हिंग्लिश प्रयोग से भाषा का अवमूल्यन


डॉ. अंजनी कुमार झा

हिन्दी पत्रकारिता में अंग्रेजी शब्दों के अधिकाधिक प्रयोग से भाषागत विकृति और लालित्य में कमी से एक बड़ा सांस्कृतिक संकट खड़ा हो गया है। चार-पाँच शब्दों क शीर्षक में तीन शब्द आंग्ल के होते हैं। इंट्रो में भी धड़ल्ले से विदेशी भाषाओं का प्रयोग हो रहा है। अनुवाद में त्रुटियों के अतिरिक्त, वाक्य-विन्यास, शब्द-चयन में लापरवाही और अज्ञानता साफ-साफ झलकता है। यह गंभीर चिंता का विषय है।

हिन्दी पत्रकारिता के उद्भवकाल से लेकर आपातकाल के दौरान तक भाषा-सौष्ठव पर विशेष ध्यान दिया जाता था। संपादक भाषा के साथ विषय के निष्णात भी होते हैं। पत्रकारों के चयन में भाषा पर पकड़ की जाँच-पड़ताल बड़ी सख्ती से की जाती थी। पत्र-पत्रिकाओं में छपे शब्द अमूल्य होते हैं। इसके जरिये स्कूली बच्चों से लेकर वृद्ध तक आज भी ज्ञानार्जन करते हैं। ऐसी स्थिति में लेशमात्र भी अशुद्धि, त्रुटि भीषण अपराध माना जाता था। इस कारण उस दौर में संपादक-पत्रकार उच्चकोटि के होते थे। माखनलाल चतुर्वेदी, माधवराव सप्रे, महावीर प्रसाद द्विवेदी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गणेश शंकर विद्यार्थी, रामवृझ बेनीपुरी, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी जैसे अनेक विभूति संपादकों की लंबी श्रृंखला है जिनके अनथक प्रयत्नों से हिन्दी पत्रकारिता पुष्पित-पल्लवित होती रही। भू-मण्डलीकरण के दौर में हिन्दी पत्रकारिता को बाजार का एक प्रोडक्ट (उत्पाद) बना दिया गया। अल्पज्ञ संपादक-पत्रकारों की नियुक्ति होने लगी, जिससे भाषा-सौंदर्य, भाषा-अनुशासन खत्म सा हो गया। अंग्रेजी, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं के अनर्गल प्रयोग से यह हिंग्लिश हो गया। इसे हिन्दी पत्रकारिता की विफलता माना जायेगा।

1शीर्षक: उभरती प्रतिभाओं के नाम रहा यूथ फेस्टिवल, म्यूजिक वीडियो के लिये ऑडिशन, आर्ट ऑफ लिविंग का हैप्पीनेस प्रोग्राम शुरू, छक्।-2 के ई-एडमिट कार्ड पोर्टल पर, कैजुअल वियर में अब हैंड स्टिच्ड सूट्स का फैशन, इंस्टेंट ग्लो के लिये ऑर्गेनिक वाईन फेशियल, सी.ए. कांउसिल ने तैयार किया नया सिलेबस जैसे कई हिंग्लिश शीर्षक हैं जो घोर संशय पैदा करते हैं। संपादक अब उपसंपादक और संवाददाताओं से भी हिंग्लिश में कापी लिखने को कहते हैं। तर्क दिया जाता है कि यही समय की माँग है। नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर की हिंग्लिश वाली शैली का कई अखबार अनुकरण कर रहे हैं। कारण, पाठक वर्ग को बांध कर रखना और ग्राहक संख्या में अभिवृद्धि की योजना पर काम करना।

संपादक होने का धर्म एक अनुष्ठानिक दायित्व की पूर्ति न होकर एक नैतिक कर्म है। पाठकों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता, लेखन की तेजस्विता और गुण-दोष की निर्मम समीक्षा की निर्भीकता पाठकों से कहीं ज्यादा प्राप्त होती है। व्यावसायिकता के दायरे से ऊपर उठकर सरोकारों को महत्व देने की आवश्यकता है। रोमन में हिन्दी लिखने के चलन फेसबुक, एसएमएस, नोटबुक में धड़ल्ले से हो रहे हैं। यह बिलकुल गलत है। संस्कृति की संवाहक भाषा के साथ हो रहे खिलवाड़ को पत्रकारिता के जरिये रोका जा सकता है, किन्तु ‘‘बाजार’’ की आड़ में सब कुछ चलता है, कहकर स्वाभिमान, स्व-अनुशासन, संस्कृति, सरोकार को नष्ट किया जा रहा है। यदि हमारे राष्ट्रीय जीवन का आयोजन और मार्गदर्शन अंग्रेजी में निहित आदर्शों के अनुसार होता है, तो यह हमारी मानसिक दासता का चिन्ह है। अंग्रेजी के माध्यम से पश्चिम की नकल करके हम विश्व को जो कुछ दे सकते हैं, उससे कई गुना अधिक मूल्यवान योगदान हम अपनी भाषाओं के द्वारा दे सकते हैं। हिन्दी विश्व की सबसे नवीनतम भाषा है। इसके बाद दुनिया में कोई भाषा रची नहीं गई। रामचन्द्र शुक्ल ने जनवरी 1908 में ‘‘सरस्वती’’ में लिखा, ‘‘हिन्दी भाषा उत्तरी हिन्दुस्तान में सबसे अधिक ओजस्विनी भाषा है और अपनी सफाई और लचक के कारण वैज्ञानिक विचारों को व्यक्त करने के लिये भली-भाँति उपयुक्त है।’’ दिसंबर 1887 के ‘‘इंडियन मैगजीन’’ में श्री शुक्ल ने लिखा, ‘‘हिन्दी के अंतर्गत जितनी बोलियाँ हैं, इन बोलियों का समग्र समुदाय एक ही भाषा है। यथार्थ भाषा संबंधी प्रश्न जो आज 30 वर्ष से उत्तरी भारत में उठ रहा है, लिपि विषयक है। जब तक फारसी अक्षरों का एकाधिपत्य रहेगा और सब लोग अपनी देशी नागरी को सरकारी कागज पत्रों में व्यवहार करने से रोके जायेंगे, तब तक उत्तरी भारत की भाषा पर बुरा प्रभाव पड़ता जायेगा।

राजा राम मोहन राय की ‘‘संवाद कौमुदी’’ (1821) नव जीवन (1919) आदि के उद्देश्य स्पष्ट थे। पत्र का निःशुल्क वितरण, नाम मात्र के वेतन, प्रबंध का शून्य हस्तक्षेप, जेल की यातना सहने में आनंद ने समाचार पत्र-पत्रिका को रचनाधर्मिता के साथ जन आंदोलन का अटूट हिस्सा बना दिया। भाषागत शुद्धियों पर विशेष बल दिया जाता था, किन्तु वैश्वीकरण के अंधयुग ने सब कुछ समाप्त कर दिया। विपणन प्रभाग ही अब सर्वेसर्वा बन गया। स्वामित्व में तेजी से बदलाव के कारण भी भाषानुशासन खत्म हो गया। बाजार की अनुभूत आवश्यकताओं की एकतरफा सोच के कारण न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका की सनसनीखेज घटना हिंग्लिश की भाँति परोस दी जाती है। इससे समाचार पत्र-पत्रिका की पादर्शिता पर दाग लगता है।

हिन्दी पत्रकारिता की लोकतांत्रिक शक्ति ही यही है कि वह साधारण लोगो से सीधी जुड़ी हुई है। प्रश्न उठता है कि क्या हिन्दी पत्रकारिता व्यावसायिकता के उन मूल्यों का ही अनुकरण करेगी जिनके कारण हम न केवल एक गंभीर सांस्कृतिक संकट के सम्मुखीन हैं, बल्कि हमारा भौतिक जीवन भी तहस-नहस हो रहा है। इसे अगर अपने पाठकों से सच्चा भावनात्मक रिश्ता कायम करना है, तो उसे विचारों और आदर्शों की रचनात्मक प्रक्रिया से गुजरना ही पड़ेगा। तीन संकट-यथार्थ, आदर्श और विस्तार का एक केन्द्रीय कथानक तलाश कर सकते हैं। चिंतनीय पहलू है हिन्दी क्षेत्र का सांस्कृतिक दैन्य। राष्ट्र बोध के खत्म होने से मूल्यों में क्षरण स्पष्ट दिख रहा है। भाषा के प्रति प्रबंधन की उदासीनता का नतीजा है कि संपादक और कर्मियों की नियुक्ति में योग्यता बहुत मायने नहीं रखता। इसका दुष्परिणाम है कि पत्र तो बड़े सुंदर आकर्षक कलेवर में निकलते हैं किन्तु तथ्य, कथ्य, भाषागत अशुद्धियों की भरमार रहती है। दुनियां में न्याय-व्यवस्था और मीडिया से आवाम को बड़ी उम्मीद है। इस चुनौती का सामना करने और पारदर्शिता बनाये रखने के लिये नितांत आवश्यक है कि अशुद्धियों और त्रुटियों को दूर करने का पुराना तंत्र यथा उप संपादक, प्रूफ रीडर की नियुक्ति और भाषा पर पकड़ रखने वालों को जगह देने जैसे अवयव को पुनः विकसित करने की जरूरत है। नई पीढ़ी का भाषा के प्रति उपेक्षापूर्णरवैया, संस्कृति से इन्हें दूर कर देगा, जो राष्ट्र के लिये घातक होगा।

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