सेनाध्यक्ष को ‘डॉयर’ कहना-नक्सली सोच


डॉ. विनोद बब्बर

स्वतंत्र भारत में अक्सर इतिहास को गलत ढ़ंग से प्रस्तुत करने के आरोप सामने आते रहते हैं। देश की बहुसंख्यक जनता की आस्था से खिलवाड़ करने से देश के बहादुर लोगों को लुटेरा कहने, महाराणा प्रताप का सम्मान कम करने जैसे शर्मनाक भ्रामक तथ्य तक इतिहास कहलाये तो इतिहास लेखकों की नियत पर शक होता है। यह शक उस समय विश्वास में बदल जाता है जब हिन्दू आस्थाओं को ‘बकवास’ बताने वाले वामपंथी ही लगातार इतिहास लेखक के रूप में प्रतिष्ठित होते रहे हैं। सूर्य के प्रकाश की तरह प्रकट तथ्यों को नजरअंदाज कर देश को छदम् धर्म निरपेक्षता के सांचे में फिट करने के एजेंडे से ये इतिहासकार लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस के भी प्रिय रहे हैं। कांग्रेस की मजबूरी का लाभ उठाते हुए इन विकृत सोच के वामपंथी इतिहासकारों ने देश को गुमराह करने का कार्य किया है। इनके कृत्य को तथ्यों के साथ गलत साबित करने पर भी ये अपनी गिरोहगत एकता के साथ दिन को रात बताने में लगे रहे हैं।
इसी श्रृंखला में ताजा उदाहरण स्वयं को इतिहासकार बताने वाले पार्थ चटर्जी का है जिसने सेनाध्यक्ष मेजर जनरल बिपिन रावत की तुलना जनरल डायर से करते हुए कहा है, ‘1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के पीछे ब्रिटिश सेना के तर्क और कश्मीर में भारतीय सेना की कार्रवाई (एक युवक को जीप में बांधना) समान हैं।’ लगभग यही बातें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया ने अपनी दल के मुखपत्र में कही है। स्पष्ट है कि पार्थ चटर्जी अकेला नहीं उनका पूरा गिरोह ही अपने जहरीले शब्दों से देश के वातावरण को विषाक्त करने में लगे हैं। यह भी सव्रज्ञात है कि कुछ दिन पूर्व दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में ‘हिन्दोस्तान तेरे टुकड़े होंगे हजार’ के नारे लगाने वाले भी वामवंशी ही थे जो लगातार देश के विभिन्न शैक्षिक संस्थानों का वातावरण बिगाड़ने में लगे हैं। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन इसका अर्थ यह हर्गिज नहीं हो सकता कि कुछ लोगों को मनमानी करने की छूट दे दी जाये।
भारत चीन युद्ध में चीन का समर्थन करने वामपंथियों का पूरा रिकार्ड इस बात का साक्षी है कि वे भारत और भारतीय संस्कृति के प्रति पूर्वाग्राही (दुराग्राही) रहे हैं। अतः आज चटर्जी साहिब का भारतीय सेनाध्यक्ष के विरूद्ध विषवमन कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन इस संदर्भ में आश्चर्य अवश्य है कि जो स्वयं को इतिहासकार घोषित करते हैं वे इतिहास का सम्यक ज्ञान तक नहीं रखते। जलियावाला बाग और कश्मीर में पत्थरबाजी की तुलना करने वाला कोई व्यक्ति बुद्धिजीवी हो ही नहीं सकता। जनरल डायर ने सैकड़ों निर्दोषों को मारा लेकिन मेजर गोगोइ ने युक्ति से काम लेते हुए अनेक जानों को बचाया ही है। लेकिन ये तथाकथित बुद्धिहीन इतिहासकार जानबूझकर नहीं सुनना समझना चाहता कि जलियावाला बाग में बैशाखी के दिन शांतिपूर्वक सभा कर रहे लोगों को अकारण चारो तरफ से घेरा गया, एकमात्र छोटा का प्रवेशद्वार भी बंद कर गोलियां चलाई गई। वहां मासूम बच्चे भी थे। वे पत्थरबाजी नहीं कर रहे थे। किसी की जान नहीं लेना चाहते थे। लेकिन जनरल डायर ने उन्हें सबक सिखाने और अपनी हनक दिखाने के लिए निहत्थो पर गोलियां चलाई। इसके विरूद्ध अब वामपंथियों की कब्रगाह बन चुके बंगाल के ही गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी।
न जाने यह कैसा वामी पार्थ (पार्थ चटर्जी) है जिसे चिडिया की आंख की जगह केवल और केवल अपनी मातृभूमि से द्रोह ही दिखता है। चारो तरफ आलोचना, भर्त्सना के बाद भी आत्म चिंतन, मंथन करने की बजाय वामी गिरोह का यह करिंदा अपनी बात पर अडत्रा है। लेकिन इस देश की जनता उनसे आपेक्षा करती है कि अगर वह पत्थरबाजों को निर्दोष और निहत्था मानते हैं तो एक बार अपने उन बंधु- बांधवों के पत्थरों की बौछार के सामने जाने का साहस क्यों नहीं करता? क्या उन उपलब्धे असंख्य वीडियों देखने से उसका वामपंथी धर्म नष्ट होता है जिनसे साबित होता हैं कि भारतीय सैनिक अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी अत्यंत धैर्य से काम ले रहे हैं। पार्थ चटर्जी फारूख डार को कुछ इस तरह से निर्दोष घोषित करता हैं मानों वह उस घटना के चश्मदीद गवाह हो। अगर दिव्य दृष्टि उसे हर गलत-सही का दर्शन कराती है तो उसे कश्मीर का युवा सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट उमर फैयाज का अपराध भी बताना चाहिए जिनका पहली बार छुट्टी पर घर आने पर अपहरण करने के बाद आतंकवादियों ने गोलियों से भून दिया? कहीं ऐसा तो नहीं कि वे दुनिया से समाप्त होने की ओर उस विचारधारा के मानसिक गुलाम होने के कारण उस देश को नीचा दिखने में ही रूचि रखते हैं जहां वे और उनके पूर्वज जन्में?
बुद्धिहरण विश्वविद्यालय के छात्र रह चुके ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों समझकर भी नहीं समझना चाहते कि विश्व में सर्वत्र सरकारें वहां के प्रशासन, पुलिस का अपने ढ़ंग से इस्तेमाल करती है। वामपंथी सरकारें भी इसका उपवाद नहीं रही है। हमारे सेनाध्यक्ष को जनरल डायर बताने वामपंथी थियानमेन स्क्वायर की चर्चा करते हुए क्यों हकलाने लगते हैं जहां 4,जून 1989 को निहत्थे, निर्दोष छात्रों पर चीन की वामपंथी सरकार ने इसलिए टैंकों चढ़ा दिये थे कि वे लोकतंत्र की मांग कर रहे हैं। सदाबहार भारतद्रोहियों आखिर यह क्यों स्वीकार नहीं करते कि सैकड़ों की मौत और 10 हजार से अधिक की गिरफ्तारी उनके वामपंथ का पवित्र कर्मकांड था।
क्या इसीलिए ये वामपंथी और उनके समर्थक राष्ट्र की अस्मिता तक से खिलवाड़ करते हैं कि कि यह केवल भारत में ही संभव है। लाखों कश्मीरी पंडितों को उनके पूर्वजों की धरती से खंदेड़ने पर मौन रहने वाले मानवाधिकारवादी आतंकवादियों के मानवाधिकारों के लिए बहुत चिंतित रहते हैं। अगर उनसे पूछा जाये कि क्या सैनिक का कोई मानवाधिकार नहीं होता तो ये बुद्धिहीन बुद्धिजीवी ‘भगवाकरण’ के आरोपों की पत्थरबाजी के साथ तैयार मिलते हैं। स्वयं को सव्रज्ञ घोषित करने वाले ये जमीन से कटे हुए लोग विश्व के उस देश का नाम क्यों नहीं बताते जहां सुरक्षाबल स्वयं पर हमला किये जाने पर भी धैर्य से प्रतिक्रिया देते हों। सैनिक की किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होती। वह तो केवल राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए अपने प्राणों को हथेली में लिए तपते रेगिस्तान तो कभी शून्य से भी चालीस डिग्री तापमान वाले बर्फिले तूफान के बीच भी अपना कर्तव्य निभाता है। शांति, सौहार्द के शत्रु और लोकतंत्र के ये कलंक देशद्रोही वक्तव्य देकर देश के दुश्मनों से मदद प्राप्त करते हैं। ऐसे लोगों के रहते हमें किसी बाहरी शत्रु की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसे े आस्तीन के सांपों की पहचान कर उन्हें उचित दंड देना सरकार का कर्तव्य है। देश के हर विवेकशील व्यक्ति को सरकार से यह पूछना चाहिए कि आखिर कब तक राष्ट्र की अस्मिता पर प्रहार करने वालों को हम बुद्धिजीवी घोषित करते रहे? बुद्धिजीवी और देशद्रोही को समानार्थी बनाने में लगे ऐसे लेागें को अनिश्चित समय के लिए बर्दाश्त करना भी राष्ट्रीय अपराध है।
यह संतोष की बात है कि सोशल मीडिया सहित हर मंच पर ऐसे कुकृत्य की भर्त्सना करते हुए सरकार से ऐसे तत्वों के विरूद्ध कठोरतम कार्यवाही की मांग की जा रही है। सेना सदैव से ही हमारी खड़ंग भुजा है और रहेगी। बाहरी आक्रमण से प्राकृतिक आपदा तक, आतंकवाद से नक्सलवाद तक हर जगह अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी हमे सुरक्षित करने वाले सैनिकों को गद्दार लोगों के आरोपों की बौछार के समक्ष अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। जरा सी भी ढ़ील अथवा लापरवाही इतिहास को विकृत करने में लगे बुद्धिहरण विश्वविद्यालय के छात्ऱ इन इतिहासकारों को अवसर प्रदान कर सकती है कि वे देश के वर्तमान और भविष्य को कलुषित करे। कश्मीर भारत था, है और रहेगा इसलिए जो सेना बाढ़ आने पर अपने कश्मीरी भाईयों को अपने कंघों पर बैठाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाती है उसे मुट्ठी भर उत्पातियों से सख्ती से निपटने का अधिकार था, है और सदा रहेगा।

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