स्वेदशी आंदोलन के प्रेणता बिपिन चंद्र पाल


डॉ अंजनी कुमार झा

bipin-chandraस्वेदशी आंदोलन के प्रेणता
सुविख्यात त्रिमूर्ति लाल-बाल-पाल के बिपिनचन्द्र पाल ;1858-1932द्ध ने अपने जीवन काल में अपने देशवादियों को
सम्मोहित कर दिया था और निःसंदेह बंगाल-विभाजन के स्वदेशी आन्दोलन के वे जननायक थे। उनके समकालीन
विद्वानों ने देशभक्ति की इस अभूतपूर्व लहर में महान योगदान के असंख्य प्रमाण दिये।
स्वदेशी आन्दोलन के एक सक्रिय नेता विनय कुमार सरकार ;1887-1949द्ध ने पाल के बारे में कहा कि ‘‘वे 1905
के स्वर्णिम स्वदेशी आन्दोलन के प्रणेताओं में से एक थे। किसी अन्य की अपेक्षा, युवा बंगाल की क्रांतिकारी राजनीति
के दर्शन के निर्माण में पाल की सबसे बड़ी भूमिका थी ओर वे मद्रास तथा दक्षिण भारत को इसमें सम्मिलित करने में
सपफल रहे। इसी प्रकार जिस चरमपंथी राष्ट्रीयता ने बंगाल और बम्बई को एक जुट कर दिया था उसके प्रणेता भी पाल
ही थे………..।’’1
इसी प्रकार की भावना राष्ट्रवादी नेता बी. ए श्रीनिवास शास्त्राी ;1869- 1946द्ध, जिन्होंने मद्रास का विलय
होते देखा था, व्यक्त किये हैः
‘‘मद्रास में बाबू बिपिन चन्द्र पाल, नई राजनैतिक विचारधरा के प्रबलतम प्रचारक थे, क्रांति की ज्वालामुखी
के विस्पफोटक थे। समुद्र तट के किनारे अनेक दिनों तक वे भावुक होकर संवेदनात्मक भाषा में अकाटय तर्क देते रहे
जो संध्याकालीन सुगंध्ति बयार में बहकर हजारों हजार श्रोताओं के दिलों दिमाग में क्रांति की ज्वाला भरते थे। भारत
में भाषण कला की विचक्षणता और विलक्षणता का इससे श्रेष्ठ उदाहरण नहीं है और बोले जाने वाले शब्दों का इतने
प्रभावकारी शक्ति से प्रदर्शन भी किसी ने नहीं किया था।1
देशभक्ति के देवदूत
2 अरविन्द घोष ;1872-1950द्ध जो स्वदेशी आन्दोलन में उसके शुरू होने के एक वर्ष बाद आए और उनके
सानिध्य में कार्य करते रहे, उन्होंने पाल के बारे में लिखा है कि वे ‘‘देशभक्ति के देवदूत थे’’2 और देश के मौलिक
विचारकों में से थे।
अंग्रेजी दैनिक वन्दे मातरम में उनके साथ काम करने वाले सहयोगी हेमेन्द्र प्रसाद घोष ने उन्हें ‘‘एक विद्रोही
और एक देवदूत’’ के रूप में पुकारा और कहा कि वे अपने समय से बहुत आगे की सोच रखते थे।
विवेकानन्द से प्रभावित
जब बंगाल को विभाजित करने की अंग्रेजों की योजना पहली बार प्रकाश में आई, तो पैंतालिस वर्षीय बिपिन
चन्द्र पाल एक आदर्शवादी, सुधरक और लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके थे। सुधर के क्षेत्रा में उन्होंने पंडित
शिवनाथ शास्त्राी का अनुकरण किया जो केशव चन्द्र सेन से अलग हो गये थे और जिन्होंने ‘‘साधरण ब्रह्म समाज’’
की स्थापना की। उन्होंने वैष्णव संत विजय कृष्णास्वामी से आध्यात्मिक प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त किया और राजनीति
में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी का अनुकरण किया और उनकी भांति ही वे भी अंग्रेजी शासको की न्यायप्रियता और उदारता में
गहन विश्वास रखते थे। आध्यात्मिक और बौ(िक रूप में प्रेरित होकर उन्होंने कलकत्ता और मद्रास में क्रमशः 1886
और 1887 के कांग्रेस सम्मेलनों में भाग लिया। उस समय तक लोग उनकी और ध्यान देने लगे थे क्योंकि उन्होंने
अपने संक्षिप्त भाषण में आर्म्स एक्ट को रद्द करने की मांग की थी।
पाल दो वर्ष ;1899-1900द्ध तक इंग्लैड और अमेरिका में रहे। और वहां वे स्वामी विवेकानन्द की पश्चिमी
देशों में मान्यता देख कर बहुत प्रभावित थे। विदेश में पाल सिस्टर निवेदिता से भी मिले थे और जब वे भारत लौटे तो
एक नई दृष्टि और कल्पना लेकर आए।
राष्ट्रीयता से ओत-प्रोतः
12 अगस्त, 1901 को पाल ने अंग्रेजी साप्ताहिक ‘‘न्यू इंडिया’’ शुरू किया। उसके पहले अंक में ही उन्होंने
अपने आदर्शो का उल्लेख किया। भावोत्तेजक ढंग में उन्होंने घोषणा की कि ‘‘इसका मत गहन राष्ट्रीयता के भाव से
ओत-प्रोत है, इसकी भारतीय सभ्यता की आध्यात्मिक, नैतिक और बौ(िक उपलब्ध्यिों के प्रति अगाध् श्र(ा है और
उसकी आकांक्षाएं स्पष्टतः सार्वभौमिक है।’’ ‘न्यू इंडिया’ ने मुख्य रूप से भारत के आर्थिक और शैक्षणिक पुनर्निमार्ण
के मुद्दों पर प्रकाश डाला और जान-बूझकर उन्होंने केवल राजनैतिक आन्दोलन पर जोर देने के बजाय सांस्कृतिक
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पुनरूत्थान पर अध्कि जोर दिया। कलकत्ता में 26 जून 1902 को जब राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रदर्शन के रूप में पहली
बार शिवाजी उत्सव मनाया गया तो पाल मुख्य वक्ता थे।
बंगाल विभाजन क ब्रिटिश योजना ने पाल के जीवन को नई दिशा प्रदान की। ‘न्यू इंडिया’ सांस्कृतिक
पत्रिका थी परंतु विभाजन से उसका कायाकल्प एक प्रमुख राजनैतिक साध्न के रूप में कर दिया। इस निर्णायक
योजना के विरू( बंगाली जनता ने तत्काल जो व्यापक और स्वाभाविक विरोध् तुरन्त प्रकट किया उसे देखकर उन्होंने
स्वयं को आन्दोलन में पूर्णतः समर्पित कर दिया। बंगाली जनता के व्यापक विरोध् के प्रति अंग्रेजों की उदासी पर पाल
को गहरी निराशा हुई।
विभाजन की आध्किारिक घोषणा ने पाल के विचारों को बदल दिया। ब्रिटिश न्याय और उसकी लोकतांत्रिक
परम्पराआंे से उनकी आस्था समाप्त हो गई। वे अब प्रार्थना और आवेदन के पुराने उपायों से समस्या समाधन खोजने
की निरर्थकता को भली प्रकार जाने गये थे। 7 अगस्त 1905 को कोलकाता स्क्वायर में हुई ऐतिहासिक सभा में पाल
ब्रिटिश माल के बहिष्कार का समर्थन करने वाले प्रचण्ड वक्ता के रूप में उभार कर जनता के सामने आए।
रनगपुर में जनवरी 1907 में हुई सार्वजनिक सभा में स्वयं स्वीकारा कि शुरू में उन्हे स्वयं अग्रेजी माल के
बायकाट के निर्णय की सपफलता के बारे में सन्देह था। इस संबंध् में कोलकाता में एक के बाद एक तीन मीटिंग हुई।
कल्कत्ता थियेटर मे हुई अंतिम तीन मीटिंग मे लोगो की भीड़ थी। मैने आकर कहा कि ‘‘क्या आप ब्रिटिश माल को
उस समय तक बायकाट कर सकेंगे जब तक कि विभाजन रद्द नहीं कर दिया जाता?’’ एक आवाज में श्रोताओं ने
जोरदार ढंग से कहा, ‘‘हमेशा के लिये बायकाट’’7 जिसे पूर्वी बंगाल और आसाम की सरकार ने पाल पर तैयार की
थी।
असाधरण लेखन कला
1905 के अंत तक पाल बायकाट आन्दोलन के प्रमुख प्रवक्ता के रूप में उभर कर सामने आ गये थे। अपने
लेखो और भाषणों के द्वारा उन्होंने बायकाट का संदेश जोरदार ढंग से प्रचारित किया। न्यू इंडिया के अतिरिक्त उन्होंने
अन्य अनेक बांग्ला समाचार पत्रों के लिये भी लेख लिखे। बांग्ला दैनिक संध्या ;जो 1904 में शुरू हुआद्ध के सम्पादक
ब्रह्म बांध्व उपाध्याय के रूप में उन्हें एक सुयोग्य सहयोगी मिले। अप्रैल 1906 में अरविन्द के पदार्पण से आन्दोलन को
और अध्कि बल मिला। उनकी अप्रतिम प्रतिभा, व्यापक दृष्टि तथा असाधरण लेखन कला आन्दोलन को नयी
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उँचाइयाँ देने में सहायक सि( हुयी। पाल और अरविंद ने साथ मिलकर बायकाट के आन्दोलन को भारत को संपूर्ण
आजाद के लिये सकारात्मक राष्ट्रीय अभियान में रूपांतरित कर दिया।
अरविन्द घोष के आगमन से पूर्व ही बिपिनचन्द्र पाल ने बायकाट आंदोलन को आर्थिक, शैक्षिक और
प्रशासनिक क्षेत्रों तक व्यापक बनाने के लिये अनेक उपाय किये।
स्वशासन अंतिम लक्ष्य
उन्होंने उपनिवेशवादी शक्ति के साथ असहयोग की बात दोहराई और स्वशासन को भारत का अंतिम लक्ष्य
घोषित किया। 10 नवंबर 1905 में उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी के बायकाट की मांग कि और इसके स्थान पर
नेशनल यूनिवर्सिटी बनाने का सुझाव दिया। इसके पफलस्वरूप मार्च 1906 में नेशनल काउंसिल आपफ एजूकेशन की
स्थापना हुई। पाल ने विद्याार्थियो का आहान किया कि वे शिक्षा के बायकाट के अपने निश्चय पर मजबूती से डंटे रहें।
उत्कृष्ट वक्ता
एक प्रबु( लेखक ही नहीं पाल बंगाली और अंग्रेजी के उत्कृष्ट वक्ता भी थे। वे दूरस्थ प्रदेशों में बार बार
सार्वजनिक सभाओं मंे भाषण देने के लिए जाते रहते। उन्होंने मुसलमानों से जोरार अपील की कि वे अंग्रेजों की चालों
में न पफंसे और बंगाली जनता के संघर्ष में अपने हिन्दू भाईयों के साथ एकजुट होकर खड़े रहें।
वायसराय के रूप में लार्ड मिन्टो ;1905द्ध के आगमन और उदारवादी लार्ड मार्ले की सक्रेटरी ऑपफ स्टेट
; दिसम्बर 1905द्ध के रूप में नियुक्ति होने पर नरमपंथी और मध्यमार्गी यथा, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, भूपेन्द्र नाथ बसु और
आशुतोष चौध्री को आशा बंध्ी कि साम्राज्यवादी शक्ति की ओर से न्याय मिलेगा और वे वायसराय को एक अर्जी पेश
करने का विचार करने लगे। पाल और उनके समर्थक ब्रह्म बांध्व ने इस पुरानी मध्यमार्गी नीति को पिफर से अपनाने
का जोरदार विरोध् किया। 13 जनवरी, 1906 को कलकत्ता के अपने भाषण में और 30 जनवरी और तीन व 18 मार्च
के अपने भाषणों में पाल ने पिफर से सापफ शब्दों में मार्ले और अन्य विदेशियों के प्रति अपनी अनास्था को व्यक्त किया।
इस बीच, रंगपुर, मदारीपुर, बारीसल और अन्य मुपफस्सिल कस्बों से उत्पीड़न की घटनाएं आनी शुरू हो गई।
बारीसल में 14-15 अप्रैल 1906 को प्रान्तीय कांप्रफेस में पुलिस क्रूरता का भयावह दृश्य उपस्थित हुआ। इस कांप्रफेस की
अध्यक्षता अब्दुल रसूल एडवोकेट कर रहे थे। कांप्रफेस को जबरदस्ती भंग कर दिया गया, युवा स्वयंसेवकों को पुलिस ने
बुरी तरह पीटा, और वन्दे मातरम् के नारे और देशभक्ति के गीत गाने पर रोक लगा दी गई। अरविन्द जो इस भयावह
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दृश्य के स्वयं गवाह थे, वे पाल से यहीं पहली बार मिले थे। दोनों परस्पर एक दूसरे के निकट आ गये। बंगाल कांप्रफेस
के जबरदस्ती भंग करने के बाद अरविन्द ने ब्रिपिन चन्द्र के साथ पूर्वी बंगाल का दौरा किया। मई 1906 के महीने मे
बिपिन चन्द्र ने चांदपुर, बा्रह्मण बरिया और कोमिला आदि की सार्वजनिक सभाओं में भाषण दिए और मुसलमानों को
समझाया कि वे हिन्दुओं के साथ एकजुट होकर 30 करोड़ भारतीयों की मांग मनवाने के लिए अंग्रेजों पर दबाव डालें।
साहसिक निर्णय:
बायकाट आन्दोलन के प्रथम वर्ष की समाप्ति पर, पाल ने मात्रा 500 रूपये की नाममात्रा की पूंजी से अंग्रेजी
दैनिक पत्रा निकालने का साहसिक निर्णय कर लिया। इस अग्रेंजी पत्रा ‘वन्दे मातरम’ ने स्वाध्ीनता संघर्ष के इतिहास में
अपने लिये विशेष स्थान बना लिया। पाल ने अरविन्द को ‘वन्दे मातरम’ के संपादकीय मंडल में सम्मिलित होने का
निमंत्राण दिया। अरविन्द अभी हाल में नव स्थापित नेशनल कालेज के प्रिंसिपल नियुक्त हुये थे। अरविन्द ने पाल का
निमंत्राण सहर्ष स्वीकार कर लिया। ‘वन्दे मातरम’ के संपादकीय दल को गौरव था कि उसमें उत्कृष्टतम प्रतिभाएं थीं,
सम्पादक पाल और सहायक संपादक अरविन्द के अतिरिक्त इसमें हेमेन्द्र प्रसाद घोष, श्याम सुंदर चक्रवती और विजय
चटर्जी जैसे प्रभृति विद्वान सम्मिलित थे।
इस प्रकार पाल और अरविनद की अद्वितीय जीड़ी शुरू हुई। अरविन्छ लेखनी के अच्छे ध्नी थे, पाल अद्भूत
भाषण करने वाले थे। मंच पर तथा जनता के बीच रहने के अभ्यस्त थे। दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह समझते थे
और परस्पर पूरक थे।
परंतु, कुछ माह पश्चात् पाल ने अपने को वन्दे मातरम के संपादक पद से अलग कर लियां यद्यपि उनके इस
निर्णय के पीछे व्यस्त दौरों का प्रभाव था, परंतु संपादकीय दल और प्रबंध्कों के साथ उनके नीतिगत मतभेद भी
उत्पन्न हो गये थे। दोनों ही गोपनीय क्रांतिकारी सोसाइटियों की गतिविध्यिों क अच्छे समर्थक थे। पाल यद्यपि युवा
क्रांतिकारियों की देशभक्ति, साहस और त्याग भावना की सराहना तो करते थे पर उनका विश्वास था कि उपनिवेशवादी
शासन की दुर्जेय शक्ति के सामने छिट-पुट हिंसक गतिविध्यिों से स्वाध्ीनता के मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता। पाल को
इस बात का खेद था कि वे अलग हो रहे हैं। यह निर्णय उस समय लिया गया जबकि बीमारी के कारण अरविन्द बाहर
गये हुये थे। वन्दे मातरम के साथ उनकी पृथकता से पाल का उत्साह कम नहीं हुआ और उन्होंने अपने दौरे का
व्यापक कार्यक्रम बना लिया। उनके दौरे में बंगाल के दूरस्थ स्थान ही नहीं अपितु प्रान्त के बाहर के गांव और कस्बे
भी तैयार थे।
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जनमत तैयार:
जून, 1906 में शिवाजी उत्सव के अवसर पर लोकमान्य तिलक कलकत्ता आये और कांग्रेस में नरमपंथी और
मध्यमार्गी नेताओं के विरूद्व राष्ट्रवादी और उग्रवादियों के एकजुट होने का आकर्षण केन्द्र बन गये। अरविन्द और पाल
ने तिलक को दिसम्बर, 1906 में कलकत्ते में होने वाले कांग्रेस सम्मेलन का अध्यक्ष बनाने की योजना बनाई। पाल ने
तिलक की उम्मीदवारी के समर्थन में जोरदार ढंग से जनमत तैयार करना शुरू कर दिया। नरमपंथी और मध्यमार्गी लोग
डर गये और उन्होंने वयोवृ( नेता दादा भाई नारौजी से अपील की कि वे कलकत्ता सम्मेलन की अध्यक्षता स्वीकार
कर लें। पाल को भनक लग गई। उन्होंने नारौजी से प्रार्थना की कि वे इस मामले मंे न पड़े और अलग रहे। नारौजी
से प्रार्थना तो नहीं मानी परंतु अपने अध्यक्षीय भाषण में स्वराज को राष्ट्रीय ध्येय घोषित कर उग्रवादियों को निहत्था
कर दिया। बायकाट और स्वदेशी के समर्थनमें कांग्रेस का प्रस्ताव अम्बिका चरण मजूमदार ने पेश किया और पाल को
उसका अनुमोदन करने की अनुमति दे दी। इस अवसर पर भाषण में उन्होंने कहा ‘‘आपने देखा होगा कि बायकाट
का शब्द ‘आन्दोलन’ के साथ जुड़ा है… इसका अभिप्राय है कि यह एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक, एक शहर से दूसरे
शहर तक, डिवीजन से डिवीजन तक और प्रान्त से दूसरे प्रान्त तक तब तक जारी रहेगा जब तक कि हम अन्य राष्ट्रों
के मध्य एक राष्ट्र के रूप में अपनी जनता के सर्वोच्च भाग्य विधता बनने में सपफल नहीं हो जाते’’
सम्पादकीयः
ब्रिटिश गुप्तचर रिपोटों में मद्रास शहर में विद्रोह की भावना भड़काने के लिये पालको जिम्मेवार ठहराया गया।
10 मई को जो पाल का भाषण होना था वह नहीं होने दिया गया क्योंकि लाला लाजपत राय और अजीत सिंह को
भारत से बाहर निष्कासित कर दिया गया था। शासन का क्रूर आतंत चारों और व्याप्त हो गया। सरकार के लिये पाल
और अरविन्द व्याकुलता का कारण बन गये और सरकार अरविन्द के विरूद्व विद्रोही गतिविध् िकानून के अन्तर्गत
गिरफ्रतारी के लिये प्रमाण खोजने में लग गई। उनके विरूद्व एक सम्पादकीय को प्रमाण बनाया गया परंतु सवाल यह था
कि इसमें उन्हें कैसे पफंसाया जाये क्योंकि दफ्रतर की तलाशी के दौरान उपनिवेशवादियों के हाथ एक पत्रा लगा जो पाल
ने 26 मई, 1907 को किसी को ;अरविन्दद्ध वन्दे मातरम में सम्पादकीय के लिखने के लिए लिखा था। पाल से कहा
गया कि वे अदालत में आकर गवाही दें। इससे वे असमंजस में पड़ गयें। यदि वे गवाही के लिये सहमत होते है, तो
अरविन्द को दंडित किया जाता है और यदि वे इंकार करते हैं तो अदालत की अवमानना के दोषी बनते हैं और उन्हें
इसके लिये कानून का कोपभाजन बनना पड़ता है। अरविन्द को बचाने के लिये पाल ने स्वयं को बंद बनना स्वीकार
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कर लिया। उन्हें गिरफ्रतार कर छह माह की सजा दी गई। उन्हें पहले प्रेजीडेंसी जेल में और बाद में बक्सर जेल भेज
दिया गया।
गिरफ्रतारी
पाल की गिरफ्रतारी जनता के लिये बहुत बड़ा आघात थी। अरविन्द ने तुरंत वन्दे मातरम में जो अपनी
प्रतिक्रिया व्यक्त की वह पाल के प्रति उनकी आंतरिक भावों की परिचायक है। उन्होंने लिखाः ‘‘ श्री बिपिनचन्द्र पाल
हमारे प्रेस और मंच के सर्वाध्कि शक्तिशाली कार्यकर्ताओं में से हैं और इस बात को उनके विरोध्ी भी स्वीकार करते
है। अपने देशवासियों के एक बहुत बड़े भाग द्वारा उनकी मान्यता महान राजनैतिक देवदूत के रूप में प्रतिष्ठित है।’’
पाल और लाजपतराय की अनुपस्थिति में अंग्रेज सरकार ने कांग्रेस में विभाजन की योजना बनाई और उसे
सूरत के कंाग्रेस अध्विेशन में कार्यान्वित किया गया। ;दिसम्बर, 1907द्ध उग्रवादी अथवा नेशनलिस्ट पार्टी के नेता
तिलक और अरविन्द को बाहर निकाल पफैंका और नरमपंथी में पफीरोजशाह मेहता का वर्चस्व स्थापित रहने दिया गया।
देवदूत की वाणीः
पाल की रिहाई बक्सर जेल से 9 मार्च 1908 को हुई और इस अवसर पर अरविन्द ने सारे देश में इसकी
अवसर पर अरविन्द ने सारे देश में इसकी खुशी मनाने का आह्नन किया। कलकत्ता की जनता से कहा गया कि वे
उनका शानदार स्वागत करें। अरविन्द ने लिखा ‘‘अब बिपिन चन्द्र पाल जेल से बाहर आ रहे हैं, हमें उनके महान
वक्तृत्व की प्रतीक्षा है, देववाणी का उद्घोष करने वाली उनकी अद्भूत कला उव्व आदर्शवाद की भावना को पुनः
जाग्रत करेगी, सि(ातों के प्रति उनकी अडिग निष्ठा पुनः व्यक्त होगी…. उस देवदूत की वाणी जिसमें देव स्वयं अनेग
बार पिफर हमारे हृदयों को स्वच्छन्द मिलेगी, वह वाणी जिसमें देव स्वयं अनेक बार बोल चुके है। बिपिन चन्द्र पाल
आन्दोलन को आध्यात्मिक शक्ति के व्याख्याता के रूप में अपने विशु( भारतीय स्वरूप में पिफर से खड़े होंगे………
2‘‘11 मई को कॉलेज स्क्वायर में एक बड़ी सार्वजनिक सभा हुई। जेल में पाल का आध्यात्मिक पुनर्जन्म हुआ और
उन्होंने आन्दोलन का सही अर्थ समझा। इस परिवर्तन का निहितार्थ अरविन्द ने लिखाः
…………बिपिन चन्द्र अन्तः प्रेरणा से बोलते है जिसे वे स्वयं भी रोक नहीं पातें जनता उनसे स्वराज,स्वदेशी,
बायकाट, नेशनल एजूकेशन आदि पुराने विषयों पर सुनाना चाहती थी, उनकी अद्वितीय वकृत्व कला उन्हें आकर्षित
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करती थी, और स्वयं भी इन विषयों पर बोलना चाहते थे, परंतु देवदूत की भाषा उसकी अपनी नहीं होती बल्कि वह
भाषा किसी अपरा शक्ति की होती है जिसे उसे बोलना ही पड़ता है।’’
उत्तर पाड़ा के अपने सुप्रसि( भाषण में, पाल ने जेल के एकान्त में उद्घाटित संदेश की व्याख्या की। उन्हांेने
अन्तर्राष्टीय घटनाक्रम का वर्णन किया, चीन के उन्नयन और भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन की सार्वभौमिक भावना को
विवेचित किया।उन्होंने कहा, ‘‘हम केवल अपने लिये ही संघर्ष नहीं कर रहे हैं, केवल भारत के ही लिये नहीं, एशिया
के लिये भी नहीं, बल्कि इंग्लैंड, यूरोप और समस्त विश्व के लिये यु( कर रहे हैं। इस संघर्ष के मुद्दें में भारत की
मुक्ति और मानवता का उ(ार निहित है।’
राष्ट्रीय समाचार पत्रा यथा, युगान्तर, सान्ध्य, बारीसल हितैषी और चारू मित्रा को जबरदस्ती बंद कर दिया गया।
तिलक को दूर देश माण्डले जेल में 6 महीने की कठोर सजा दे दी गई। अरविन्द और वन्दे मातरम भी सरकारी
आत्याचारों से बच नहीं सकें। 2 मई, 1908 को अरविन्द और युगान्तर के उनके दल के 36 व्यक्तियों को गिरफ्रतार
कर उन पर मुकदमा चलाया गया।उन पर मानिक तला षड़यंत्रा में भागीदारी का आरोप लगाया गया। उसी रात को
हेमेन्द्र प्रसाद घोष और श्याम सुन्दर चक्रवती दोनों बिपिन चन्द्र पाल के पास पहंुचे और अरविन्द की अनुपस्थिति में
वन्दे मातरम की सम्पादकीय टोलह का नेतृत्व करने की प्रार्थना की। पाल ने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया और 20
अगस्त, 1908 तक संपादन करते रहे। इसके पश्चात् वे एक भारतीय क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा दी गई
छात्रावृतिम पर इंग्लैड़ चले गये।
राष्ट्रीय आंदोलन का संदेशः
इंग्लैड़ में वे तीन साल रहे और वहां भी राजनैतिक और बौ(िक सभाओं में भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का
संदेश प्रसारित करते रहे। उन्होंने अंग्रेजी प्रेस में लेख भी लिखे। 1 मार्च ,1909 को उन्होंने अपना पाक्षिक पत्रा स्वराज्य
शुरू कर दिया।16 शीघ्र ही उनके यूरोप में स्थित भारतीय क्रांतिकारियों से गम्भीर मतभेद हो गये। वे चाहते थे कि पाल
उनकी गतिविध्यिों में भाग लें। पाल इसके लिये तैयार नहीें थे।हिंसात्मक संघर्ष के प्रति उनके मन में गंभीर संदेह था।
इसी मुद्दें पर वे दिसम्बर 1906 में वन्दे मातरम् से अलग हुये थे।17 परंतु सशक्त संघर्ष में उनकी अरूचि से अरविन्द के
प्रति उनका सराहनीय भाव यथावत बना रहा। उन्होंने स्वराज में उनकी अत्यध्कि प्रशंसा की और राष्ट्रीय आन्दोलन
में उनके योगदान को सराहा।
निष्कर्ष:
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इंग्लैंड में पाल का सम्पर्क अन्तर्राष्ट्रीय जगत की राजनीति और उसकी विभिन्न गतिविध्यिों से हुआ। वे
अपनी अन्तर्दृष्टि से देख सकते थे कि तीन वाद चल रहे हैं, इस्लामवाद, जिसका नेतृत्व भारत और मिस्र के
मुसलमान कर रहे थे। मंगोलियावाद, जिसका नेतृत्व चीन कर रहा था और इनकी प्रतिक्रिया के रूप्र में
अखिल यूरोपवाद उभर रहा था।19 उन्होंने ‘हिन्दु रिव्यू में इन विषयों को प्रकाशित किया। भारत आने के बाद 1911 में
उन्होंने ‘हिन्दू रिव्यू’ प्रारंभ किया। पाल ने स्पष्ट देखा कि इस्लामवाद और मंगोलियावाद भारत की एकता और
स्वाध्ीनता के लिये संकट है। उनकी लेखों और रचनाओं का यही केन्द्र बिन्दु और मुख्य विषय बना। सैम्युल
हान्टिगटन की लोकप्रिय पुस्तक ‘‘सभ्यताओं का टकराव’’ को उन्होंने लगभग एक शताब्दी पहले ही देख लिया था।
परंतु इस देवदूत की चेतावनी देशवासियो ने ही ध्यान नहीं दिया, जिस कारण 1947 में विभाजन हुआ। आज भी
इस्लामवाद और मंगोलियनवाद के आक्रमक तेवर आज भी जारी है।
संदर्भ:
1. सरकार विलेज एण्ड टाउन्स एज सोशल पैटर्न, कलकत्ता 1941ः629
2. वन्देमातरम, 12 सितम्बर 1907 शताब्दी खण्ड 1ः531
3. ए.बी. पुरानीः दि लाइपफ ऑपफ श्री अरविन्द ;1872-1926, पाडिचरी, 1964
4. पफरवर्ड टू हरीदास मुकर्जी एण्ड उमा मुकर्जी, विपिन चंद्र पाल एण्ड इण्डियाज स्टगल पफॉर स्वराज,
कलकत्ता,1958
5. सरल कुमार चटर्जी, विपिन चन्द्र पाल, दिल्ली, पेज -73,76-77
6. बी.सी.पाल, स्वदेशी एण्ड स्वराज,कलकत्ता,1954ः76-83
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8. मुकर्जी एझड मुकर्जी: 28-29
9. न्यू इंडिया, 16 सितम्बर 1905
10. न्यू इंडिया, 30 अक्टूबर 1905
10
11. ए.सी पुरानी, दि लाइपफ ऑपफ श्री अरविन्द ;101-102द्ध
12. देवेन्द्र स्वरूप, विपिन चंद्र पाल और अरविन्द घोष- ए यूनीक रिलेशनशिप, दि हिस्हारिकल रिव्यू भाग:
28ः1-2 जनवरी 2001 और जुलाई 2001ः 111-127द्ध
13. बी.सी पाल, स्वदेशी और स्वराज्य, कलकत्ता,1954ः 272-74
14. वन्दे मातरम् 12 मार्च, 1907, शताब्दी भाग -1
15. वन्छे मातरम् 22 मार्च,1908
16. पफाइट अगेन्सट एनार्किज्म इन इंडिया, कलकत्ता, मार्च, 1913
17. दि प्राब्लम आपफ पालिटिकल क्राइम आपफ इंडिया, कलकत्ता 1916ः239-297
18. बी. सी.पाल, कैरेक्टर स्कैचज, कलकत्ता, 1957ः 79-95
19. बी.सी. पाल, नेशनलिटी एण्ड एम्पायर, कलकत्ता, 1916
डा. अंजनी कुमार झा
मो- 9582584301
पताः 108/48, शिवाजी नगर, भोपाल
;मध्यप्रदेश पिन- 462016
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