सत्यमेव जयते !


कमल धमीजा

ट्रेन अपनी रफ्तार से चल रही थी। काफी सफर तय करने के बाद, हमने अपना खाना निकाला। सामने दो बच्चें कातर नजरों से हमें देख रहे थे। शायद उन्हें जोरों से भूख लगी हुई थी। देखने में भी बहुत निर्धन परिवार से लग रहे थे। पुराने कपडें, घिसी हुई चप्पलें बिखरे हुए बाल, ऐसा प्रतीत होता था कि काफी दिनों से नहायें नहीं थे। मैंने उन्हें अपने टिफिन में से एक पेपर प्लेट में दोनों को खाना खाने को दिया। वो दोनों बच्चें कृतज्ञतापूर्वक खाना खाने लगे।
बराबर की बर्थ पर एक मौलवी बैठें थे, उन्होंने भी कुछ बिस्कुट निकाल कर बच्चों के देकर कहा नेक परवर दिगार ने यह बिस्कुट तुम्हारे लिखे दिए है, बच्चों खालों।
मौलवी ने पूछा बेटा तुम्हारा नाम क्या है? कहाँ से आये हो और कहाँ जाना है? यह तुम्हारा भाई है? तुम्हारे अब्बा अम्मी कौन है ? मौलवी बच्चों से तहकीकात करने लगा। बच्चें इस तहकीकात से सहम से गये। कुछ समय बाद संभलने के बाद, लड़की ने अपना नाम रामदेई और भाई का नाम राजू बताया। मेरी उम्र बारह साल है और राजू दस साल का है। हम दिल्ली जा रहे हैं। हमारे मामा ने हमें गाड़ी में बिठाया और कहा कि गाँव के बुलाकी चाचा स्टेशन पर लेने आयेगें।
मोलवी ने कहा पर तुम वहां क्या करोगे? रामदेई ने कहा कि गाँव वाले कहते है कि वहां काफी बहुत काम मिलता है। हमारे गाँव के बहुत से लोग वहां पर हैं। मौलवी ने पूछा वाह क्या करोगे? वही झाड़ू पौछा -बर्तन धोना कर लेनेगे। ट्रेन अपनी रफ़्तार से अपनी मंजिल तक बढ़ने लगी। बात करते करते बच्चों की आँख में लग गई और वो बेसुध सो गएँ। चूँकि जब पेट भर जाता है तो रोटी का नशा भी बेहद नशीला मादक हो जाता है !
जैसे ही स्टेशन आया मौलवी ने बच्चों को जगाया, उठो बच्चों दिल्ली आ गई। बच्चें जल्द उठ खड़े हुए। एक संकट सामने खड़ा था कि उनको बुलाकी चाचा कैसे पहचानेंगे ना उन्होंने हमे पहले देखा ना हमने उन्हें। कुछ समय तक मौलवी उनके साथ इंतजार करता रहा बुलाकी चाचा का प्लेटफार्म पर। बुलाकी चाचा नहीं मिले। मौलवी ने बच्चों को अपने साथ चलने के लिए राजी कर लिया। मौलवी अपने साथ बच्चों को मस्जिद में ही रहने के लिए ले आया। बच्चों से मौलवी बोला तुम मुंह हाथ धोलो मैं तुम्हारे लिए खाने का इंतजाम करता हूँ। कुछ समय बाद सबने खाना खा लिया। मौलवी ने खाने के बाद दोनों के लिए काम ढूंढने की बात की। लेकिन तुम मेरे साथ इसी मस्जिद में रहोगे यह अल्लाह का घर है। दिल्ली शहर बहुत बड़ा है कही खो ना जाओ। अब बच्चें वही मस्जिद में रहने लगे। समय की गाड़ी पटरी पर चल निकली।
एक रात मौलवी धीरे से बच्चों के पास गया और बहाने से रामदेई से कहा कि पानी ले कर आओ मेरे पास। मौलवी ने पानी में कुछ मिलाया। आधा पानी खुद पिया और आधा पानी उसको पीने को दिया। पानी पीकर रामदेई को कुछ होश ना रहा। रात के अँधेरे में उसके साथ बलात्कार कर दिया। रामदेई चिल्लाती रही राजू दोड़ कर आया उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। किसी तरह से दोनों बच्च्चों ने जाग कर रात काटी और सुबह होते ही मौका देख मस्जिद से भाग लिए।
समय बीतता गया तब तक राजू भी सब कुछ जान्ने समझने लगा था। उसने मौलवी से बदला लेने की ठानी। एक दिन वो मस्जिद में पहुंचा। जहाँ मौलवी एक कमरे में रहता था। लिकिन मौलवी उसे पहचान ना पाया। राजू ने कहा बाबा मेरा नाम करीम है। मैं मुज्जफर नगर से आया हूँ। काम की तलाश में भटक रहा हूँ किन्तु काम नहीं मिल रहा है। क्या मैं इस अल्लाह के घर में कुछ दिन सर छुपा सकता हूँ। बाबा ने कहा हाँ हाँ क्यों नहीं ये खुदा का ही तो घर है। यह सबके लिए छत, खाना और जरूरत की चीजें देता है। बाते करते करते दोनों सो गये। मौका देख राजू ने तेजधार से उसके गुप्ताँग को शरीर से अलग कर दिया। मौलवी उर्फ़ बाबा की चीखें मस्जिद के रहस्यमयी जाल में गुम होकर दफन हो गई। राजू का इंतकाम पुरा हो चूका था। अब मौलवी केवल जनखा बन चूका था। कहानी यही खत्म हो रही है लेकिन बिना सही समाधान के।
किन्तु कुछ यक्ष प्रश्न है!
हम कहाँ सुरक्षित है घर में, चर्च में पादरी के पास मस्जिद में मौलवी के पास ! कहाँ है सुरक्षित हम?
कहानी इस प्रकार की बहुत सुनी होगी किन्तु इस कहानी में कुछ नया है तो यही कि इसमें लम्बी चोटी वाला लम्बें तिलक वाला पुजारी नहीं ! वरण लम्बी दाड़ी वाला छेड़ वाली टोपी पहने मजहब की इल्म देने वाला पांच समय नमाज का पाबन्द मौलवी है! किन्तु हमारे फिल्मबाज़ कहानीकार निर्माता और यह पित्त पत्रकारिता वाले कुकरमुत्ते इस करेक्टर को बदल कर पुजारी बना देते है! सच्चाई यही है समाज में सबसे ज्यादा बलात्कार चर्च के पादरी और मस्जिद के मौलवी ही करते है। किन्तु सत्यमेव जयते में आमिर खान को सब जगह पुजारी ही क्यों नज़र आता है यही यक्ष प्रश्न है जिसका में उत्तर तलाश रही हूँ!!!!!

No Comments