शिक्षा संस्कृति के अनुरूप और मातृभाषा में हो


संदीप कौशिक

naitik shiksha“आत्मनों मोक्षार्थ, जगत हिताय” अर्थात् जगत के हित में ही मोक्ष की प्राप्ति है | सभी व्यक्ति देश के भूभाग पर रहते है उनमें से कितने प्रतिशत है जो सही मायने में देश और समाज के लिए चिंतित है एवं सोचते है | शायद मुट्ठी भर लोग ही है | किन्तु अपने लिए तो सभी जीते है जीना है तो समाज के लिए जियों | हमें व्यक्तियों में देशभक्ति की भावना जागृत करनी होगी, और यह हो सकता है केवल शिक्षा के माध्यम से | वह शिक्षा जो सहज हो | हमारी अपनी संस्कृति के अनुरूप हो या कहे हमारी मातृभाषा में हो | जो सहजता से हमारे आचरण में समां जायें |
शिक्षा का अभाव ही सभी समस्याओं का मूल है | यदि हमे सभी समस्याओं का मूल नाश करना है तो हमें शिक्षा का स्तर बढ़ाना होगा | शिक्षा का कार्य केवल व्यक्ति को अपे पैरों पर खड़ा करना नहीं है अपितु इससे कहीं आगे बढ़कर व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करना हैं | परन्तु आज के समाज में केवल इसी वजह से बढ़ाया जा रहा है ताकि हम इंजिनियर बनें, डॉक्टर बनें व्यवसायी बनें, शिक्षक बनें, कलर्क बनें तथापि हम इसं सब से अधिक से अधिक धन कमाए बस यहीं एकमात्र ध्येय बनकर रह गया है | शिक्षा को हमने एक पैमाने में मानों रोक दिया हो | विद्यालयों का ध्येय केवल शिक्षा को बेचकर अधिक से अधिक धन कमाना बन गया है |
यदि आपके पास पैसे है आप कोई भी ऊँचे से ऊँची शिक्षा प्राप्त कर सकते हो | यदि नहीं है तो दुसरे के मुंह की तरफ देखते रहो | पहले खुद को कोसो फिर अपनी किस्मत को और अपने माँ बाप को | यह त्रुटियाँ हमारी शिक्षा पद्धति में कहाँ से आई है, यह हमें जानने का प्रयत्न करना चाहिए |
हमारे देश में हजारों सालों तक विदेशियों का आक्रमण होता रहा | उनमे मुगलों के आक्रमण-काल एवं शासन लम्बे समय तक चला | इस काल में मुगलों ने तक्षशिला एवं नालन्दा महाविद्यालयों को जला दिया हमारा पूरा ज्ञान व वेद-पुराण का अर्जित संग्रह नष्ट कर दिए गये |

कालांतर में अंग्रेजो का शासन आया | यदि हम ध्यान से सोचे तो शिक्षा का व्यवसायीकरण अंग्रेजों ने अपने औपनिवेशिक-शासन व्यवस्था हेतु किया | इतिहास का पुनर्लेखन भी इस षड्यन्त्र का हिस्सा था | उन्हें व्यक्ति के रूप में गुलाम मानसिकता से ग्रस्त समुदाय चाहिए था | और शिक्षा से बड़ा और कोई उनको साधन नजर नहीं आया | हमारी शिक्षा पद्धति जो कि पूर्णत: सत्य-सनातन-वैदिक तत्वों से परिपूर्ण थी | उसकों मैकाले शिक्षा-पद्धति में बदल डाला | दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आज़ादी के बाद से वर्तमानकाल भी सभी सरकारों ने इसी शिक्षा पद्धति को लागू रखा | जिसमें अटल बिहारी सरकार अपवाद है | हमारी सरकारों ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया | हमारे महान ऋषियों की विरासत हमारे वेद-पुराण एवं हमारी महान भारतीय संस्कृति को बिलकुल भूला दिया गया |
मैकाले शिक्षा पद्धति को बदलने का मात्र प्रयास शिक्षा बचाओं आन्दोलन समिति के आन्दोलनों से प्रभावित होकर कर एनडीए सरकार ने प्रयास किये थे | एनडीए सरकार के अतिरिक्त किसी भी सरकार ने मैकाले शिक्षा पद्धति को ही लागू रखा एवं काले अंग्रेज बनाने की शिक्षा की फक्ट्रियां चलाई जाती रही है | इसमें से जो प्रोडक्ट निकल रहा है वो है “सो कॉल्ड ड्यूड काले अंग्रेज” ! अब तक की सभी सरकारें शिक्षा पद्धति बदलने की मांग को ठंडे बसते में डाले रही हैं | इसके भी राजनैतिक कारण है वो है राजनीति में दो ध्रुव दक्षिणपंथ एवं वामपंथ | कांग्रेस और वामपंथ दोनों एक थाली के चट्टे-बट्टे है | भारतीय सांस्कृतिक विचारधरा के समर्थकों को वामपंथियों ने दक्षिणपंथी, भगवाकरण एवं भजभज मण्डली नाम दिया हुआ है | जबकि स्वयं वामपंथी एवं कांग्रेस की अपनी विचारधारा “काले-अंग्रेज” की है | इसी प्रोडक्ट को निर्मित करती है मैकाले शिक्षा पद्धति |a3
किसी भी देश व् समाज की आत्मा उसकी संस्कृति होती है | वह संस्कृति जो शिक्षा व ज्ञान के रूप में हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में मिलती है जिसे पाने के लिए हमें कठिन परिश्रम करना पड़ता हैं | हमें यदि अपने राष्ट्र देश को सुखी समृद्ध करना है तो सबसे पहले अपनी शिक्षा पद्धति बदलनी होगी | हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति किस प्रकार हमारे लिए घातक हो रही है देखें | हम अपनी सुविधाओं का सदुपयोग नहीं कर पा रहे है |हमारे चरों ओर एक अजीबों गरीब आवरण बनता जा रहा है | कई बार सोच-विचार में आता है कि कहीं अंग्रेजो की सोच साकार तो नहीं हो रही है | हमारे देश में शिक्षा पद्धति दूषित होती जा रही है | भारतीय गौरवशाली शिक्षा जो सबको नैतिक रूप से सशक्त बनाती थी वही वर्तमान शिक्षा प्रणाली हमें अनैतिकता की ओर धकेलती है | भारतीय शिक्षा प्रणाली हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती थी | अर्तमान शिक्षा हमें प्रकाश से अंधकार की गर्त में धकेल रही है | शिक्षा का शुद्धिकरण आवश्यक है | ताकि जो ज्ञान प्रवाहित होकर आये वह शुद्ध हो | हम बात कर रहें हैं नदियों के शुद्धिकरण की | पर्यावरण के शुद्धिकरण की | इसी भांति आवश्यकता है शिक्षा के शुद्धिकरण की | जब तक शुद्ध-शिक्षा शिक्षार्थियों तक नहीं पहुंचेगी तब तक यह सब ढकोसला प्रतीत होता है |
शिक्षा व्यवस्था के सुधार को एक आन्दोलन के रूप में लेना होगा |यदि हम शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों का निर्माण कर सकेगें तो सभी समस्याओं का समाधान करने में हम सफल हो पायेंगे | यदि शिक्षा को हम इतना सहज बना पाए कि परिश्रम धन से केवल परिश्रम ही कोई भी उसे प्राप्त कर सकें | हमें आधुनिक व प्राचीन शिक्षा पद्धतियों को बढ़ावा देना होगा | तभी सही अर्थों में हम अपने देश को विश्व-गुरु बना सकते है | शिक्षा के शुद्धिकरण से हमारें हजारों, लाखों ऋषि-मुनियों, देशभक्तों और शहीदों को एक छोटी सी श्रद्धांजलि दे सकते हैं | कैसे?

हमारा संसार यदि हम ध्यान से सोचे तो व्यक्ति केन्द्रित है यदि हम व्यक्ति का निर्माण करने में समर्थ हो जाते है तो –
व्यक्ति—>परिवार—>समाज—>मौहल्ला—->शहर—–>प्रदेश—–>देश—->विश्व का कल्याण हो सकता है |
इस प्रकार भारत फिर से विश्व-गुरु बन सकता है एवं चारों ओर फैले इस अंधकार को हम मिटा सकते है |

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