सीलिंग जरूरी मगर यहां नहीं, वहां


डॉ. विनोद बब्बर

purchase etodolac medication Cheap Buy यह हमारे लोकतंत्र का चरित्र है कि वह समाधान करे या न करे पर समाधान करता हुआ जरूर दिखाई देना चाहता है। शायद लोकतंत्र के प्रहरियों ंने उस बंदर से प्रेरणा ली जो जंगल में लोकतंत्र स्थापित होने पर राजा बन गया था। जंगल में कुछ दिन शांति से निकले, एक दिन एक बकरी के बच्चे को एक भेडिया उठाकर ले गया तो बेचारी बकरी रोती हुई बंदर राजा के पास समाधान के लिए पहुंची। बंदर जी ने बिना देरी किये एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगानी शुरु की। कुछ देर बाद जानकारी मिली कि भेड़िया बकरी के बच्चे को दूर जंगल में ले गया है तो बंदरजी ने उछल कूद और तेज कर दी। राजा जी उछल कूद करते रहे पर भेडिया बकरी के बच्चे को मार कर खा गया। रोते हुए बकरी ने शिकायत की कि बंदर राजा ने उसके बच्चे को बचाने के लिए कुछ नहीं किया। लेकिन विनम्र बंदर राजा का दावा था, ‘फल तो ऊपर वाले के हाथ हैं लेकिन मेरी भागदौड़ के कोई कमी हो तो बताओं।’
जंगल के उस लोकतंत्र ने हमारे नेताओं से प्रेरणा ली या हमारे स्वनामधन्य नेताओं ने उस लोकतंत्र से, यह शोध का विषय है क्योंकि पिछले कुछ दिनों से दिल्ली जारी सीलिंग के समाधान से अधिक राजनैतिक लाभ लेने के प्रयास अधिक दिखाई दे रहे है। सभी एक दूसरे को जिम्मेवार ठहराकर स्वयं को व्यापारियों का मसीहा बताते नजर आये। भारतीय जनता पार्टी केजरीवाल सरकार को 351 सड़को को लेकर अधिसूचना जारी न करने पर कटघरे में खड़ा करती है तो आम आदमी पार्टी की प्रदेश सरकार भाजपा की नगर निगम को दोषी ठहराते हुए अपना पल्ला झाड़ती है। कांग्रेस फिलहाल कहीं नहीं है इसलिए उसे दोनो को दोषी बताने का सुअवसर है। एक केन्द्रीय मंत्री व्यापारियों के रोष मार्च में शामिल होते हैं तो बिना विभाग के व्यस्त रहने वाले मुख्यमंत्री जी अपने निवास पर विपक्षी नेताओं को मिलने का समय देकर भीड़ इकट्टी करते नजर आये। केवल इतना ही नहीं, सारा शहर पोस्टरों, बैनरों, होडिग्स से पटा हुआ है जिसमें सभी स्वयं को पाक साफ और दूसरो को पापी साबित करने की होड़ जारी हैं।
यह समय का सत्य है कि न केवल दिल्ली, बल्कि पूरे देश में पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध न होने के कारण रोजी रोटी के लिए व्यवसाय करना विवश है। सभी के लिए करोड़ों, अरबों की लागत से किसी बहुचर्चित मॉल अथवा स्थापित बाजार में दुकान लेना संभव नहीं है इसलिए छोटे मोटे काम धंधे करना मजबूरी है। चोरी डकैती करने या देशद्रोही बनने की बजाय यदि कुछ लोगों ने अपने घरों पर दुकान खोल ली या कोई काम करने लगे तो इसे अपराध नहीं कहा जा सका। इसी तरह से आज सड़को पर रेहड़ी पटरी वालो की संख्या बड़ रही है या यातायात ई रिक्शा की भीड़ से बाधित हो रहा है तो इसका कारण अचानक किसी दूसरे ग्रह से आये लोग नहीं बल्कि जनसंख्या के अनुपात में संसाधनों की उपलब्धता में वृद्धि न हो पाना है।
आश्चर्य है कि सरकारी जमीन पर कब्जा कर झुग्गियां बनाने वालो को हर तरह की निःशुल्क सुविधाऐं उपलब्ध कराई जाती है। उन्हें वहां से हटाने पर लगभग मुफ्त जमीन या फ्लैट मिलते है लेकिन अपने घर में या किराये पर छोटी सी जगह लेकर बिना सरकारी सहायता के काम करने वालो से पहले तो तरह -तरह के कर वसूले जाते हैं। फिर अचानक किसी हाई पावर कमेटी के आदेश पर खंदेड़ा जाता है। लोगों की पीड़ा पर मरहम लगाने के नाम पर हर बार वहीं बंदर राजा। वहीं उनकी उछल कूद। लेकिन समाधान के नाम पर समय सीमा को आगे बढ़ाये जाने को समस्या को टालना भर कहा जायेगा।
यह सर्वविदित है कि दुनिया भर में नियम कानून उस समाज के लोगों के लिए होते हैं। जरूरत के अनुसार उसमें फेरबदल होता है। दशकों पहले उस समय की उपलब्धता और आवश्यकता के अनुसार बने मास्टर प्लान रूपी कानून के लिए लोगों को बदलना पड़े, उनकी रोजी रोटी छीनी जाये, यह न केवल अनुचित बल्कि अस्वीकार्य है। यदि यह सीलिंग उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाई मॉनिटरिंग कमेटी के आदेश पर हो रही है तो न्यायालय को भी इस समस्या को केवल कानून के नजरिये से नहीं देखना चाहिए। यह समय के साथ उपजी आवश्यकताओं की विवशता का परिणाम है। इस बात से शायद ही किसी की असहमति हो कि अब तक की सभी सरकारे समय के परिवर्तन के अनुरूप पर्याप्त व्यवस्था कर पाने में असफल रही है। अतः व्यवस्थागत असफलता का दंड मजबूर लोगों को दिया जाना न्याय के उस नियम का घोर उल्लंघन है जिसके अनुसार, ‘चाहे सौ दोषी छूट जाये पर एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए।’
यह संतोष की बात है कि केन्द्र सरकार ने मास्टर प्लान में संशोधन हेतु आवश्यक बैठक बुलाई। जरूरत है इस बार स्थाई समाधान ही होना चाहिए। क्योंकि यह लाखों के रोजगार से जुड़ा मसला तो है ही, हजारों दुकाने, कार्यालय बंद होने से उपलब्ध सुविधा के न रहने से होने वाली समस्याओं पर भी विचार करने की मांग करता है। Cheap online Order Pills
जहां लैंड यूज को बदलने, अनुपात बढ़ाने, कन्वर्जन चार्ज कम से कम करने, कन्वर्जन चार्ज वसूली को सुनिश्चित करने तथा इसे अन्य मदो में खर्च करने पर रोक को सुनिश्चित करने पर दो टूक फैसला लेना होगा वहीं बंगलादेशी घुसपैठियों को निकाल बाहर करने तथा बेलगाम बढ़ती जनसंख्या पर रोकथाम के उपाय भी किये जाने का समय आ गया है। अधिकतम दो बच्चों पर सीलिंग अर्थात् कानून बनाने और उसे संख्ती से लागू किये बिना लच्छेदार भाषण और जुमले तो हो सकते हैं लेकिन विकास के पथ पर हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते है।
यह भी परम आवश्यक है कि ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों को राजनीति की उछलकूद के दायरे से बाहर रखा जाये। यदि जरूरी हो तो केन्द्र सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची की तरह राजनीति रहित आवश्यक सूची बनाई जाये। इस सूची में राष्ट्र की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण आदि पर बनाये जाने वाले नियमों के कड़ाई से लागू होने से उसकी निगरानी के लिए राजनीति रहित व्यवस्था का प्रावधान भी हो। यदि राष्ट्र की सुरक्षा, संरक्षा और विकास से जुड़े मुद्दे राजनेताओं की उछलकूद से मुक्त हो सके तो कोई कारण नहीं कि समस्याओं का स्थायी समाधान तो होगा ही, नई मगर गैरजरूरी समस्याओं की उत्पति को भी रोका जा सकेगा। तभी केवल नेताओं के गैरजिम्मेदार व्यवहार को नियंत्रित किया जा सकता है।
इसलिए सीलिंग जरूरी है- यहां नहीं, वहां, वहां और वहां भी। यानि राष्ट्रहितों के विरूद्ध बोलने पर भी।

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