वेद से रोग का नाश


डॉ. अंजनी कुमार झा

मानव जाति के प्राचीनतम अभिलेख वेदों में मन को आत्मन् (आत्म् जो ‘स्व’) का क्रियात्मक तत्व माना गया है। ऋग्वेद और यजुर्वेद में मंत्रों (छंदों) द्वारा एक प्रार्थना की गई है-उचय‘आ नो द्राः.. . शुभ कर्म (विचार) चारों ओर सेहमारे पास आवें। यह बताया गया कि विचार मुखाकृति का निर्धारण करते हैं, विचार मुखाभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं, विचरों को मंत्रों द्वारा परि-नुवजयकृत किया जा सकता है ओैर पवित्र विचार भावनाओं को पवित्र करते हैं। ऋग्वेद में मानसिक क्लेश (निराशावाद) रोकने पर जोर दिया गया है। ऋग्वेद में (अध्याय 1-उचयऋचा 71,76,94,46,48) मन की गति, मानसिक प्रसन्नता की विधियों के लिए जिज्ञासा तथा मेधा (प्रतिभा) वृद्धि के उपायों का वर्णन है। मन की प्रसन्नता मनु-नवजयय मात्र में रोगों की उत्पत्ति को रोकती है, इसलिए उन्हें अपने विचारों को उच्च रखना चाहिए। ऋग्वेद में स्वास्थ्य लाभ के लिए मनःशक्ति के उपयोग का भी वर्णन है। ऋग्वेद (ऋक् 4-उचय42-उचय4) में पहली बार व्यक्तित्व की तीन विषे-नवजयाताओं-उचय सत्व, रज, तम का वर्णन किया गया और ऋग्वेद (ऋक् 1-उचय105-उचय7) में शारीरिक रोगों के साथ मानसिक रोगों की भी अलग से पहचान की गई प्रार्थना की गई कि ये मानसिक रोग इस शरीर को न-नवजयट न करें। यजुर्वेद में मन को ज्ञान की आंतरिक ज्योति कह कर संप्रत्ययन किया गया है। यजुर्वेद के 34 वें अध्याय में पहले 6 मंत्र के विभित्र पहलुओं का बड़ी प्रांजलता के साथ वर्णन करते हुए कहते हैं-उचय‘मन क्या है? ज्ञान की ग्रहणशीलता ही मन है। योग और समाधि (एक मानसिक अवस्था) के रूप में मन का वर्णन किया गया है। हमारी सभी इन्द्रियां मन के नियंत्रण में हैं और वे मन के नियंत्रण में कार्य करती हैं। मन श्रोत्रं मनष्चक्षुः मनो रसनम् मनोघ्राणाम्। मनो वै ब्रह्य मनो ब्रह्य इत्युपास्व।। ‘षिव संकल्पमस्तु’के पहले 6 मंत्रों में मन की महत्वपूर्ण विषे-नुवजयाताओं का वर्णन है। इसमें मन की गति एवं जाग्रत तथा स्वप्न की अवस्था में मन की दशा का वर्णन है। मन चेतना का आधार और ज्ञान का उपकरण (शुक्ल 1998) वर्णित किया गया है। मन के कार्यों का वर्णन किया गया है और प्रार्थना की गई है कि मन सभी के कल्याण के लिए कार्य करे। एक वैदिक सूक्ति बताती है कि आत्मन् के तीन तत्व हैं-उचय मन प्राण वक् ये तीन तत्व हमारे और संपूर्ण ब्रम्ह्यंड में व्याप्त हैं। हमारा मन ज्ञान, प्राण का प्रतिनिधित्व करता है, क्रिया और वाक् का प्रतिनिधित्व करता है और सभी सांसारिक वि-नुवजयायों (पृथ्वी) और सभी साहित्य (शब्द) का प्रतिनिधित्व करता है। एक संस्कृत सूक्ति के अनुसारः ज्ञानजन्या भवेदिच्चछा च्चे-नुवजयटा जन्या कृतिर्भवेते। कृति जन्या भवेच्चे-नुवजयटा च्चे-नुवजयटा जन्यं फलं भवेत्।। जैसा ज्ञान होता है, वैसी ही इच्छा होती है और इच्छा के अनुसार ही कृति होती है। कृति से षरीरादि संबंधी चे-नुवजयटाएं होती हैं और तदनुसार फल होता है। इच्छा मन का दूसरा नाम हैं। यह ज्ञान, ब्रह्यांड में इच्छा ( कामना) के रूप में प्रकट होता है।
यह विश्व अथवा ब्रह्यांड इसी कामना का उपं-उचयउत्पाद है अतः भौतिक विष्व में व्याप्त सकल वाक् तथा प्राण, कामना के उत्पाद हैं जो कि ब्रह्य के प्रकटीकरण की आकृतियों का ही एक उत्पाद है। अर्थर्ववेद में मानस को वशीकरण का ही एक उपकरण मानकर वर्णन किया गया है। अर्थर्ववेद के छठे कांड में इच्छा शक्ति को बनाए रखने तथा भावना, प्रेरणा और चेतना जैसे मनोविज्ञान से संबंधित वि-नुवजयायों की विस्तृत चर्चा है। कई स्थानों पर वि-नुवजयाद, ई-नुवजयर्या, प्रयन्नता, शत्रुता, आक-नुवजर्याण, प्रमाद आदि विभित्र भावनात्मक अवस्थाओं का भी वर्णन किया गया है। परंतु वेदों में उन्माद का विवरण संक्षेप में है और इसे मन की भ्रमपूर्ण अवस्था बताया गया है। वेदों में वर्णित रोग हेतु विवेचन में बुखार, कृमि जो कि अवयवी मनोदषाओं के समानांतर है और राक्षस, गंधर्व, अप्सरा आदि तथा परमात्मा के प्रति किए गए अपराधों से उत्पत्र होते हैं-उचय आज के संदर्भ में क्रियात्मक मनोवैज्ञानिक दषाओं के बराबर सम-हजये जाते हैं। वेदों में वर्णित निदान की विधियों में भे-नवजयाज तथा मंत्रों द्वारा परमात्मा कीसंतुतियां शामिल हैं। क्रोध, अपस्मार तथा अनिद्रा की अवस्थाओं के इलाज तथा यम, नियम, आसन और प्राणायाम द्वारा मानसिक अव्यवस्थाओं को रोकने का वर्णन भी मिलता है। मनोविज्ञान की दृष्टि-नवजयट से उपनि-नवजयाद का षाब्दिक अर्थ है ‘निकट बैठना’जैसे कि विद्यार्थी अध्यापक के निकट बैठ कर ध्यानपूर्वक शिक्षा ग्रहण करते थे। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उपनि-नवजयाद हैं। छांदोग्यपनि-नवजयाद्, श्वेताष्रोपनि-नवजयाद् में न और मी विभित्र स्थितियों का वर्णन है। शरीरकोपनि-नवजयाद् मुख्य रूप से प्रकृति और विभित्र प्रकृतियों की विषे-नवजयाताओं का वर्णन करता है। तीन प्रकार की मानस प्रकृति-उचय सत्व, रज और तम के साथ प्रकृति के सभी लक्षणों का भी वर्णन किया गया है। प्रकृति की विषे-नवजयाताएं व्यक्तियों के वस्तुपरक निरीक्षण योग्य बर्ताव संबंधी संरचनाओं पर आधारित होती हैं और ध्यान देने पर यह रोचक बात सामने आती है कि चारित्रिक विषे-नवजयाताओं का वर्गीकरण उस समय भी इतना ही सुव्यवस्थित था जितना कि आधुनिक व्यक्तित्व-उचयपरीक्षण तालिकाओं में देंखा जाता है जबकि उन्हें अत्यंत परिश्रमपूर्ण सांख्यिकीय अभ्यास द्वारा विकसित किया जाता है। अन्य महत्वपूर्ण उपनि-नवजयादें
जो प्रकृति का वर्णन करती हैं, उनमें शामिल हैं अक्षमालकोपनि-नवजयाद्, भवमन्तरर्णापनि-नवजयाद, गोपीचंदोपनि-नवजयाद् तथा सरस्वती रहस्योपनि-नवजयाद्। इनमें दार्शनिक प्रकृति को एक पृथक व्यक्तित्व बताकर वर्णन किया गया है। यह वह युग था जिसमें मन की चार अवस्थाओं को सम-हजय लिया गया था-उचय उनका वर्णन जाग्रत, सप्न, सु-नवजयाप्ति और समाधि के रूप में किया गया। आज हम चेतना से अचेतन तक चेतना के विभित्र स्तर मानते है। मनोदशाओं का अंतप्र्रेरण, मनोद्वेग, बेचैनी और पा के रूप में वर्णन किया गया और बताया गया कि बेचैनी तथा मनोद्वेग को कैसे नियंत्रण किया जाए। विभित्र मानसिक षक्तियों जैसे कि तीन मानसिक षक्तियां-उचयइच्छा षक्ति, क्रिया षक्ति और ज्ञान षक्ति-उचय इनका वर्णन भी मिलता है। मानासिक शक्तियों में छः अन्य महत्वपूर्ण मानसिक शक्तियों-उचयवेदना शक्ति,स्मरणषक्ति, भावना शक्ति, मनी-नवजया शक्ति, संकल्प शक्ति और धारण शक्ति-उचय का भी वर्णन मिलता है (शिवनंद ,1983)। मनोरोग निदान शास्त्र त्रिगुणों और त्रिदो-नवजयां द्वारा सम-हजय गया।
शोक प्रतिक्रिया के और भी कई आख्यान हैं जैसे कि रावण के साथ युद्ध में लक्ष्मण की मूर्छा आदि के समय राम की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं। वेद भारतीय दर्शन तथा मनोविज्ञान की सभी धाराओं के स्त्रोंत हैं और उपनि-नवजयाद् वेदों के अंतिम भाग हैं। विवेचन और विवेक में कमी आने से, जो लोग षिक्षा से दूर थे, उनके लिए वेदों और उपनि-नवजयादों की शिक्षाओं को सम-हजयन कठिन हो गया। अतः जरूरी था कि इन शिक्षाओं को इस -सजयंग से पुनः वर्णित किया जाए जिससे सभी इन्हें सम-हजय सकें और इनका आकलन कर सकें।’(स्वामी राम, 1978)। भगवद् गीता में उपनि-नवजयादों की सभी दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक प्रज्ञा संक्षिप्त रूप में संग्रहीत है। कहा जाता है कि उपनि-नवजयादें एक गौ की तरह हैं और श्रीकृ-नवजयण भगवद् गीता की शिक्षाओं के माध्यम से वैदिक और औपनि-नवजयादिक साहित्य के समस्त ज्ञान को प्रदान करते हैं, न कि किसी नए दर्शन अथवा नई विचारधारा को प्रतिपादित करते हैं। श्रीकृ-नवजयण ने वैदिक और औपनि-नवजयादिक ज्ञान का सरलीकरण और संषोधन किया। अर्जुन के साथ संवाद के माध्यम से वे मानवता के साथ बात कर रहे हैं। अर्जुन षब्द का अर्थ है‘जो नि-नवजयठापूर्वक प्रयत्न करता है’ और कृ-नवजयण का अर्थ है ‘चेतना का केंद्र। जो नि-नवजयठापूर्वक प्रयत्न करता है वह निष्चय ही ज्ञान प्राप्त करता है और वह ज्ञान सीधा चेतना के केंद्र से प्रवाहित होता है। अर्जुन ने कहाः सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिषु-नवजययति। वेपयुश्च षरीरे में रोमह-नवजर्याष्च जायते।।
(श्रीमद् भगवद् गीता 29/1)
मेरे अंग षिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जारहा है तथा मेरे षरीरे में कम्प एवं रोमांच हो रहा है।
गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्ययते।
न च श्नोरंम्यवस्थांतु भ्रमतीव च में मनः।।
(श्रीमद् भगवद् गीता 30/1)
हाथ से गाण्डीव धनु-नवजया गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है, इसलिए (मैं) खड़ा रहने में भी समर्थ नही हॅं।
निमित्तानि च पष्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोद्यनुपष्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।। (श्रीमद् भगवद् गीता 31/1)
हे केषव! (मैं) लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ (तथा) युद्ध में स्वजन समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता।
(श्रीमद् भगवद् गीता-उचय14/2)
हे कुंतीपुत्र ! सर्दी-उचयगर्मी और सुख दुःख को देने वाले इन्द्रिय और वि-नवजयायों के तोउत्पत्ति-उचयविनाषषील (और) अनित्य हैं, (इसलिए)
हे भारत ! उनको (तू) सहन कर।
यं हि न व्यथयन्त्यैते पुरु-नवजयां पुरु-नवजया-नवजर्याभ। समदुःखसुखं धीरं सोद्यमृतत्वायष् कल्पते।।
(श्रीमद् भगवद् गीता-उचय15/2)
क्योंकि हे पुरु-नवजयाश्रे-नवजयठ! दुःख-उचयसुख को समान सम-हजयने वाले जिस धीर पुरु-नवजया को ये (इन्द्रिय और वि-नवजयायों के संयोग) व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है।
मनोचिकित्सा के 18 अध्याय के इस उत्कृ-नवजयट प्रतिमान
में आत्म ज्ञान के उपाय, कर्मयोग, कर्म और संन्यास का ज्ञान, ध्यान की विधि, नि-नवजयठा योग, तीन गुणों की पूरी जानकारी और संन्यास तथा मोक्ष के ज्ञान का विस्तार से वर्णन किया गया है जिससे अर्जुन के व्यक्तित्व में परिवर्तन हुआ। आधुनिक मनोचिकित्सा में बोधग्म्य पुनर्रचना को मनोचिकित्सा का लक्ष्य निर्धारित किया गया है जिसे बहुत सीमा तक भगवद् गीता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। आत्म तत्व की प्राप्ति मानव जीवन का लक्ष्य है। पूर्व के धर्म, दर्शन और मनोविज्ञान का दृदे इस लक्ष्य की प्राप्ति ही है।
आयुर्वेद का स्त्रोत अर्थर्ववेद है। यह एक प्राचीन शास्त्र है जिसका अर्थ है आयु का विज्ञान। यद्यपि आयुर्वेद के सिद्धांतों का दर्शन वेदान्त में भी किया जा सकता है परंतु चरक संहिता (1,400 ई.पू.) और सुश्रुत संहिता (1,500 ई.पू. ) शास्त्रीय लिखित प्रमाण हैं। ये दोनों प्राचीन ग्रन्थ व्यक्तित्व के मानसिक दो-नवजयों का त्रिगुणों में वर्णन करते हैं-उचय सत्व, रज और तम और त्रिदो-नवजया-उचय षरीर के तीन दो-नवजया वात, पित्त और कफ। मानस रोग के अध्याय में मानसिक विकार केक हेतु 14 कारकों का वर्णन है। प्रज्ञापराधः ई-नवजयया, मान, भय, क्रोध, मोह, मद तथा भ्रम से उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियाएं तथा सामाजिक दृष्टि-नवजयट से अस्वीकृत व्यवहार षामिल हैं। सुश्रुत तथा चरक में वर्णित त्रिदो-नवजया सिद्धांत के अनुसार शरीर में रहने वाले तीन द्रव्यों वात, पित और कफ में किसी एक की वृद्धि अथवा कमी से वातज,पित्तज, कफज मानसिक उपद्रव उत्पत्र हो सकते हैं; उदाहरण के लिए वात वृद्धि से अनिद्रा, पित्तवृद्धि से निद्राभंग एवम् अचेतनता तथा कफ की कमी से अनिद्रा रोग उत्पन्न हो सकते हैं। पित्त की कमी से भय, क्रोध, मूर्छा और भ्रमित विचार उत्पत्र हो सकते हैं। चरक में ऐसा वर्णन भी है कि कुछ व्यवहारों से षरीर के इन द्रव्यों में वृद्धि हो जाती है। निद्रा अनियमितता, अपस्मार, मूर्छा, अत्यधिक मद्यपान से उत्पत्र रोक (द्रव्य दुरुपयोग), उत्तेजना, उन्माद (वातज उन्माद, पित्तज उन्माद, कफोन्माद) तथा आंगतुज उन्माद का विस्तृत विवरण आयुर्वेदिक औ-नवजयाध उपकार तथा उपकार विधि सहित मिलता है। मस्ति-नवजयक ज्वर ( ब्रेन फीवर) का भी विस्तृत विवरण मिलता है। प्राचीन ग्रंथों में मानसिक रोगों के वर्गीकरण की प्रणाली बहुत वैज्ञानिक और स्प-नवजयट थी। औपनि-नवजयादिक शास्त्रों तथा तांत्रिक परंपराओं में देखते को मिलती है। योग के आठ अंग अथवा मार्ग जिन्हें अ-नवजयटांग योग कहा जाता है। यह आवश्यक नहीं कि योग का यह आठ प्रकार का मार्ग यो की किसी एक शाखा से संबंधित हो ।यह सामान्य जानकारी है कि जिस तकनीक को हम सीखते हैं उसी के अनुसार योग की प्रणालियों का प्रयोग किया जाता है। अ-नवजयटांग योग इस प्रकार हैः (1) यम, (2) नियम, ये दोनों मिलकर व्यक्ति को आत्मनियंत्रण में सहायता करते हैं; (3) आसन;(4) प्राणायाम;(5) प्रत्याहर;(6) धारणा; (7) ध्यान; और (8) समाधि। अंतिम चार अभ्यासों का समुच्चय व्यक्तित्व के मनोवैनिक पहलुओं से संबंधित है और अ-नवजयटांग योग के इन आधारभूत सिद्धांतों का योगिक तकनीकों की किसी भी प्रणाली के साथ प्रयोग में लाया जा सकता है।( निरंजनानंद,1993)। न के तीन गुण हैं सत्व, रजस् एवम् तमस्। इन तीन गुणों के अनुसार ही मन की तीन वृत्तियां हैं शांत वृत्ति, सत्व गुण से उत्पत्र होती है; घोरवृत्ति रजो गुण से और मुधा वृत्ति तमो गुण से। षांत वृत्ति मे संतुलन, घोर वृत्ति में क्रोध और मुधावृत्ति में आलस्य, प्रमाद तथा तन्द्रा पाए जाते हैं।(स्वामी शिवानंद,1983)। यद्यपि त्रिगुणों(सत्व, रजोगुण और तमोगुण) की पहचान वैदिक काल में हो चुकी थी, चरक और सुश्रुत संहिताओं में देह प्रकृति के चक्रिक लक्षणश्वातिक, पित्तिक, -रु 39 यलै-नवजयमक,मानस प्रकृति के मनोवैज्ञानिक लक्षणश्सात्विक, राजसिक, तामसिक विस्तार से वर्णित किए गए। आधारभूत रूप में, आयुर्वेद में तीन प्रकृतियों को मान्यता दी गई यथा श् सात्विक,राजस् और तामस। ‘निर्मल मन वह है जो बिना किसी वृति के, प्रज्ञा के श्रे-नवजयठतम पहलू का प्रतिनिधित्व करता है; कामनायुक्त (रजोगुणी)मन वह है जो हिंसायुक्तपहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है तथा अज्ञानी पन वह है जो मिथ्या भूतकाल का प्रतिनिधित्व करने के कारण मलित हो गया है।’ वेदान्त ग्रंथों के अनुसार (पार्थसारथी,1989)प्रकृति के केंद्र में आत्मन् है। तीनों सामग्री उपकरणों को चलायमान करने में यह प्रमुख है। परंतु इनमें से उत्पन्न होने वाली क्रियाओं का निर्धारण वासना (आंतरिक वृतियों)द्वारा होता है। अगर वासना का स्वभाव सात्विक होगा तो विचार, इच्छा और क्रियाएं भी सात्विक होंगी। अगर वासनाएं राजसिक अथवा तामसिक होंगी तो उनका प्रकटीकरण भी उसी प्रकार होगा। अगर वासनाओं का स्वभाव दयापूर्ण और उदार होगा तो बौद्धिक विचार, भावनात्मक अनुभव और -रु39 यारीरिक क्रियाएं भी दयापूर्ण और उदार होंगी। अगर वे क्रूर और दू-नवजयट हैं तो इनका प्रकटीकरण भी इसी प्रकार का होगा। जैसी वासनाएं होती हैं वैसी ही विचार, इच्छाएं और क्रियाएं होती हैं। शरीर,मन और बुद्धि में क्रियाशील आत्मन् द्वारा मिश्रित प्रकृति का निर्माण होता है। जब आत्मन्, ज्ञानेद्रियों में कार्य करता है तो व्यक्ति भोक्ता का संयुक्त अर्थ है-उचयदेखने, सुनने,सूंघने, स्वाद लेने और स्पर्ष करने वाला। भोक्ता संसार के इन्द्रिय वि-नवजयायों का भोग करता है। भोक्ता, भौतिक प्रकृति का एक भाग है। दूसरा भाग है अभिकर्ता। जब आत्मन् कर्मेन्द्रियों में क्रियाशील होता है व्यक्ति अभिकर्ता बन जाता है। अभिकर्ता संसार में क्रियाएं करता है। भोक्ता तथा अभिकर्ता एक भौतिक व्यक्तित्व है। और मन मैं क्रियाषील आत्मन् अनुभवकर्ता का निर्माण करता है। वही आत्मा जब सफल बुद्धि में क्रियाशील होता है तो विचारण, बौद्धिक व्यक्तित्व कहलाता है। मानवीय बुद्धि स्थूल ओैर सूक्ष्म प्रकार होती है। वैष्विक ब्रह्यंड में विवेचन-उचयषक्ति युक्त बुद्धि को स्थूल कहा जाता है। यह संसार संबंधी विचारों पर विचार कर संसार के परिसर के भीतर सभी मिथुन युगलों में विभेद करती है। यह विभेद एक कुत्ते द्वारा अपने मालिक औैर एक अजनबी के बीच से होकर आणविक शिल्य के एक वैज्ञानिक की सूक्ष्मता की सामान्य परिधि के अंतर्गत भी हो सकता है। पंरतु ये सभी स्थूल श्रेणी के अंतर्गत वर्गीकृत किए जाएंगे क्योंकि इन सबका कार्यक्षेत्र भौतिक ही है। परंतु जब विचार षक्ति भौतिक विश्व की परिधि को लांघकर दिव्य सत्ता की संभावनाओं में परिभ्रमण करती है तो इसे ‘सूक्ष्म प्रज्ञा’ कहा जाता है। मानव के अतिरिक्त अन्य कोई भी प्राणी लोकोत्तर सत्य में प्रवेश नहीं कर सकता। सूक्ष्म प्रज्ञा एक विवेचक शक्ति है जो लोकोत्तर सत्य को भौतिक विश्व से अलग देखती और आचरण करती है; आत्मा और द्रव्य तथा आत्मा और विश्व के बीच जिसे भौतिक उपकरणों के माध्यम से अनुभव किया जाता है, अंतर निर्धारित करती है। जब आत्मन् सूक्ष्म प्रज्ञा में कार्यरत होता है तो वह ‘ध्याता’(साधक) बन जाता है। साधक, आत्मन्, ब्रह्यन्, परमात्मा, भावातीत सत्ता, सर्वेच्च चेतना अथवा आप इसे को ईद भी नाम दें, में आनंदोत्सव मानता है। ‘साधक, आत्मन् तथा जागृति, स्वप्न तथा सु-नवजयाप्ति की अवस्था में भेद करता है। साधक (ध्याता) एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व होता है। औ-नवजयाधीय प्रयोग के पौधौं/मिश्रित औ-नवजयाधयों का वर्गीकरण इस प्रकार हैः मेध्या (स्मृति के लिए)। मदकरी (नशों के लिए)। संज्ञास्थापन (वेतनाहरण तथा चेतना स्तर और मानसिक शक्ति में सुधार के लिए)। शक्तिवर्धक (टॉनिक)। शिरोविरेचन(मस्तक पर लेपन के लिए)। उन्माद नाशक (मनोरोग विरोधी)। अपस्मारहर्ता (उप-उचयषमन विरोधी)। मदत्यय (निव्र्यसनीकरण)। अनिद्राहारी। अतिनिद्राहारी। मनोवैज्ञानिक तथा मनःकायिक रोगों में निदान उपकरण के रूप में विपासना योग की प्रभावषीलता अनयर (1989) तथा फ्लेचमैन (1990) ने रिपोर्ट की है। वेदान्ति मॉडल का मानव मनोविज्ञान भारतीय रोगियों को अधिक स्वीकार्य है। यह दृष्टि-नवजयटकोण एक पी-सजय़ी से अगली पी-सजय़ी में अपने आप स्थातांरिक हो जाता है। म्रियमाण रोगी के लिए मनोचिकित्सा के रूप में गीता के आख्यान वास्तव में भारतीय संस्कृति में एक पंरपरा के रूप में है। भगवान श्री कृ-नवजयण का यह उपदेष कि मृत्यु के समय के विचार प्राणी के अगले जन्म का निर्धारण करते हैं-उचयव्यक्ति द्वारा मृत्यु को गरिमामय -सजयंग से स्वीकार करने में सहायता करता है।
विशेष: लेखक के विशेष अनुरोध पर लेख से कोई संपादन संबंधित संशोधन नहीं किये गए, हुए मूल रूप से प्रकाशित है,कहीं-कहीं वर्तनी दोष है तथापि लेखक का मानना है यह क्षेत्रीय बोली के असर के शब्द है

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