सख्त बजट ने किसी को नहीं छोड़ा, दाम बढ़ने के संकेत


शिवाजी सरकार

budget-2015-2016
यह बहुत ही सख्त बजट है. इसमें प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के साक्षर तो युवानीति, बुजुर्गों के लिए कर छूट, मेक इन इंडिया के तहत विकास की कोशिश में तो दीखते है. पर साथ ही जनता द्वारा बाहर किये गए मनमोहन सिंह के मुहर भी दिखती है. बजट से मुद्रास्फीति बढ़ेगी और लोगों को अपनी जेबे ढीली करनी पढेगी. इस बजट के नीतिगत बातों में तो राजननीतिक सोच दिखती है पर अन्य स्तरों पर नौकरशाही ही हाबी लगती है. टैक्स का आतंक ख़त्म होने के बजाय बढ़ता हुआ दिख रहा है.
एक सुनहरा अवसर था. मुद्रास्फीति नीचे था. जनता की आकांक्षाए कुछ ज्यादा ही थी. अगर अच्छे दिन नहीं भी तो संप्रग सरकार के निर्धारित रास्ते से निकलने में कोई परेशानी नहीं थी. जनता परिवर्तन और खुशहाली का इंतजार कर रही थी. उन्हें पिछले सरकार के नीतिओं का चलते रहना शायद ही मंजूर हो.
अधिकारिओं को बार बार सफाई देने की जरूरत नहीं पढ़ती. गृहमंत्री राजनाथ सिंह की यह कहने की जरूरत भी नहीं पढ़ती कि “पेट्रोल का दाम तीन रुपये बढ़ा तो क्या हो गया”. शायद वे भूल गए कि दिल्ली में चुनाव ऐसे ही जुमलों से हार गए. देश में कुछ अधिकारी या व्यवसायी अमीर हो सकते है. आम जनता आंकड़ो के कारीगरी के बावजूद गरीब ही है. दिल्ली में ६० प्रतिशत लोग, बल्कि कहे कि परिवार, 12 से 13 हजार रुपये मासिक आमदनी पर गुजारा करती है. इनमे से आधे लोगो की आमदनी 6 से 7 हजार से अधिक नहीं है. वे चाहते है कि कोई तो उनकी बात करे. वे मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम के आतंकी साए से निकलना चाहते थे.
और इतना करों का बोझ लादने के बावजूद कुल बजट पिछले बजट के बराबर यानि 17 लाख करोड़ के आसपास ही दिखती है. नए महत्वकांक्षी योजनाओं के लिए पैसे कैसे आयेंगे?
 उम्मीद थी की कृषि पर ख़ास तवज्जुह दी जायेगी और कृषि को अर्थनीति का आधार बनाया जायेगा. कुछ ऐसी सोच भाजपा के चुनावी घोषणा में झलकती थी. पर 70 करोड़ लोगो की चिंता पिछले बजटो में जैसा किया जाता रहा कुछ वैसा ही दिखा. ग्रामीण विकास और सिंचाई के लिए लगभग 75000 करोड़ रुपये का प्रावधान जरूर किया गया है. पर खेती में निवेश कैसे बढेगा या किसान को लागत कैसे वापस मिलेगी इस पर सोच कम ही दिखती है. किसान को उम्मीद थी की स्वामीनाथन समिति की रपट पर अमल कर उन्हें अपनीं लागत के हिसाब से अनाज का मूल्य मिलेगा.
टैक्स का आतंक ख़त्म करने की बात की गयी थी. चिदंबरम को इसी बात पर कटघरे में खड़ा किया गया था. अब तो काला धन हटाने के नाम पर नया कानून तो हर व्यक्ति और व्यवसायी को आतंकित करता रहेगा. समाज ने कर को राज्य को चलाने के लिए स्वैच्छिक दान के रूप में मान्यता दी थी. इसे एक जरायम मानना एक बढ़ी भूल है. इसके लिए दस साल की जेल, कार का 300 प्रतिशत दंड, अपील की गुंजाईश न होना तो कर अधिकारिओं को दैत्य बना देगा.
कर अधिकारी वैसे भी सतता के लिए कम ही जाने जाते है. उन्हें इस प्रकार का अधिकार देने की उम्मीद इस सरकार से कतइ नहीं थी. कर व्य्ववस्था को सहज बनाने की आशाए थी. कानून जितना सख्त होता है अधिकारिओं की उतनी ही चांदी होती है. उनके वसूली की ताक़त बढ़ जाती है. लगता है सरकार नौकरशाही के चाल को समझ नहीं पाई. इससे तो कर दफ्तर जज, जूरी और पुलिस सभी हो जायेंगे. यह कानून कभी भी नहीं बनना चाहिए.
कर चोरी रोकने के लिए कार दरों को कम करने की जरूरत है. कॉर्पोरेट दरों को कम 30 प्रतिशत से 25 प्रतिशत किया गया है. छूट भी समाप्त कार दी गयी. इससे कम्पनिओं को बैलेंस शीट बनाना आसान हो जायेगा और उन्हें तमाम तरह की कवायद छूट के लिए नहीं करना पढ़ेगा.
ऐसा ही अगर वित्त मंत्री अरुण जेटली निजी आयकर में भी करते तो अच्छा होता. वस्तुतः निजी आयकर अगर समाप्त कर दिया जाये और आयकर विभाग में अधिकारी कम कर दिए जाए तो सरकार को कोई घाटा नहीं होगा. कर उगाहने की प्रक्रिया में सरकार जो व्यय करती है उसमे कटौती होगी. जनता को कर न देने से होने वाली बचत से खरीददारी कर प्रधान मंत्री के मेक इन इंडिया के सपनों को साकार करने का मौका मिलेगा. अप्रत्यक्ष कर से सरकार मालामाल होगी. साथ ही प्रधान मंत्री का भ्रस्टाचार-मुक्त भारत का सपना कुछ हद तक सफल होता. tax-200118-02-2015-03-11-99T 
युवा और वरिस्ठ नागरिकों को वीमारी और इलाज के लिए तीस हजार रुपये तक बीमा और बचत में १.५० लाख रुपये तक छूट दी गयी है. पर यह नहीं सोचा गया कि महंगाई चौतरफा मार झेल रही जनता, करों को बढ़ने से बचत कैसे करेंगी. बुजुर्गों को इलाज के लिए 60,000 रुपये के व्यय तक कर छूट लेने की इजाजत दी गयी है. पर हमें डर है कि अगर उन्होंने छूट ले ली तो “ईमानदार” कर अधिकारी बुजुर्गों को उनके दफ्तर के चक्कर काटने पर मजबूर करेंगे.
जी हाँ, हजारो लोग जिन्होंने गृह ऋण में छूट ली वे पिछले 15 सालो से इनकम टैक्स दफ्तर के चक्कर काट रहे है. जिन्होंने ले-दे कर हिसाब कर लिया वे ही बच पाए है. वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री से उनकी गुहार है कि उनके 15 सालो का आतंक और परेशानी समाप्त करे. आयकर या तो समाप्त करे या कम से कम तब तक व्यक्तिगत आयकर कर के दर को 15 प्रतिशत से अधिक न रखे.
कालाधन समाप्त करने के लिए, बैंक में रखे गए बचत पर टैक्स को समाप्त करना चाहिए. इससे सबसे ज्यादा नुकसान गरीब बचतकर्ता को होता है. उनका टैक्स कट जाता है और उसे प्राप्त करने के लिए उन्हें चार्टर्ड अकाउंटेंट को कही ज्यादा पैसे चुकाने पढ़ते है. सर कारने बचत के लिए छूट बढ़ाइ है. पर बचत तो तब होगा जब लोग बैंक में पैसे रखेंगे. अगर सरकार बैंकों की दशा सुधारना चाहती है तो बैंक पर TDS को बजट पास करने के पहले समाप्त करे. अन्यथा तथाकथित कालाधन बढ़ता ही रहेगा.
कालाधन इन्ही उपायों से समाप्त होगा. कठिन कानूनों से तो अधिकारिओं के पास ही कालाधन बढ़ने लगेगा. पिछले कुछ वर्षों में जनता ने और सरकार ने यह देखा है. पिछली सरकार तो जनविरोधी मानी जाती थी. अब यह सरकार तो सुधार करे, जनता यही चाहती है.
विरोधिओं ने और मोदी की राजग सरकार के आलोचक कहते है की यह बजट कम्पनिओं के लिए है. नहीं ऐसा नहीं है. कर दर को सामान्य स्तर पर लाने के अतिरिक्त उन पर भी करो का बोझ बढ़ा दिया गया है.
जिनकी आमदनी एक करोड़ से ज्यादा है उन्हें 12 प्रतिशत का अधिभार देना पढ़ेगा. यह व्यक्ति, हिन्दू अविभाजित परिवार (HUF) या फार्म सभी को देना है. कम्पनिओं पर थोड़ी रहम जरूर की गयी है. उन्हें 10 करोड़ के आमदनी तक 7 प्रतिशत और उससे अधिक पर 12 प्रतिशत चुकाने होंगे.
सरकार विदेशी कम्पनिओं को देश में बुलाना चाहती है. उन्हें छूट दी गयी है कि 10 करोड़ तक 2 प्रतिशत और उससे अधिक पर 5 प्रतिशत अधिभार देना पढ़ेगा.
कम्पनिओं को लाभांश के भुगतान पर अभी 10 प्रतिशत अतिरिक अधिभार देना पढता है. इसे बढाकर 12 प्रतिशत कर दिया गया है. 1
करों के मार से किसी को छोड़ा नहीं गया है. पेट्रोल  2 रुपये से बढाकर 8 रुपये कर किया गया है. इससे सबसे ज्यादा मार तो सरकार पर ही पढेगी. सरकार के पास ही सबसे ज्यादा गाड़ियाँ है. जनता तो मजबूर है. इसे मूलभूत ढांचा के लिए जुटाया जाएगा. पर सरकार ने सड़क सेस से जो एक लाख करोड़ इकठ्ठा किया है उसका क्या उपयोग किया यह नहीं बता रहीं है. आखिर सरकार अगर रोड या मूलभूत ढांचा सेस बढ़ाती है तो टोल टैक्स ख़त्म क्यों नहीं करती है? अगर सरकार साथ ही टोल समाप्त करने का ऐलान करती तो लोग खुश ही नहीं होते, उन्हें इस सरकार को कॉर्पोरेट परस्त मानने का कारण भी न रहता.
बाहर होटल में खाना खाना या हवाइ सफ़र करना भी महंगा हो गया. सेवा कर को 12.36 प्रतिशत से 14 प्रतिशत करने से सभी सेवाएँ महंगी हो गयी और जनता की जेब कट गई. इसे वस्तु और सेवा कर (GST) की ओर अग्रसर होने की नीति के रूप में एक कदम बताया गया. इस पर अगर २ प्रतिशत का स्वच्छ भारत सेस भी लगा दिया गया तो कोढ़ पर खाज ही होगा.
उसमे शायद कुछ समय लगे. पर कई नइ सेवाएँ सेवा कर के अधीन आ गयी. क्रिकेट, टेनिस, हॉकी, या ऐसे कोई भी मनरंजक कार्यक्रम जिनकी टिकटे 500 रूपये से अधिक मूल्य की होगी सेवाकर के  दायरे में होंगी. किस भी सरकारी या नगर पालिका की सेवाओं पर भी कर देना पढ़ेगा.
यही नहीं अब शिल्पिओं को भी सेवा कर का भुगतान करना पढ़ेगा. एअरपोर्ट या हॉस्पिटल के फ्री फ़ोन के इस्तमाल पर भी सेवा कर लगेगा.
30 प्रतिशत की सेवा कर से हवाई, रेल या पानी की जहाज से सफ़र महंगा होगा. जो बिजनेस क्लास से सफ़र करेंगे उन पर तो और ज्यादा मार पढेगी.
वित्तमंत्री ने रेल के माल धुलाई को भी महंगा कार दिया. इससे अनाज, दल, आटा, दूधम नमक महंगे होंगे. साथ ही चित फण्ड, लाटरी टिकट, म्यूच्यूअल फण्ड भी इसके दायरे में आ गए.
सरकार को उम्मीद है देश में विकास और प्रगति होगी. पर कैसे? महंगाई बढ़ने से प्रगति नहीं होती है. इसका सबसे ज्यादा पर जनता पर तो पढ़ती ही है, पर उससे ज्यादा सरकार पर पढ़ती है. सरकार सबसे बढ़ी उपभोक्ता है. उसे ऐसी निति अपनानी चाहिए जिससे की कीमते कम रहे, देश में खुशहाली रहे और सरकार को देश को आगे ले जाने में मदद मिले. पिछले 24 साल से मनमोहन सिंह यही गलती करते रहे. इसलिए केवल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपाई का शासन काल छोड़कर महंगाई बढती रही,  GDP के आंकड़े बढ़ते रहे और देश में तकलीफे बढती रही.2
अभी मौका है. प्रधान मंत्री को बजट पास होने से पहले तमाम करो को कम करना चाहिए. ऐसी निति बनानी चाहिए कि कीमते कम रहे, कर आतंक न रहे और देश तरक्की करे. कर बढ़ने से न तो निवेश आते है न ही तरक्की होती है. आम जनता ने तो कम से कम इस प्रकार के महगाईपरक बजट के लिए उन्हें वोट नहीं दिया था. उनके अच्छे दिन के लिए संसद में जवाब देते वक्त अगर प्रधानमंत्री कुछ सौगात देंगे तो लोग खुश होंगे और सरकार की साख बढ़ेगी.
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