राजनीति की प्रयोगशाला बनते शिक्षा परिसर


डॉ विनोद बब्बर

‘शिक्षा बंधनों को काटती है। संकीर्णताओं से मुक्त करती है। मस्तिष्क को ताजगी देती है। ज्ञान देती है। विनय देती है। पात्रता देती है। यानी जीने का ढ़ंग सिखाती है। शिक्षा और अनुशासन का चोली दामन का साथ है। अनुशासन से ही कोई राष्ट्र महान बनता है।’ ऐसे अनेक सद्वाक्य हर भाषा में, हर देश, हर परिवेश में बार-बार दोहराये जाते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि राजनीति के बारे में ठीक इससे विपरीत विचार सुनने को मिलते हैं। राजनीति असंभव को संभव बनाने की कला है। वह अनुशासन नहीं, हर हाल में अपना शासन बरकरार रखने की तिकड़म है। हारी बाजी को पलटने का दुस्साहस है। साम, दाम, दंड, भेद यानी समाज को जोड़ने के नारे, वर्ग समाप्त करने के स्वप्न दिखाकर वर्ग संघर्ष, भाई-भाई को लड़ाने से, अपने बाप-भाई का अहित करने तक कुछ भी निष्ठुरता लेकिन चतुराई से करते रहने को राजनीति कहा गया है। एक विचारक के अनुसार ‘राजनीति पति को अपने हाथो मार कर उसके साथ सती होने का उपक्रम भी कर सकती है।’ स्पष्ट है कि जब शिक्षा में राजनीति प्रवेश करेगी तो अनर्थ ही करेगी।’ यह उत्तर है उस प्रश्न का जिसमें पूछा गया था कि इन दिनों हमारे कुछ शिक्षा परिसरों का वातावरण क्यों बिगड़ रहा है? क्या कारण है कि जहां शांति और सदभावना रहती थी अचानक तनाव पसर रहा है?
आज देश का हर चिंतनशील अभिभावक हैदराबाद, जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय वगैरह, वगैरह के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के शैक्षिक वातावरण बिगाड़ने जाने को लेकर चिंतित है। उन्हें आशंका हो रही है कि सत्ता की गोद के बिना बिलबिला रहे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों की जमात देश के अन्य स्थानों पर भी युवा वर्ग को भड़काकर अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के षड़यंत्र रच सकती है। ऐसे में प्रश्न यह भी है कि क्या प्रशासन में सजगता की कमी है या प्रशासन में भी कुछ तत्व ऐसे घुसे हुए हैं जो ऐसी शक्तियों के हाथों में खेल रहे हैं? यदि ऐसा है तो उन्हें नियंत्रित करना किसकी जिम्मेवारी है? क्या इसे नेतृत्व की असफलता माना जाये? शिक्षा संस्थानों में राजनीति पर प्रतिबंध क्यों नहीं होना चाहिए? ऐसे अनेक प्रश्न चिंतित अभिभावकों के मन में उमड़-घुमड़ रहे हैं।
कुछ लोग शिक्षा संस्थानों में राजनीति और छात्र राजनीति को पर्याय बताते हैं लेकिन कुछ के अनुसार इन दोनो में बुनियादी अंतर है। स्वतंत्रता से पूर्व दादा भाई नौरोजी ने युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए स्टूडेंट सोसाइटी की स्थापना की। बाद में गांधीजी के आह्वान पर युवा छात्रों से कक्षाओं के बहिष्कार किया। आजादी के बाद भी छात्र राजनीति जारी रही। लगभग सभी दलों ने अपने अपने छात्र संगठन खड़े किये। विश्वविद्यालयी राजनीति का महत्व बढ़ा। 1975 में देश पर तानाशाही लादने की कोशिशों के विरोध में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व जो आंदोलन हुआ उसमें भी छात्रों की सक्रिय सांझेदारी रही। उस समय के अनेक छात्रों ने बाद में राजनीति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कुछ संगठनों ने देश के भविष्य यानी विश्वविद्यालयों को राजनीति की प्रयोगशाला बनाते हुए छात्रों को अपनी राजनीति का टूल के रूप में उपयोग करना आरंभ किया। ऐसे में ‘छात्र राजनीति’ के स्थान पर ‘शिक्षा परिसर में राजनीति’ का जन्म हुआ। पिछले कुछ दशकों से कुछ विश्वविद्यालय एक खास रंग की राजनीति के अड्डे बनने लगे। देश और दुनिया के मानचित्र से सिमट रही इस विचारधारा ने स्वच्छन्दता को स्वतंत्रता का पर्याय बनाने की हरसंभव कोशिश की। उनके लिए न राष्ट्र का कोई अर्थ है और न संस्कृति का। कोढ़ में खाज ये कि अपने राजनैतिक आकाओं पर दबाव डाल कर एक विचारधारा विशेष के अधिसंख्यक शिक्षकों की नियुक्ति करावाई गई जिससे छात्रों को प्रभावित करने से दबाव डालने तक का स्थायी रोडमैप मिल गया। भारतीय संस्कृति से इन शिक्षकों का विरोध जगजाहिर है। वे देश के बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं को आहत करने वाले वक्तव्यों के लिए सदा तत्पर रहते है। अभी हाल ही में जब देशभर में दुर्गापूजा का उत्सव है, दिल्ली विश्वविद्यालय के केदार मंडल ने सोशल मीडिया पर देवी दुर्गा के बारे में अश्लील टिप्पणी कर अपनी मानसिकता का परिचय दिया। आश्चर्य है कि ये वे लोग है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अपनी हर गलती को महिमा मंडित करने से नहीं चूकते।
बदलते परिवेश में इंटरनेट और सोशल मीडिया के प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसने जहां सम्पर्क और सूचना के आदान प्रदान को सरल, तीव्र और प्रभावी बनाया हैं वहीं अमर्यादित सामग्री का प्रचार-प्रसार भी किया है। सब की इन तक पहुंच का प्रश्न अब गौण हो चुका है क्योंकि अब ऐसी सामग्री स्वयं सब तक पहुंचने लगी है जो एक और मुक्त यौनाचार की पक्षधर है तो दूसरी ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश के विरूद्ध वातावरण बनाने का कार्य करती है। समाज की शांति भंग करने के लिए धार्मिक द्वेष फैलाने से राष्ट्र विरोधी उत्तेजक नारे लगाये जाना अब कोई रहस्य नहीं रहा। विश्वविद्यालय भी इनसे अछूते नहीं हैं। किसी घटना को बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करने से फोटोशाप के माध्यम से अर्थ का अनर्थ करने वाले तत्व पूरी कलाकारी और समर्पण से लगे हैं। कुछ टीवी चैनल बात का बतंगड़ बनाने की कला के महारथी एंकरों की योग्यता का भरपूर उपयोग कर रहे हैं लेकिन सूचना प्रसारण मंत्रालय, प्रेस कौंसिल ऑफ इण्डिया, न्यायालय हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
जहां तक वाराणसी में बीएचयू परिसर की घटनाओं का प्रश्न है, वहां होस्टल में रहने वाली कुछ लड़कियां ने कुछ लड़कों द्वारा बदतमीज़ी की शिकायत करते हुए कुछ सुरक्षात्मक उपाय करने की मांग की और अगले दिन धरने पर बैठ गई। देर शाम जब धरना समाप्त होने ही वाला था, एक संगठन से संबंद्ध कुछ छात्राओं ने कुछ लड़को के साथ वहां पहुंचकर अगले दिन मोदी के आने तक इसे जारी रखने का दबाव बनाया। बाहर से आये वामपंथी छात्र संगठनों के लोगों ने मूल समस्या को पीछे करते हुए रातभर में पूरे परिसर को मोदी विरोधी बैनरों और पोस्टरों से पाट दिया गया। अगले दिन सड़क जाम की स्थिति उत्पन्न होने से सुरक्षा एजेन्सियों ने प्रधानमंत्री का रूट बदल दिया तो इन संगठनों को अपनी योजना असफल होती नजर आई और वे स्थानीय छात्राओं के साथ कुलपति का घेराव करने पहुंच गये। प्रत्यादर्शियों के अनुसार उनमें से अनेक शराब पीये हुए थे और आपत्तिजनक नारे लगाते हुए हुड़दंग करने लगे। माहौल खराब होता देख पुलिस को सूचित किया गया। एक बार फिर पासा उल्टा पड़ता देख इन लोगों ने लड़कियों को अपना सुरक्षा कवच बनाने के लिए उन्हें आगे कर दिया और पीछे रहते हुए उन्हें लगातार भडकाते रहे। उन्हें बहस में उलझाकर उन्होंने भारतरत्न महामना मदन मोहन मालवीय जी की मूर्ति पर कालिख पोतने का पाप किया। उनके पास पेट्रोल बम होना प्रमाण है कि वे उत्पात की पूरी तैयारी के साथ आये थे। योजना के तहत वाहनों को निशाना बनाया गया। लडकियों को आगे कर पुलिस पर पथराव कर उसे जवाबी कार्यवाही के लिए विवश किया गया। लाठीचार्ज और भगदड़ से कुछ लड़कियों को भी चोट लगी। इसी बीच दुर्गापूजा, दशहरा की छुट्टियों की घोषणा और सभी से अपने घर जाने के लिए कहा गया तो मोहरा बनी लड़कियां खुद स्वीकार कर रही है कि वामपंथियों ने उनके कंधे पर बंदूक रख चलाई। यह तथ्य कोई रहस्य नहीं कि एक टीवी चैनल वाले अपने साथ बाहर से कुछ लड़कियों को लाये जो स्थानीय लड़कियों की बीच बैठ टीवी इंटरव्यू दे रही थी। बाद में उन्हें उसी कार में वापस जाते भी देखा गया।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ स्थानीय कारणों से युवा छात्रों में रोष हो सकता है। उनकी समस्याओं का समाधान होना चाहिए। सुरक्षा के प्रबंध कड़े होने चाहिए। होस्टल में रहने वाले छात्राओं की हर शिकायत को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन को उनके स्थानीय अभिभावक की भूमिका में होना चाहिए। लेकिन साथ ही बाहरी तत्वों के प्रवेश पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। क्या यह छात्रहित में नहीं है कि अब विश्वविद्यालयों से राजनीति को निकाल बाहर किया जाये?
यहां यह विशेष स्मरणीय है कि स्वयं महामना मदन मोहन मालवीय जी ने ‘छात्र और राजनीति’ नामक लेख में लिखा है कि जब तक राष्ट्र पर कोई बड़ा संकट न हो तब तक छात्रों को राजनीति से दूरी रखनी चाहिए और अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर केंद्रित करना चाहिए ताकि वो एक बुद्धिजीवी नागरिक बन सकें और देश की उन्नति में ज्यादा बेहतर योगदान दे सकें।

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