जेएनयू वामपंथ का विरोधाभास


डाॅ.(प्रो.) सतीश कुमार

पंडित नेहरू ने विश्वविद्यालय को देश का मंदिर माना। जहाँ से राष्ट्र निर्माण की नींव पड़ती है। कितना दुःखद संयोग है कि भारत का सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय जो पंडित नेहरू के नाम पर रखा गया था वहाँ पर सरस्वती पूजा और अर्चना की जगह वितृष्णा और विरोध का अग्नि कुंड बनता जा रहा है। वह भी वामपंथ की जिद और अडियलपन की वजह से। नेहरू वामपंथ के घोर समर्थक और प्रवर्तक थे। विषय कक्षा में नियमितता को लेकर है। अर्थात् बिना पढ़ाई और वर्ग कक्षा को तिलांजलि देकर परीक्षा में बैठने की इजाजत दी जाए। भारत के हर विश्वविद्यालय में 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य शर्त है परीक्षार्थी को परीक्षा में बैठने के लिए। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का छात्र संघ इस जिद पर अड़ा हुआ है कि हम नियमों में बंधकर नहीं रहना चाहते। पिछले तीन महीनों से विश्वविद्यालय का शिक्षण और प्रशासनिक कार्य ठप्प पड़े हुए हैं। कुलपति और अन्य प्रशासनिक भवनों का घेराव किया जा रहा है। छात्र संघ द्वारा शिक्षकों के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया जा रहा है। कई बार धक्का-मुक्की की खबरें भी आई हैं। घोर चिंता का विषय यह है कि वामपंथी छात्रों की मुहिम का हवा देने का काम शिक्षक संघ भी कर रहा है। यह कैसा दुर्भाग्यपूर्ण संयोग है कि अनियमितता, अराजकता और विद्वेष का दावानल वामपंथी छात्रों और शिक्षकों के सामूहिक प्रयास द्वारा अंजाम दिया जा रहा है। 7 मार्च को वामपंथी छात्र संगठन ने कैम्पस के भीतर जनमत संग्रह करवाने की बात कही है।
यह जनमत संग्रह किस बात को लेकर अर्थात् राज्य के द्वारा प्रदान की जा रही सारी सुविधाओं को हजम कर उन्हीं के द्वारा बनाए गए नियमों का विरोध? यह कैसा विरोधाभास है? भारत के सभी विश्वविद्यालयसरकार द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करें और जेएनयू इसका विरोध करे। यह बात कहाँ तक तार्किक है? दरअसल इस विरोध की राजनीति के कारण कुछ और ही है। वामपंथ की ताकत और वर्चस्व का एकमात्र किला जेएनयू का परिसर बचा हुआ है। त्रिपुरा में वामपंथ की करारी हार के बाद केरल और जेएनयू का परिसर ही बचा हुआ है। दोनों जगहों पर वामपंथ की चूले हिलने लगी है। जेएनयू परिसर में कुलपति प्रो। जगदीश कुमार की योग्यता और कर्मठता ने वर्षों से चली आ रही वैचारिक तानाशाही को तोड़ दिया है। परिसर के हर व्यक्ति और विचारों को पनपने का मौका दिया है, जहाँ पर मूल्यपरक शिक्षा ही मुख्य आधार है।
चूंकि वर्षों से, दशकों से वामपंथ की तानाशाही नामांकन से लेकर नौकरी पाने तक में अपनी मनमानी करते आ रहे थे। उस पर अब अंकुश लग गया है। इसलिए विरोध की राजननीति शुरू हो गई। राष्ट्र द्वारा प्रदत्त सारी सुविधाओं को हजम करने वाले लोग उसी राष्ट्र को टुकड़ों में बांटने की सौगंध खाते हैं। सरकार द्वारा बांटे जा रही फैलोशिप के अनुदान से राष्ट्र विरोधी परचम लहराए हो रहे हैं। भारत सरकार द्वारा जुटाए गए अधिकतम संसाधनों का आबंटन सबसे ज्यादा जेएनयू के शिक्षकों और छात्रों के बीच होता है। यह सच है कि भारत के बेहतरीन और कुशाग्र बच्चों वहाँ नामांकन लेते है। प्रो। जगदीश कुमार के शब्दों में 98 प्रतिशत बच्चों का नामांकन इस विश्वविद्यालय में नहीं हो पाता केवल 2 प्रतिशत ही अपना स्थान बना पाते है। अगर उन दो प्रतिशत बच्चों को वर्ग शिक्षा के द्वारा शिक्षित नहीं किया जाता है तो अन्याय न केवल इन दो प्रतिशत के साथ होगा बल्कि उन 98 प्रतिशत बच्चों के साथ भी होगा जो यहाँ पढ़ने को लालायित थे।
आखिरकार ऐसा क्यों है? विरोध नहीं पढ़ने के लिए कहाँ तक जाएगा? शोध शिक्षण अनिवार्य शिक्षण में आता है। जेएनयू की एक स्वीकृत परिपाटी बन बई है कि पूरी दिन बहुराष्ट्रीय कंपनियो या मीडिया में नौकरी करो साथ ही साथ सरकार द्वारा प्रदत्त फैलोशिप का लाभ उठाओ और हर साधन सम्पन्न सुविधाओं से लैसे कैम्पस का आवासीय लुफत उठाओं। जब देश के अन्य विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी नियमों का अनुपालन सहज तरीके से कर रहे हैं, वहीं जेएनयू के छात्र इसका विरोध क्यों कर रहे हैं? उस विरोध को शिक्षक समूह हवा क्यों दे रहे हैं?
जेनयू में अक्सर विवाद नक्सलवाद, अलगाववाद और पृथकतावाद की होती है, जिसमे कश्मीर और नार्थ ईस्ट को भारत से अलग करने की पुष्टि की जाती है। आजादी और निष्कंट वयक्तिवाद के नाम पर ऐसा हुजूम बनने की कवायद की जाती है जो राष्ट्रभक्ति से दूर हो। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को जहर की पुड़िया माना जाता है। हॉस्टलों में खाने को लेकर लोगो के मत बदले जाते है। तुम अगर मांसाहारी हो तो सब कुछ खा सकते हो। पूर्णिमा और महाशिवरात्रि के दिन भी मांस खा सकते हो। इन छोटी छोटी बातो से धीरे धीरे सैकड़ो विद्यार्थी जो धर्म से जुड़े थे, अन्य वामपंथियों के बहाव में आकर हिन्दू धर्म से विछुब्ध होने लगते है। सच्चे अर्थो में वामपंथी न केवल राष्ट्रवाद को कमजोर करते है बल्कि भारतीय परम्परा को भी तहस नहश करते है।

कांग्रेस का बनाया हुआ उदारवादी ढाचा टूटने लगा है। राष्ट्रवाद से खौफ कांग्रेस और वामपंथ को है। कैंपस को अपने घेरे में लेकर वामपंथियों ने इतिहास और अर्थशास्त्र को बदला। राजनीति खुद ही बदल गयी। देशभक्ति विखंडित होने लगा स्कूल के बच्चे जन गणमन भूलते गए। वामपंथ ने पश्चिमी सिद्धांत को एकमात्र तत्वमन। संघ ने केवल देश को स्थापित और उसके मूल्यों को पुनर्जीवित करने की बात की है सरकार ने इस मुहीम की शुरआत जेनयू से किया। जहाँ से देश को १०० टुकड़ो में बाटने की बात हो रही थी वही पुस्ताकलय के गलियारों में शहीदों की तस्वीरें लगायी गयी।

कुलपति प्रो जगदीश कुमार ने ऐसा सा किया जाना विश्यविद्यालय के लिए सौभाग्य माना। लेकिन वामपंथियों की नींदे हराम हो गयी। ६ दशकों का अबेध किला टूट गया। पेपरवाजी शुरू हो गयी। ये कैसी भक्ति? उनकी नजर में तस्वीरें केवल माओत्सेतुंग और मार्क्स की होगी। राष्ट्र के हित में राष्ट्र की समझ जरुरी है। इस बात को टैगोर से लेकर गुरूजी(एम.गोलवलकर) बोलते रहे। चिंतक और संघ के सहकार्यवाहक दत्तात्रेय जी भी इस बात की वकालत करते है। बात संघ की विचार धरा की नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण की है। वर्षो की तपश्या के बाद देश आज़ाद हुआ, चलना भी नहीं सिहे थे की नेहरु वियन सोच ने उदारवाद के नाम पर एक ऐसा वट वृक्छ खड़ा करने की कोशिस की जहा से अपनी सांस्कृतिक विरासत से लोगो को घिर्णा होने लगी इतना बड़ा आघात तो अंग्रेज या आततायी मुग़ल भी नहीं कर पाए थे जितना ६ दशकों में कांग्रेस और वामपंथ ने मिलकर समाज को विघटित किया।
पिछले एक महीने में वामपंथियों ने गौरक्षकों और लिचिंग (हत्या) पर बवाल खड़ा कर दिया है। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री मोदी की तुलना हिटलर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना नाजियों से करनी शुरू कर दी है। पिछले 3 वर्षों में महत्त्वपूर्ण सप्ताहिक, पाक्षिक और दैनिक समाचार पत्रों को खंगाले तो आधे से ज्यादा अंक और संपादकीय हिंदूराष्ट्र और हिंदुओं के लिखे जा र हे है। पुनः यह भी कहा जाता है कि भारत में विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छिनी जा रही है। दरसल वामपंथ का राष्ट्रवाद और मानवीय मूल्य की परिभाषा भारत की जनता पहचान चुकी है; इसका प्रभाव भी भारतीय राजनीति में दिख रहा है। हाशिए तक सिमटी साम्यवादी दल अंतिम सांसे ले रही है। लेकिन इनका एक महत्त्वपूर्ण ढ़ांचा आज भी जिंदा है, वह है विश्वविद्यालय के भीतर उनकी घुसपैठ। उनकी घुसपैठ वहां वहां कैसे बनी इसकी चर्चा बाद में होगी। पहले मानसिकता और सोच की विवेचना जरूरी है। यह भी बताना जरूरी है कि इन कामठजनेवि (जेएनयू) है। पिछले कुछ वर्षों में शाखाएं भारत के अन्य विश्वविद्यालयों, हैदराबाद, जामिया, अलीगढ और अन्य कई जगहों पर है।
वामपंथियों की कार्यशैली की महत्त्वपूर्ण विशेषता है मशाल जुलूस के साथ रंग-बिरंगे अल्फाजों के साथ गगनभेदी नारेलगाना। इन्होंने संसद के आतंकी हमले के सरगना को फांसी दिए जाने के विरोध में नारे लगाए। ‘हरघर-घर में अफजल होगा। ‘‘भारत के सौ टुकड़े होंगे। ‘‘कश्मीर को आजाद करना होग” जैसे तमाम देश विरोधी नारे लगाए जाते है। यही टोली जो मानवाधिकारों की बात करती है, चीन के नोबेल विजेता श्युबा पर मौन हो जातीहै। बुनियादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग करने वाले कवि और तियनमेन हत्याकांड के विरोध करने वाले कवि को जेल में डाल दिया जाता है। सजा 11 वर्षों की होती है। सजा की रिहाई से पहले कवि जिंदगी से रिहा हो जाता है। अत्यंत बाचाल सीताराम येचुरी चुप क्यों हो जाते हैं? क्यों अन्य वामपंथियों की मशाल आग नहीं उगलती, उनकी फौज स्तब्ध हो जाती है। वामपंथियों ने भारतीय संस्कृति की जितनी आलोचना और तिरस्कार किया है, शायद इतनी आलोचना अंग्रेजों या और किसी ने भी नहीं की होगी। पिछले वर्ष उन्होंने महिषासुर पर्व मनाने की शुरूआत की। तथा कथित दलितचिंतक कंचन इल्लेहा ने भारतीय मातृत्व शक्ति की अधिष्ठाता ‘माँ दुर्गा‘ के संदर्भ में अभद्र शब्दों का प्रयोग किया। यह वहीं लोग है जो दंतेवाड़ा 2010 में 76 सीआपीएफ के सिपाहियों के मारे जाने का जश्न मनाया था। प्रो. डी.एन. झा, निवेदिता मेनन और तमाम भ्रमित वामपंथियों ने ‘फूड फॉर पौलिटिक्स‘ पर परिचर्चा करते हुए कश्मीर को एक अलग राष्ट्र की हिमाकत की थी। तकरीबन यह वही तबका है जो जेएनयू में ‘हवाला‘ को छिपाए हुए बैठा था।

1996 में वरिष्ठ शिक्षक ने अलगाववादी और आतंकियों का जमघट बनता जेएनयू के परिसर पर चिंता व्यक्त करते हुए पत्र लिखा था। पत्र प्रमाणों के साथ था। किस तरह से विभिन्न छात्रावासों में भारत विरोधी गतिविधियां चलाई जार ही हैं। कश्मीर से लेकर उत्तर पूर्वी राज्यों में अलगाववाद का बौद्धिक विश्लेषण विश्वविद्यालयों के प्रांगण में होता है। जिसकी भरण-पोषी सरकार के द्वारा की जाती है। पिछले 5 दशकों में अगर विभिन्न विश्वविद्यालयों को दिए गए अनुदान की चर्चा की जाए। विश्वविद्यालय का स्थनननं। एक पर आता है। संख्या और आकार में अत्यंत छोटा होने के बावजूद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का सब से प्रिय संगठन जेएनयू रहा। इतना ही नहीं, भारत और विश्व के अन्य देशों के बीच संधि और समझौते का सीधा लाभ वहां के शिक्षकों को मिलता है। वामपंथियों ने राष्ट्र के पैसों को अपने सुख में इस्तेमाल कर कश्मीर को आजाद और भारत को बर्बाद करने की कोशिश करते हैं। पाठ्यक्रम में इन महत्त्वपूर्ण समस्याओं की पढ़ाई इस तरह से की जाती है कि भारत एक ऐसा देश है जहाँ पर अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार होता है। बुद्धिजीवियों के इन प्रयासों को देखते हुए ही प्रसिद्धचिंतक और दार्शनिक ‘रूसो‘ ने कहा था कि समाज को विघटित करने का काम और कोई नहीं बल्कि बुद्धिजीवियों ने ही किया।
जेएनयू के बदलाव को समझने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिंतक सुनील अम्बेकर का मानना है कि विश्वविद्यालय परिसर में भूल को सुधार ने का समय आ गया है।शिक्षा सेन केवल व्यक्ति बल्कि राष्ट्र समृद्ध होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो शिक्षा में परिवर्तन की जरूरत है। हर धुर्त और कालाबाजारियों की समय सीमा होती है। वामपंथियों की विदाई राष्ट्रीय राजनीति से हो चुकी है।
चूंकि प्रश्न लब्ध प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का है इसलिए मुद्दा भी राष्ट्रीय है। देश-दुनिया के कोने-कोने से सपने संजोकर युवा यहाँ पर आते हैं। अगर उनके भीतर अतार्किक विरोध को पनपने का मौका दिया जाता है तो पूरे देश के लिए अत्यंत ही त्रासदी का माहौल तैयार होगा। जहाँ देश की नजरें टिकी हो, जहाँ पर पढ़न की लालसा हर युवा की बनी रहती हो, उसकों करारा झटका लगेगा। जरूरत है उस प्रतिष्ठा की मूर्ति करे बचाने की। जरूरत है वामपंथ की घिनौनी राजनीति से युवाओं को दूर रखने की।

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