सहिष्णुता


डॉ अ कीर्ति वर्धन

सहिष्णुता यानी सहनशीलता या सहन करने की शक्ति जो प्रत्येक व्यक्ति, समाज या राष्ट्र अलग होती है और अलग अलग सन्दर्भों में अलग। सहिष्णुता का सम्बन्ध मानसिक, शारीरिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक अथवा जातिवादी सन्दर्भों में भी लिया जा सकता है।
यूँ तो सनातन संस्कृति तथा भारत सदैव ही सहिष्णु रहे हैं परन्तु वर्तमान संदर्भों में सहिष्णुता का मतलब हिन्दू मुस्लिम विवाद के सन्दर्भों में ज्यादा प्रचलित है। सहिष्णुता धर्म और राजनीति पर केंद्रित होकर अपना मूल अर्थ त्याग चुकी है। सामान्यतः धर्म का उद्देश्य समग्र मानव जीवन के प्रति अध्यात्मिक विकास एवं आस्था का दृष्टिकोण विकसित करना है जो मनुष्य को मानवता तथा नैतिकता के पालन को प्रेरित करता है। धर्म हमें सहनशील तथा क्षमाशील यानी सहिष्णु होना सिखाता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सहिष्णु होना मानव कल्याण का मूल सोत्र है।
क्या है धर्म, अध्यात्म क्या है, कहाँ जड़ें इसकी गहरी ?
विश्व खड़ा है जिस नींव पर, नींव सहिष्णुता पर ठहरी।
वर्तमान में सहिष्णुता के सन्दर्भ बदलगये हैं। राष्ट्रीय एकता का मूल स्वरुप धर्म से ही उदित हुआ है। धर्म कामना करता है कल्याण की और राष्ट्र कल्पना में भी नागरिकों के कल्याण की भावना ही सर्वोपरि होती है। चूँकि राष्ट्र में विभिन्न धर्मावलम्बी रहते हैं और उनकी धार्मिक सहिष्णुता भी भिन्न है, तब राष्ट्र के सम्मुख विकास कार्य चुनौती बनता है। ख़ास तौर से तब जब कोई धर्म या उसके अनुयायी अपने धर्म सर्वश्रेष्ठ माने और सहिष्णु होने मापदंड स्वयं अपने ही निर्धारित करें। उदाहरणार्थ कुछ गायें को मारना अथवा मांस खाना अपना धर्म अथवा अधिकार या कहें परम्परा मानते हैं और दूसरा वर्ग गायें मानकर उसकी रक्षा हेतु गलत सही तरीके से तत्पर रहे। यहां दोनों ही पक्ष एक दूसरे प्रतिअसहिष्णु कहे जायेंगे।
सहिष्णुता और असहिष्णुता के बीच बहुत बारीक और करीबी अंतर है। जब हम चर्चा करते हैं तो हो सकता है कि आप हमारे विचारों से सहमत न हों मगर आप सहिष्णु हों यानी असहमत होते हुए भी सहनशीलता बनी रहे। कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो सहमत हैं अथवा नहीं मगर अपनी तीखी प्रतिक्रया द्वारा किसी बात से कोई बात निकालकर असहिष्णु हो जाएँ।
प्रश्न यह है कि किसी व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र को कब तक कितना और क्यों सहिष्णु बने रहना चाहिए ? कोई व्यक्ति, समाज राष्ट्र जब हमारे अथवा राष्ट्र हितों के विरुद्ध साजिश करे,तो क्या हम सहिष्णु बने रहें?कोई धर्म या उसके अनुयायी योजनाबद्ध तरीके से राष्ट्रीय एकता अखंडता, सामजिक सद्भाव को चुनौती दे और योजनाबद्ध तरीके से दूसरे धर्म के अनुयायियों को ख़त्म करने का खेल खेले तो क्या हम सहिष्णु बने रहें? कोई हमारे घर परिवार अथवा राष्ट्रीय सीमाओं पर अतिक्रमण करे क्या हमें दुष्टों से निपटने के लिए असहिष्णु नहीं होना चाहिए?
हमारा मानना है कि सहिष्णुता का अर्थ दूसरे के विचारों को ध्यान पूर्वक सुनकर उचित को सम्मान देना। परन्तु सम्मान देते समय स्वयं, ,समाज व राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा का भी पूर्ण ध्यान रखना ही सहिष्णुता कहलायेगा।
प्राचीन काल से कहा गया है कि शान्ति की स्थापना के लिए युद्ध के लिए तत्पर रहना होता है। कालांतर से इतिहास के पन्ने पलटिये और देखिये कि भारत ने कभी साम्राज्य विस्तार का प्रयास नहीं किया। अपनी सहिष्णुता की नीति कारण सदैव खंडित भी होता रहा और आक्रान्तओं का गुलाम बनता रहा। विभिन्न धर्मों ने भी यहाँ धर्मान्तरण का खेल खेला और हम सहिष्णु बने रहे। सहिष्णु कौन हो सकता है ? क्या कोई कमजोर व्यक्ति, समाज राष्ट्र स्वयं सहिष्णु कहलाने का अधिकारी है ? नहीं ऐसा कदापि नहीं। सहिष्णु केवल वह हो सकता है जो सक्षम तो है मगर दूसरे की गलती पर क्षमा करने की प्रवृति रखता है। आप ताकतवर हैं किन्तु आक्रांता नहीं हैं, आपका सिद्धांत हो खुद भी जियो औरों को भी जीने दो। आप तभी सहिष्णु कहलाने के अधिकारीहैं। कविवर रामधारी सिंह दिनकर जी की निम्न पंक्तियाँ यहाँ पूर्ण प्रासंगिक हैं ——–
क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दन्तहीन, विषरहित, विनीत सरल हो।

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