वैकल्पिक चिकित्सा का बढ़ता बाज़ार


प्रभाष कुमार झा

2भले ही हम एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के सहारे किसी सामान्य बीमारी से तुरंत राहत पा लेते हैं, लेकिन इसके प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए भारत समेत दुनियाभर में इससे इतर वैकल्पिक पद्धति से उपचार कराने का चलन बढ़ रहा है। प्राचीन संस्कृति आधारित चिकित्सा की पारंपरिक प्रणालियां सदियों से स्वास्थ्य व जीवन रक्षा में सहायक साबित हुई हैं और 21वीं सदी में भी काफी विश्वसनीय साबित हो रही हैं। इलाज की इन पद्धतियों में विश्वास जताने वाले लोगों का मानना है कि जहां इससे उपचार का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता है, वहीं इसके अंतर्गत दी जाने वाली चिकित्सा स्वाभाविक व सहज होने के साथ-साथ सस्ती भी होती है। भारत में वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में आयुर्वेद सबसे प्रभावी पद्धति मानी जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक भारत की 65 प्रतिशत जनसंख्या किसी न किसी रूप में आयुर्वेदिक उपचारों का इस्तेमाल करती है, हालांकि ज्यादातर लोग ऐसा आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं तक पहुंच नहीं होने के कारण करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, विकासशील देशों में करीब 80 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक स्वास्थ्य उपचार के तौर पर पौधों, पशुओं और खनिजों से जुड़े प्राकृतिक उत्पादों का पारंपरिक रूप से इस्तेमाल करती है।

हमारे देश में आयुर्वेद की परंपरा पांच हजार साल से भी पुरानी है। यह और बात है कि सरकारी स्तर पर इसे मान्यता देने की दिशा में पहला गंभीर प्रयास लगभग 20 साल पहले हुआ। उस समय से सरकार वैकल्पिक चिकित्सा प्रणाली की सुविधा देश के भीतर लोगों तक पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। वर्ष 1995 स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने अलग विभाग बनाकर भारतीय चिकित्सा और होम्योपैथी पद्धति (आईएसएमएंडएच) को स्वतंत्र पहचान दी थी, जिसे नवंबर 2003 में आयुष विभाग बना दिया गया। इसमें आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी को शामिल किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत वर्ष संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की जोरदार वकालत करने के बाद अपनी सरकार में आयुष विभाग को अलग मंत्रालय का दर्जा दे दिया। वर्ष 2002 में स्वीकृत राष्ट्रीय नीति में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि भारतीय चिकित्सा प्रणाली को चरणबद्ध रूप में समेकित करते हुए स्वास्थ्य सेवाओं की मुख्यधारा से जोड़कर आगे बढ़ाया जाए। सार्वजनिक क्षेत्र में आयुष नेटवर्क को समग्र रूप से मजबूत बनाने के लिए हाल ही में राष्ट्रीय आयुष मिशन शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य आयुष सेवाओं पर विशेष ध्यान देना, शिक्षण संस्थाओं में सुविधाओं को विकसित करना, औषधियों की गुणवत्ता के नियंत्रण में सुधार लाना, क्षमता सृजन और समुदाय आधारित निवारक और स्वास्थ्य संवर्धक सेवाओं का विस्तार करना है। आयुष से जुड़ी सार्वजनिक नीति की पहली और सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह सुनिश्चित करना है कि इसमें विश्वास जताने वालों की इस तक पहुंच हो। सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2015 के मसौदे और राष्ट्रीय आयुष मिशन की कार्य नीतियों में कहा गया है कि एलोपैथिक पद्धति से चिकित्सा उपलब्ध कराने वाले केंद्रों के साथ इन्हें सहस्थापित करने की नीति जारी रहेगी। राष्ट्रीय ग्राम स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत आयुष को समेकित करने की भी सरकार ने पहल की है। सरकार का उद्देश्य आयुष प्रणाली को राष्ट्रीय स्वस्थ्य सेवा प्रणाली से जोड़ने की है। वर्ष 2104 तक एनआरएचएम के तहत देश के 331 जिला अस्पतालों, 1885 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और 8461 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आयुष की सुविधा मुहैया करा दी गई है।3

स्पष्ट है कि सरकार देश की स्वास्थ्य सेवाओं में आयुष को पूरक के तौर पर स्थापित करने के लिए भरसक प्रयास कर रही है। जरूरत इसके व्यापारिक पहलू पर ध्यान देने और बढ़ती मांग को भुनाने की भी है। हालांकि, तथ्य यह है कि कैंसर से लेकर जुकाम तक के प्राकृतिक उपचार का दावा करने वाला भारत दुनिया में वैकल्पिक चिकित्सा की बढ़ती मांग को भुनाने में नाकाम रहा है। उसकी नजर 100 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 6372 अरब रुपये) की वैकल्पिक दवाओं के वैश्विक बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने पर है। वर्तमान में वैकल्पिक चिकित्सा के उभरते हुए वैश्विक कारोबार में भारत का हिस्सा बहुत कम (महज 1.6 प्रतिशत) है। वैकल्पिक चिकित्सा के व्यापार की पृष्ठभूमि में यह बात ध्यान रखने वाली है कि मानव इतिहास के शुरुआती दौर से ही जड़ी-बूटियों (हर्बल्स) के माध्यम से कई रोगों का इलाज किया जाता रहा है। नई दवाओं के विकास में भी औषधीय पौधों की अहम भूमिका है। कई आधुनिक एलोपैथिक दवाएं प्राकृतिक उत्पादों से बनाई जाती हैं। औषधीय गुणों से युक्त पौधों के पर्याप्त रूप से उपलब्ध होने के कारण भारत में आयुर्वेदिक दवाओं के कारोबार की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। उसे वैश्विक बाजार की प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए औषधीय पौधों में मौजूद क्षमताओं का इस्तेमाल करना होगा और इसकी वैज्ञानिक पद्धति को वैधता प्रदान करनी होगी। वैश्विक हर्बल उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार यूरोप है। जर्मनी, फ्रांस, इटली और नीदरलैंड जैसे देशों में भारत से बड़ी तादाद में इन उत्पादों का निर्यात किया जाता है। दुनिया के 12 मेगा बायोडायवर्स देशों में भारत की गिनती होती है। हर्बल बाजार से जुड़े विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक इसका वैश्विक कारोबार पांच खरब डॉलर तक पहुंच सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इंफॉर्मेशन टेक्नॉलजी के बाद हर्बल टेक्नॉलजी से भारत सबसे ज्यादा आय अर्जित करने में कामयाब हो पाएगा।4

भारत में वेलनेस यानी सेहत को लेकर जागरूकता बढ़ रही है और उसी अनुपात में इससे जुड़े उत्पादों का बाजार भी तेजी से बढ़ रहा है। ज्यादातर अनुमानों में कहा गया है कि आने वाले कुछ वर्षों तक यह सालाना 17 से 20 प्रतिशत की दर से बढ़ेगा। वेलनेस से जुड़े उत्पादों में आम तौर पर सौदर्य प्रसाधनों, फिटनेस व कॉस्मेटिक उत्पादों और वैकल्पिक थेरेपी (आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी और सिद्ध) शामिल किए जाते हैं। मेक इन इंडिया की साइट के अनुसार, फिलहाल भारत में इन उत्पादों और सेवाओं का घरेलू बाजार 490 अरब रुपये का है। इसमें सेहत सुधारने से जुड़ीं सेवाओं की हिस्सेदारी ही 40% है। आयुष सेक्टर का सालाना कारोबार 120 अरब रुपये का है। इस सेक्टर में माइक्रो, लघु, मझोले स्तर के हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक है। भारत में करीब नौ हजार इकाइयां आयुष दवाइयां बना रही हैं और ये सालान लगभग 40 अरब रुपये की दवाइयां बेचती हैं। भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) के एक अध्ययन के मुताबिक सेहत से जुड़ी सेवाओं (वेलनेस सर्विसेज) में वर्ष 2010 में 10 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ था और वर्ष 2105 तक इस क्षेत्र में 30 लाख लोग कार्यरत होंगे।

आयुष उत्पादों के भारत से अंतरराष्ट्रीय व्यापर की बात करे तो पश्चिमी यूरोप, रूस, अमेरिका, कजाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, नेपाल, यूक्रेन, जपान, फिलीपीन्स और केन्या आदि प्रमुख बाजार है। वर्ष 2003-04 से पहले विदेश व्यापार के संदर्भ में आयुष उत्पादों को सिर्फ दो श्रेणियों में बांटा जाता था- आयुर्वेदिक और यूनानी दवाएं एवं होम्योपैथिक दवाएं। हालांकि, 2003-04 के बाद इस सूची में काफी विस्तार हुआ और आयात-निर्यात के आंकड़ों में आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी का अलग-अलग उल्लेख होने लगा। वर्ष 2011-12 के 19069.39 करोड़ रुपये के मुकाबले 2012-13 में 30 प्रतिशत अधिक 24741.22 करोड़ रुपये के आयुष उत्पादों का देश से निर्यात हुआ। वृद्धि की यह दर स्थायी नहीं रही और वर्ष 2013-14 में सिर्फ 15717.23 करोड़ रुपये के आयुष उत्पादों का निर्यात हुआ, जो पिछले वर्ष की तुलना में 36 प्रतिशत कम था। निर्यात के आंकड़ों के उलट भारत में आयुष उत्पादों का आयात लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2011-12 में 504.06 करोड़ रुपये का आयात हुआ था, जो अगले साल 23 प्रतिशत बढ़कर 708.64 करोड़ रुपये हो गया। वर्ष 2013-14 में आयुष उत्पादों के आयात बिल में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह बढ़कर 888.70 करोड़ रुपये हो गया। इस प्रकार, वर्ष 2012-13 में आयुष उत्पादों का व्यापार पिछले साल के 19573.45 करोड़ के मुकाबले 25449.87 करोड़ रुपये का हुआ। हालांकि, 2013-14 में यह 35 प्रतिशत घटकर 16605.93 करोड़ रुपये का रह गया। वर्ष 2003-04 से लगातार आयुष उत्पादों के व्यापार में बढ़ोतरी हुई है। केवल दो वर्षों 2009-10 और 2013-14 में निर्यात में गिरावट दर्ज की गई, जबकि 2010-11 में आयात पिछले वर्ष के मुकाबले कम रहा था।5

दवाओं के व्यापार से इतर चिकित्सा पर्यटन भी एक बड़े सेवा उद्योग के रूप में भारत में विकसित हो रहा है। इसकी वजह यहां की भौगोलिक विविधता, समृद्ध ऐतिहासिक विरासत और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं हैं, जिस कारण यहां आने वाला मरीज इलाज कराने के साथ-साथ आस-पास के इलाकों में घूमकर स्वास्थ्य लाभ भी करता है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय की वर्ष 2012-13 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, उन्नत चिकित्सा सुविधाएं, बेहतर डॉक्टर एवं स्वास्थ्यकर्मी, उत्कृष्ट नर्सिंग सेवाएं अपेक्षाकृत कम प्रतीक्षा समय एवं आयुर्वेद व योग जैसी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां, जो एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के साथ मिलकर समग्र निरोगिता प्राप्त करने में सहायक होती हैं, कुछ ऐसे कारण हैं जो भारत को एक पसंदीदा चिकित्सा पर्यटन गंतव्य बनाते हैं। इस साल देश में चिकित्सा पर्यटन उद्योग का आकार 18,000 करोड़ रुपये से ज्यादा होने की उम्मीद है। हाल ही में पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2018 तक भारत में चिकित्सा पर्यटन से 36 हजार करोड़ रुपये आय होने की उम्मीद है। विदेश से काफी संख्या में वैकल्पिक चिकित्सा की चाह में भी लोग भारत आ रहे हैं। इन लोगों की रुचि खासतौर पर आयुर्वेद के पंचकर्म और योग में होती है। सरकार को पंचकर्म और योग थेरेपी व मेडिटेशन केंद्रों को विकसित करने पर खास ध्यान देना चाहिए। वर्तमान सरकार ने कहा है कि देशभर में आयुष क्लस्टर विकसित किए जाएंगे और इन्हें आपस में जोड़ा जाएगा। वास्तव में ऐसा होने के बाद जहां घरेलू और विदेशी रोगियों को विश्वस्तरीय सुविधा मिलेगी, वहीं राजस्व भी बढ़ेगा। इस दिशा में तेजी से काम करने की जरूरत है।

8आयुष की बढ़ती मांग की कई वजहें हैं। एलोपैथिक दवाएं महंगी होती जा रही हैं। इसके अलावा जीवन शैली में बदलाव के नकारात्मक प्रभाव और रसायन आधारित दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव की वजह से लोग इस पद्धित से विमुख हो रहे हैं। अनुमान है कि वर्ष 2020 तक विकासशील देशों में हर 10 मौतों में से सात की वजह गैर-संचारी रोग होंगे। आयुष में गैर-संचारी रोगों को ठीक करने की क्षमता है। ‘विश्व का वनस्पति उद्यान’ होने की वजह से भारत के पास एक अवसर है। भारत में 16 एग्रो-क्लाइमेटिक जोन, 10 वेजिटेटिव जोन, 15 बायोटिक जोन, 426 बायोमास समेत 15,000 से ज्यादा पौधों की प्रजातियां हैं, जिनमें 7,000 आयुर्वेदिक पौधों की प्रजातियां शामिल हैं। इसके अलावा दुनिया के 12 मेगा बायोडायवर्स देशों में भारत की गिनती होती है। जाहिर है भारत में औषधीय पौधों की भरमार है। भारत आयुर्वेदिक उत्पादों की न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा करने में बल्कि इसके व्यापक तादाद में निर्यात में भी सक्षम है। हालांकि, आयुर्वेदिक औषधियों के वैश्विक आपूर्तिकर्ता के तौर पर खुद को स्थापित करने के लिए हमें पारंपरिक तरीकों को दस्तावेजीकृत करना होगा। साथ ही औषधीय पौधों को रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल से मुक्त रखना होगा और दवाओं के निर्माण में भारी तत्वों का इस्तेमाल नहीं करना होगा। सुरक्षा और स्थायित्व समेत उसके रासायनिक गुणों की व्याख्या को मानकीकृत करते हुए हम पूरी दुनिया में आयुर्वेद को स्थापित करने में सक्षम हो सकते हैं। सभी हर्बल फॉर्मूलेशन को डब्ल्यूएचओ के दिशा-निर्देशों के मुताबिक मानकीकृत करने की जरूरत है।

10 वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में आयुर्वेद के बाद भारत में होम्योपैथी सबसे अधिक प्रचलित है। डब्लूएचओ के अनुसार वर्तमान समय में होम्योपैथी विश्व में उपचार की दूसरी विशालतम पद्धति है एवं इसका इस्तेमाल दुनिया भर में 60 करोड़ से अधिक लोग करते हैं। भारत में 10 करोड़ से अधिक लोग अपने स्वास्थ्य एवं सलामती के लिए होम्योपैथी पर निर्भर हैं। होम्योपैथी का 80 से अधिक देशों में इस्तेमाल किया जाता है और इसका वैश्विक बाजार 26,000 करोड़ रुपये का है (एसोचैम)। हालांकि, इस मामले में फ्रांस अग्रणी देश है, जहां एक-तिहाई जनसंख्या होम्योपैथिक औषधियों का इस्तेमाल करती है। एसोचैम के अनुसार भारत में होम्योपैथी का बाजार 2758 करोड़ रुपये का है और यह वैश्विक स्तर पर 30 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। प्रेक्षकों के अनुसार वर्ष 2017 तक इसके 5873 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने की संभावना है। होम्योपैथी उपभोक्ताओं की वर्तमान संख्या 10 करोड़ से बढ़कर अगले 3 वर्ष में 16 करोड़ होने का अनुमान है। जहां तक योग का सवाल है तो भारतीय दर्शन के छह अंगों में से एक योग अब आश्रम और जंगलों से निकलकर क्लास रूमों और वातानुकूलित कमरों तक पहुंच गया है। योग के महत्व का वैश्विक वर्चस्व और विस्तार कायम होता गया। भारत ही नहीं विदेशों में भी योग अब एक बहुत बड़ा व्यापार बन चुका है। आध्यात्मिक गुरुओं के अलावा प्रबंधन क्षेत्र के लोग भी अब देश-विदेश में योग केंद्र स्थापित करने में लगे हैं। बिना दवा के निरोग रहने के लिए अकेले अमेरिका में 3.2 करोड़ से ज्यादा लोग योग की शरण में जा चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ 21 जून को विश्व योग दिवस घोषित कर चुका है। आज देश के भीतर और बाहर योगप्रशिक्षकों के लिए अपार संभावनाएं हैं।

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