समकालीन दोहे


राजेश जैन "राही"


1. सत्ता की सबको गरज, सबको है दरकार।
शायर से अखबार तक, खड़े मिले दरबार।।

2. बात-बात में हो गई, उनकी भी पहचान।
खादी के नीचे दिखा, रेशम का बनियान।।

3. दस्तक दंेगे द्वार पर, खुशियों के प्रस्ताव।
बाबू जी सीख का, घर में अगर प्रभाव।।

4. सपनों के प्रस्ताव पर, छोड़ा बेशक गाँव।
मात-पिता दिल में अगर, नहीं थकेंगे पाँव।।

5. सैनिक सीमा पर लड़े, दे दे अपनी जान।
बल्ला हावी देश पर, पढ़े कौन बलिदान।।

6. छक्कों पर सट्टा लगे, हार-जीत पर दाँव।
कट शीश लेकिन नहीं, हलचल होती पाँव।।

7. छप्पन ने खारिज किया, अस्सी का प्रस्ताव।
राजनीति के बाग में, फलते केवल भाव।।

8. गले लगाया गैर ने, अपने बेशक मौन।
पथिक तुम्हारा कारवाँ, रोक सकेगा कौन।।

9. होता रहे चुनाव तक, वादों का अनुलोम।
एक बार कुर्सी मिले, केवल याद विलोम।।

10. शीर्षासन है काम का, उपयोगी हठयोग।
राजनीति की क्लास में, शामिल आखिर योग।।

11. बादल को मंजूर है, धरती का प्रस्ताव।
रिमझिम बारिस प्रेम का, पहला लगे पड़ाव।।

12. मौसम सब फीके हुए, सपने सभी उदास।
प्रियतम आओ पास अब, लेकर तुम मधुमास।।

13. कुर्सी काबू में रहे, चमके खुब शरीर।
कौन सुने बंगाल में, बेकाबू कश्मीर।।

14. सभी वक्त की धार पर, क्या जनता क्या राज।
तख्त बदल कर रो रही, लावरिस अब प्याज।।

15. पहली बारिस प्रेम की, पहला वो अध्याय।
आज तलक भींगा हुआ, मन मेरा असहाय।।

16. नजरों से कुंदन करो, बातों से पुखराज।
शाहजहाँ मुझको करो, बनकर तुम मुमताज।।

17. सावन लेकर आ गया, मस्ती का प्रस्ताव।
आओ तुम भी दौड़कर, मानो प्रिये सुझाव।।

18. मिले नहीं परदेश में, अपनों का वो प्यार।
सावन के झुले यहाँ, यहीं तीज त्यौहार।।

19. पुल टूटा दुर्भाग्य से, बची भाग्य से जान।
साहब जी सोये हुए, जाग रहे भगवान।।

20. खेतों में बोता रहा, शोनित रोज किसान।
फसल काट कर ले गये, कर्ज और लगान।।

21. बहुमत से पारित हुआ, धोखे का प्रस्ताव।
पूछे कौन कबीर को, खारिज सभी सुझाव।।

22. आज्ञाकारी काम के, रहें हमेशा मौन।
निर्वासित जो पूछते, इसके पीछे कौन।।

23. ‘बच्चन‘ ने सबको दिये, प्रेम पगे संदेश।
नहीं ‘कबीरा‘ एक के, पूजे सारा देश।।

24. अभिनय से ऊपर रहे, राजनीति से दूर।
कविता की खुशबू स्वयं, चंदन और कपूर।।

25. नेता जी तुलने लगे, अब सब्जी के साथ।
फंसा टमाटर फेर में, रोती प्याज अनाज।।

26. संसद में सब छूट है, हास रहे उपहास।
नेता जी को हो गया, अभिनय का अभ्यास।।

27. हुई मतों की घोषणा, पूरा हुआ चुनाव।
पारित होगा जल्द ही, रोटी का प्रस्ताव।।

28. महंगाई छज्जे चढ़ी, नीचे खड़ा गरीब।
राजनीति देकर गई, आखिर पुनः सलीब।।

29. सजा मुकर्रर हो गई, पाप कर्म की आज।
तबादले की घोषणा, लेकर आया राज।।

30. न्याय सभी को एक सा, अवसर मिले समान।
आरक्षण हो योग्य का, महके हिन्दुस्तान।।

31. कुदरत ने खारिज किया, ख्वाबों का प्रस्ताव।
वायुयान में प्रेयसी, पड़ी कागजी नाव।।

32. तू ही तू मुझको दिखे, देखूं मैं जिस ओर।
रात चांदनी तू प्रिये, तू ही उजली भोर।।

33. धड़कन की पेशी हुई, धमकी के दरबार।
धक-धक तेरी साथिया, ध्वनि एक बस प्यार।।

34. सावन की देखो धमक, देखो तुम झंकार।
आओ अपने देश में, प्रिये बरसता प्यार।।

35. संसद में चलते नहीं, अनुशासन के पाठ।
पांच साल का दाखिला, नेता जी के ठाठ।।

36. आरक्षण हटता नहीं, हटे पुराने नोट।
खतरा है रूठे नहीं, बड़ा लाडला वोट।।

37. जंगल में सूखा पड़ा, आई बाढ़ पठार।
कुदरत के आक्रोश का, मानव जिम्मेवार।।

38. नदियों की गुनगुन रूकी, दूषित हैं तालाब।
कुदरत की नाराजगी, लाई है सैलाब।।

39. उत्सव की उद्घोषणा, जनता भी तैयार।
सत्ता फिर घोड़ी चढ़ी, अच्छी जीमणवार।

40. विज्ञापन छपते रहे, छपे न रचनाकार।
सुर्खी है अखबार की, हिंसा, भ्रष्टाचार।।

41. राजतिलक अच्छा लगे, बना रहे उल्लास।
राजनीति के पाठ से, निकल चुका वनवास।।

42. गंगा जी के घाट पर, चर्चा बेहद खास।
दूषण का मसला नहीं, राजतिलक की आस।।

43. मोह नदी की बाढ़ का, काफी तेज बहाव।
बेटों के कारण बही, बाबू जी की नाव।।

44. राज बदला रात में, आई खबर बिहान।
बहुमत लेकर लापता, नालायक संतान।।

45. राजतिलक पूरा हुआ, मुद्दों को अवकाश।
नेता जी हैं सैर पर, बाहों में आकाश।।

46. नैतिकता के नाम पर, बनी नई सरकार।
रोजनामचा बाँचता, अक्खड़ भ्रष्टाचार।।

47. देश-प्रेम सबसे अहम, नैतिकता श्रृंगार।
बच्चों में आकर बसे, ईदगाह का प्यार।।

48. प्रेमचंद फिर आइये, करती कलम पुकार।
राम नाम पर देश में, होती है तकरार।।

49. भीतर भ्रष्टाचार है, बाहर वसन सफेद।
राजनीति की षोड़सी, रटती केवल खेद।।

50. पानी पीकर सो गई, जनता खाली पेट।
गद्दी पाकर बंद हैं, राजनीति के गेट।।

51. कुदरत की रंगीनियाँ, तेरा ही प्रतिरूप।
जब से तू नाराज है, सावन में भी धूप।।

52. मेघों की हलचल रुकी, रुकी प्रिये बरसात।
जबसे तूने बंद की, मुझसे मीठी बात।।

53. गुलमोहर सूखा पड़ा, आंगन हुआ उदास।
फिर तोड़ी तुमने प्रिये, आने की हर आस।।

54. लेखन में खुशबू बसी, ग़जल हुई कचनार।
बचपन में तूने प्रिये, दिया महकता प्यार।।

55. नील-गगन जैसा लगे, ममता का विस्तार।
इंद्रधनुष गढ़ता रहे, बाबू जी का प्यार।।

56 आँखों के आदेश ही, नीति, नियम, आचार।
माणिक सा मुझको करे, बाबू जी का प्यार।।

57. आपस के अंतस मिलें, बेशक अलग विचार।
गले लगाकर मित्र को, सहज करें स्वीकार।।

58. थोड़ी मस्ती साथ में, थोड़ी सी तकरार।
दिल में लेकिन मित्र के, महके हरदम प्यार।।

59. पावन अंतस में बसा, झिल-मिल करता प्यार।
आया अपने देश में, राखी का त्यौहार।।

60. धागा लेकर आया गया, नेह भरे प्रस्ताव।
बहना मंगल कामना, भाई है सद्भाव।।

No Comments