। तो फिर क्या वह वेद में है? नहीं! फिर कहाँ है? वह अग्निपूजक पारसियों के धर्मग्रन्थ ‘जेंदावस्ता’ में। जिन पारसियों को आजतक हिन्दू लोग धर्म संबंध में बुरी दृष्टि से देखते हैं उन्हीं के प्राचीनतम ऋषियों और विद्वान पंडितों ने हिन्दू शब्द के आदिम रूप को अपने धर्मग्रन्थ में स्थान दिया है। वह आदिम रूप हन्द् शब्द है । यहूदियों की धर्म पुस्तक ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ (‘बाइबिल’ के पुराने भाग) में भी ‘हन्द्’ शब्द पाया जाता है। अब देखना है कि इन ग्रन्थों में से अधिक पुराना ग्रन्थ कौन सा है।41
क्रिश्चियन लोगों का कहना है कि ‘बाइबल’ का पुराना भाग क्राइस्ट से पांच हज़ार वर्ष पहले का है इसमें कोई संदेह नहीं। इसे वे पूरे तौर पर सच समझते हैं ।”Our Zendavesta is as ancient as the creation; it is old as the Sun or the Moon.”
“अर्थात् धर्मग्रंथ ‘जेंदावस्ता’ इतना पुराना है जितना यह सृष्टि; वह इतना प्राचीन है जितना सूर्य या चन्द्रमा” पारसियों की यह उक्ति सच है उसके प्रमाण है—
(1) यहूदियों का धर्मशास्त्र ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ ‘हिंब्रू अर्थात् इब्रीय भाषा में है और पारसियों का जेंदावस्ता’ जेंद भाषा में। हिंब्रू भाषा की अपेक्षा जेंद भाषा बहुत पुरानी है।
(2) ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में अनेक नए-नए स्थानों और जंगलों का नाम है वे स्थान और जंगल ‘जेंदावस्ता’ के समय में न थे।
(3) हाल साहेब और मि० मलाबारी कहते हैं कि पुरानी पारसी जाति में मनु आर्ष विवाह के सामान सभी विवाह पद्धति प्रचलित न थी। परन्तु ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में इस तरह एक विवाह का वर्णन है। ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ के प्रचार के पूर्ववर्ती समाज से जिस प्रकार विवाह प्रथा प्रचलित थी उसका वर्णन जेंदावस्ता’ में है।
(4) ‘जेंदावस्ता’ में यहूदी शब्द या यहूदी जाति का नाम नहीं है, किन्तु ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में कम से कम नोऊ दफा पर्सी जाति का जिक्र है।
(5) ‘बाइबिल’ में कई जगह लिखा है कि पारसियों ने यहूदियों को जीतकर बहुत काल तक उनके देश में राज्य किया। किन्तु यहूदियों में किसी ने पारसियों को विजय नहीं किया।
(6) अग्निपूजा पृथ्वी की प्राचीन जातियों की सबसे अधिक प्राचीन प्रथा है। ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ के समय में अग्निपूजा बंद हो गई थी, पर जेंदावस्ता’ के समय में उसका खूब प्रचार था। इन प्रमाणों से सिद्ध है कि ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ से ‘जेंदावस्ता’ अधिक पुराना ग्रन्थ है।

बँगला संवत् १३०६ के ज्येष्ठ की ‘भारती’ नामक बँगला मासिक पत्रिका में ‘भारती’ संपादिका श्रीमती सरलादेवी, बी.ए. लिखित एक प्रबंध छपा। उसका नाम है ‘हिन्दू और निगर’ उसमें लिखा है, “हिन्दू शब्द संस्कृत सिंधु से उत्पन्न नहीं है।…..’जेंदावास्ता’ नामक पारसियों का पुराना धर्मग्रंथ वेदों के समय का है। उसमें हिन्दू शब्द का एक दफा आया है। हारोबेरोजेति (अल्बुर्ज) पहाड़ के पास पहले-पहले ऐर्यन-वयेजो (आर्य निवास) था। धीरे-धीरे अहर्मजदा ने (पारसियों के परमेश्वर ने) सोलह शहर बसाए। उनमे से पंद्रहवें शहर का नाम हुआ ‘हफ्तहिंदव’। वेदों में इसी को ‘सप्तसिंधव’ कहते हैं। ‘जेंदावस्ता’ में तीन-इयास्ते नामक एक पहाड़ के लिए भी एक बार हिंदव शब्द आया है। अनुमान होता है कि यहीं ‘हिंदव’ शब्द आजकल के हिंदुकुश पर्वत का पिता है।”
व्यवहार में न आने के कारण यह मूल अर्थ धीरे-धीरे भूल गया। तब बहुत दिनों के बाद व्याकरणाचार्यों ने ‘स्पंद’ धातु के आगे औणादिक् ‘अ’ प्रत्यय लगाकर, किसी तरह तोड़-मरोड़ कर समुद्रार्थ-बोधक सिंधु शब्द पैदा कर दिया। यह उनकी सिर्फ कारीगरी मात्र है इत्यादि। यह बात बिलकुल नई है। इसके पहले और किसी ने इसका पता नहीं लगाया। इससे मालूम हुआ कि हिन्दू शब्द यवनों की संपत्ति नहीं, उसे मुसलमानों ने नहीं बनाया। ‘जेंदावस्ता’ नामक अति प्राचीन और पारसियों के अति पवित्र ग्रन्थ में उसका प्रयोग सबसे पहले हुआ। ‘जेंदावस्ता’ ग्रन्थ वेदों का समसामयिक है। प्राचीन पारसी लोग अग्निहोत्री (अग्नि के उपासक) थे। आजकल के पुरातत्वज्ञ उनकी गिनती प्राचीन आर्यों में करते हैं।
अभी तक आपने हिन्दू शब्द का सिर्फ स्न्कुर देखा। तब देखिये अन्कुरोत्पन्न वृक्ष और उसके बाद वृक्षोंत्पन्न फल। कहिये कि उसमें जुदा-जुदा ३९ पुस्तकें हैं। उसमें से सत्रहवीं पुस्तक का नाम है ‘दि बुक ऑफ़ यस्थर’ (The Book of Esther) इसका हिब्रू नाम है ‘आजथुर’ इसके पहले अध्याय में है—
“Now it came to pass in the days of Ahasuerus, this is Ahasuerus, which reigned from India even to Ethiopia, over an hundred and seven and twenty province— Esther, Chapter I. Verse.”

अर्थात् अहासुर राजा ने इंडिया से इथियोपिया तक राज किया। अब इस बात का विचार कारण है कि ‘इंडिया’ (हिंदोस्तान) शब्द किस अर्थ का वाचक है। याद रखिए, यहूदियों का ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ ग्रन्थ ईसा के पांच हज़ार वर्ष पहले का है वह हिब्रू भाषा में है। उसी के अंग्रेजी अनुवाद में ‘इंडिया’ शब्द आया है। अच्छा तो यह ‘इंडिया’ शब्द किस हिब्रू शब्द का अनुवाद है। वह पूर्वोल्लिखित ‘हन्द्’ शब्द का भाषांतर है। हिब्रू में ‘हन्द्’ शब्द का अर्थ है – विक्रम, गौरव, विभव, प्रजा, शक्ति, प्रभाव इत्यादि। यह बात ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में अवतरणों से साबित की जा सकती है। कितु उन सब प्रमाणों को देने से लेख अधिक बढ़ जाएगा। इसलिए हम उनका उल्लेख नहीं कर रहे है। अब ‘आजथुर’ पुस्तक से जो वाक्य ऊपर दिया गया है, उसके अर्थ विचार कीजिए- आहासुरस् राजा ने ह्न्द् (शक्ति) से इथियोपिया तक राज्य किया। जिस तरह अंग्रेजी में बहुधा गुण-वाचक शब्द का परिचय सिर्फ उनके हूणों के उल्लेख से होता है उसी तरह हिब्रू भाषा में भी होता है। अतएव ‘ह्न्द् से इथियोपिया तक राज्य किया’ इस वाक्य का अर्थ हुआ ‘ह्न्द् (शक्ति विशिष्ट राज्य) से लेकर इथियोपिया तक राज्य किया।’ जिनको इस बात पर विश्वास न हो वे डॉ. हेग का बनाया हुआ अंग्रेजी-हिब्रू व्याकरण देखने की कृपा करें।

यहूदी एलपीजी ग्रीक लोगों से पुराने हैं। ग्रीस में एक ऐतिहासिक लेखक हुए है। उसका नाम था मिगास्थनिज। उसने एक जगह लिखा है- “यहूदी लोगों ने पारसियों से ज्ञान और शिक्षा और भारतीयों से धन और प्रभुत्व प्राप्त किया था।” यहूदियों ने भारतवर्ष में व्यापार करके बहुत धन कमाया था, यह बात यहूदियों ने अपने ही लिखे इतिहास में स्वीकार की है। उसके और भी अनेक प्रमाण ग्रीस और रोम-विषयक पुस्तकों में पाए जाते हैं। यहूदी राजा दाऊद के पुत्र सालोमन के विश्व-विख्यात मंदिर के लिए लकड़ी, चूना, पत्थर इत्यादि मसाला हिंदोस्तान से लाया गया था। थराक्लूस नामक एक ग्रीक ग्रन्थकार ने लिखा है, “भारतवर्ष का विक्रम और गौरव देखकर ही यहूदी लोग इस देश को ह्न्द् कहकर पुकारते थे।” अब यह देखना है कि यहूदी लोगों ने इस हन्द् शब्द को पाया कहाँ से? पाया उन्होंने पारसियों के ‘जेंदावस्ता’ से प्रमाण–
(1) यहूदियों के देश में बहुत काल तक पारसियों ने राज्य किया। उनके राज्यकाल में यहूदी अदालतों में जेंद भाषा ही बोलते थे। वे लोग ‘जेंदावस्ता’ पढ़ते थे। इससे -पारसियों के हिंदव शब्द से यहूदी जरुर परिचित रहे होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।
(2) यहूदियों ने ‘जेंदावस्ता’ से अनेक देश, पर्वत और नदियों आदि के नाम लिए हैं, यथा–

जेंद भाषा – हिब्रू भाषा
तराशश् (Taurus) – तरश्
मोशूजा – मोशजा
मजदाहा – मेशाया (Messeah)
कोशा – कोशा
आर् द्जु – इयारनउ

हिब्रू भाषा कोई स्वतंत्र भाषा नहीं। वह जेंद भाषा से उत्पन्न है। अतएव यह बात अखंडनीय सत्य है कि जेंद भाषा के हिंदव शब्द ने ही हिब्रू भाषा में ह्न्द् रूप धारण किया। उसकी पुष्टि में अनेक प्रमाण दिए जा सकते हैं।
पाठक बंधुओं, आपने महाजनों की मुँड़िया लिपि देखी है। न देखी होगी तो उसकी विशिष्टता से आप जरुर वाकिफ होंगे। इससे बाबा, बीबी, बूबू, बोबो सब एक ही तरह लिखे जाते है। अपेक्षित शब्द पढनेवाले अपनी बुद्धि से पढ़ लेते हैं। इसी कारण से कभी-कभी मामा की मामी, किश्ती की कुश्ती, घड़ा का घोड़ा और ‘अजमेर गए’ का आज मर गए’ हो जाता है। हिब्रू भाषा भी ऐसी ही है। उसमें भी इकार, उकार आदि नहीं है। वह दाहिने हाथ की तरफ से लिखी जाति है। उसकी पुत्री अरबी और फारसी भाषा है। इन दोनों भाषाओँ में जेर, जबर और पेश आदि चिन्हों के प्रयोग व्याकरणों में आकार, इकार और उकार का उच्चारण किसी प्रकार निश्चित कर लिया है। किन्तु हिब्रू में यह बात अब तक नहीं हुई। उसी वरमाला में सिर्फ दो ही एक स्वर हैं, सो भी अपरिस्फुट चिन्हों के द्वारा अनेक शब्दों का उच्चारण होता है। इससे क्या होता है कि बहुत स्थलों में इकार का लोप हो जाता है। देखिए–

जेंद हिब्रू
किरियाद् – करयोयद्
शिकना – सकना
हिशिया – अशय
हिज्रद – यजानुद
विरजोद् – वरजाद

यदि हम यह कह दें कि हिब्रू में हकार है ही नहीं तो भी अत्युक्ति न होगी। जो शब्द खास हिब्रू का नहीं है उसमे पूरा इकार नहीं होता । उच्चारण में इकार होने से भी वह लिखा नहीं जाता। यथा—

हिब्रू उच्चारण – हिब्रू लिखावट
जिहोवा – जहोवा
इञ्जिल – अञ्जल्
इश् राइल – चश् रहिल
इजाया – भाजाया
इयाकुब – आकुब
मरियम – मरम्

अतएव जेंद शब्द हिंदव का इकार यदि हिब्रू में उड़ जाए तो आश्चर्य ही क्या है? अच्छा, इकार तो यों गया; अब यह बतलाइये कि ‘हिंदव’ का ‘व’ कार कहाँ और किस तरह गया? सुनिए, उसका भी हम पता बतलाते हैं। हिब्रू भाषा में त, थ, द, च, छ, ड आदि अक्षरों का उच्चारण होने से व, फ और य का लोप हो जाता है। दृष्टांत–

हिब्रू शब्द – उच्चारण में लोप
तोवा – तोहा
असथुवा – अस्थुहा
संदव – संद अथवा सनद्
गदव् – गद्
डाग्दब् – दाग्द्
अदावा – आदाहा

1456486937-0064अतएव पारसियों के ‘जेंदावस्ता’ का पवित्र हिंदव भाषा में ‘ह्न्द्’ हो गया। जो कुछ यहाँ तक लिखा गया उससे सिद्धांत निकला कि-
1. हिन्दू शब्द पहले ‘जेंदावस्ता’ में प्रयुक्त हुआ।
2. पर्सी लोग इस शब्द के सृष्टिकर्ता हैं।
3. यहूदियों ने इसे अपनी भाषा में लेकर ह्न्द् कर दिया।

हिंदोस्तान से ग्रीक लोग बहुत दिनों से परिचित थे। उनको इस देश की खूब अभिज्ञता थी। जिस रास्ते से ग्रीक लोग हिंदुस्तान आते थे उस रास्ते में एक पहाड़ पड़ता था। कई कारणों से उन्हें उनके पास ठहरना पड़ता था। इस रास्ते का वर्णन उन्होंने आहासुरस् राजा की पुस्तक में पढ़ा था। बर्फ से ढ़ंकी हुई और बहुत ऊँची पर्वत-माला को रास्ते में देखकर ग्रीक लोगों ने अपने साथियों से इनका नाम पूछा।उन्होंने कहा इसका नाम हम नहीं जानते। किन्तु इनके साथ एक पुरोहित भी था। उसने कहा, “मैंने सुना है कि इसके एक तरफ ह्न्द् देश की सीमा है। तथा दूसरी तरफ इथियोपिया राज्य की राजनीतिक सीमा” इसी इथियोपिया राज्य का हिब्रू नाम है कुश ( Cush ). ‘बाइबिल’ (ओल्ड टेस्टामेंट) की पहली पुस्तक, जेनोसिस के दूसरे अध्याय की तेरहवीं आयत में है- “And the name of the second river is Gibon; the same is it that compasseth the whole of the Ethiopia.”

जहाँ पर यह आयत है उसके किनारे टीका में लिखा है कि इथियोपिया को यहूदी लोग कुश कहते थे। मूल हिब्रू में इथियोपिया नहीं है, उसकी जगह कुश ही है। इसी कुश शब्द ने भाषा में कोश ( Cosh ) का रूप धारण किया। यह कोश शब्द चेतना-विशिष्ट पुल्लिंग है। जैसा ऊपर कहा जा चुका है, कोश इथियोपिया राज्य का नाम है। हिब्रू भाषा की तरह ग्रीक भाषा के व्याकरण के अनुसार भी कोश शब्द गुणवाचक है। हिब्रू भाषा में कुश या कोश शब्द का अर्थ सीमा भी होता है और पर्वत भी होता है। इसी कुश या कोश से ‘को:’ ‘कोहे’ शब्द निकलते हैं, जिनका अर्थ अरबी और फ़ारसी भाषा में पर्वत था। पुराने ज़माने में इस देश की पश्चिमी सीमा हिंदूकुश पर्वत था। रघु की दिग्विजय में, महाभार्तोक्त गांधारी के विवाह-वर्णन में और पुराने भूगोल में इस बात का प्रमाण मिलता है कि हिंदूकुश के आस-पास भारतीय राजाओं का राज्य था, किन्तु इसके आगे न था, इन्ही कारणों से ग्रीक लोगों ने ह्न्द् देश की सीमा के अथवा ह्न्द् देश के सीमाज्ञापक पर्वत के अर्थ में इस पहाड़ का नाम ‘ह्न्द्कोश’ (Hankosh) रखा। यह बात युक्तिसंगत और संदेह-हीन है। ग्रीक भाषा में पर्वत शब्द पुल्लिंग और चेतनावान है। अपभ्रंश होते-होते वह ‘ह्न्द्कोश’ से ‘इंडिकस’ हो गया। यही ‘इंडिकस’ अंग्रेजी राज्य में इंडिया (India) हुआ। अब देखिए, ‘जेंदावास्ता’ का हिंदव हिब्रू भाषा में हुआ ‘ह्न्द्’ ग्रीक भाषा में हुआ ‘ह्न्द्कोश’ इंडिकस। ग्रीक भाषा का इंडिकस अंग्रेजी में हुआ है इंडिया।

हिंदूकुश से अटक के किनारे तक जो लोग रहते हैं वे पश्तू भाषा बोलते हैं। ये लोग फ़ारस के आदिम निवासी हैं फ़ारसी से उनकी भाषा बहुत मिलती है। धर्मांतर ग्रहण करने के पहले ये लोग पारसियों की तरह अग्निपूजक थे। इन्हीं पश्तू बोलनेवाले भारतवासियों ने अर्थात् ‘जेंदावस्ता’ के माननेवाले अग्निसेवक पुराने पारसियों के वंशधरों ने, ‘ह्न्द्’ शब्द के आगे हृस्व उ प्रयोग कर उसे ‘हंदु’ के रूप में बदल दिया। पश्तू व्याकरण के अनुसार ‘ह्न्द्’ और हिन्द् शब्द के उत्तर हृस्व उ प्रत्यय करने से ‘युक्त’ अर्थ होता है। उ प्रत्यय होने से ‘ह्न्द्’ अर्थात् शक्ति, गौरव, विभव, प्रभाव इत्यादि महिमायुक्त जातिसूचक होती है। क्योंकि पश्तू-व्याकरण के नियमानुसार उ प्रत्यय ‘गुब्वाचक जाति या गुणवाचक पुरुष के आगे होता है।’ प्राचीन आर्य हिंदू जाति के गौरव, पवित्रत्व और विभव आदि को देस्खकर ही पश्तू बोलनेवालों ने उस प्रत्यय का प्रयोग किया था। पश्तू भाषा में ‘ह्न्द्’ और हंदु शब्द गौरववाचक है। इसके प्रमाण में पश्तू भाषा के दो पद्य नीचे पढ़िए-

युश् रो लबोदे जग्ड़ीर फेजो पाना ।
उरो उरो न लखियाल् लहैं जग्ड़रे
ह्न्दु जेल् फाल्गो ।।१।।

देवाट् देरन् ज, जरर् उहें रम् ।
कत्लेबे यत्वे देश् तर् गो ।।
ह्न्दु कम् सां डेरो ।।२।।

इस प्रकार ‘जेंदावस्ता’ का हिंदव शब्द पश्तू में ‘हंद’ तक पहुँचा। सिक्ख धर्म-प्रवर्तक गुरु नानक के सैनिक शिष्यों ने गुरुमुखी भाषा में सूए ‘हिंदु’ कर दिया। नानक के पहले यह शब्द हिंदव्, सिंधव्, हन्द् और हंद तक रहा। हिंदु वंशावतंस सिक्खों ने अंत में उसे ‘हिंदू’ के रूप में परिवर्तित कर दिया। जो लोग कहते हैं कि हिंदू शब्द सीमाबद्ध है वे बड़े ही भ्रांत हैं। कहाँ फ़ारस, कहाँ यहूदी देश, कहाँ ग्रीस, कहाँ अहासुरस का राज्य। सब कहीं वही प्राचीन हिन्दू नाम!images
इस विवेचन से सिद्ध हुआ कि हिंद् शब्द का अर्थ है विक्रमशाली, प्रभावशाली आदि। सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक जाकोलियेत (Jaquliethe) ने अपने एक ग्रन्थ में लिखा है- “असाधारण बल और अशाधारण विद्वता के कारण पूर्वकाल में भारतवर्ष पृथ्वी की साड़ी जातियों का आदरपात्र था। “जिस हिंदू जाति की साधुता, वीरता, विद्या, वैभव और स्वाधीनता आदि देखकर पारसी, यहूदी, ग्रीक और रोमन लोग मोहित हो गए और मुसलमान इतिहास-लेखकों ने जिस देश को स्वर्ग-भूमि कह कर उल्लेख किया, क्या उसी देश के रहने वाले, काफिर, काले, गुलाम कदाकार और परस्वापहारी कहे जा सकते हैं? यह बात क्या कभी विश्वास योग्य मानी जा सकती है? हिंदू शब्द कदर्थबोधक नहीं, हिंदू शब्द गौरव, गरिमा, विक्रम और वीरत्व का व्यंजक है । तो कहिए, क्या आप अब हिंदू-नाम छोड़ देना चाहते हैं? जो ज्ञान, विज्ञान और सर्वशास्त्रीय तत्त्वों का आदर्श है, जो प्राणशीतलकारी ब्रह्म-विद्या का आकर है, जो विक्रम और वैभव का खानि है वही पवित्र और प्रशस्त्र हिंदू-नाम हमारे मस्तक की मणि है, हमारे देश का गौरव है, हमारी अर्थ जाति के जातीय जीवन का पुन:रुद्दीपक है हिंदू एक शब्द है, एक ऐसा नाम है, जिसके उच्चारण से भग्न हृदय में फिर से आशा का संचार हो जाता है; क्षीण देह में बल-स्त्रोत फिर वेग से बहाने लगता है; अंत:करण में जातीय गौरव का फिर अभ्युदय हो जाता है और मन में ब्रह्मानंद का अतर्कित अनुभव होने लगता है। तब हिंदू -नाम हम क्यों छोड़ें?

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