वन्दे मातरम, भारत माता की जय कहने से परहेज क्यों?


डॉ.शोभा भारद्वाज

आजादी की लड़ाई में बन्देमातरम का जयघोष करते आजादी के मतवालों का जलूस निकलता था अंग्रेजी साम्राज्य की लाठियाँ लहूँ लुहान कर जमीन पर बिछा देती । यह वह जयघोष था जिसको लगाते-लगाते क्रान्ति कारी फांसी के तख्ते पर हंसते-हंसते झूल गये । करो या मरो के नारे के साथ वन्दे मातरम का जय घोष करते विशाल जन समूह से जेल भर जाते । अंग्रेजी राज में सभी को ऐसा लगता था जैसे जंजीरों में जकड़ी भारत की धरती माँ है । उसकी मुक्ति के लिए त्याग और बलिदान का सिलसिला शुरू हुआ । काफी समय बाद मुस्लिम समाज के एक वर्ग में नारे और वन्देमातरम गीत का विरोध होने लगा इसमें साम्प्रदायिकता और मूर्ति पूजा देखी जाने लगी देश आजाद हो गया धर्म के नाम पर पाकिस्तान बना लेकिन भारतीय मुस्लिम समाज को वन्देमातरम से परहेज ही रहा। बन्देमातरम राष्ट्रीय गीत है लेकिन जिसकी इच्छा हो गाये या न गाये लेकिन गीत के सम्मान में खड़े हो जायें अब वह वन्देमातरम की धुन से पहले स्थल छोड़ देते हैं हंसी आती है ।इन विरोधों का जबाब संगीतकार रहमान नें नई दिल्ली में विजय चौक पर भारत की आजादी की स्वर्ण जयंती की पूर्व संध्या में दर्शकों की भारी भीड़ के सामने गीत गा कर दिया ऐसा लगा उनकी आत्मा और दिल की आवाज कंठ से निकलती हुयी जन-जन की आत्मा में उतर रही थी “माँ तुझे सलाम ,वन्देमातरम” शायद ही कोई भारतवासी होगा जो रोमांचित नहीं हो रहा होगा ।
भारत सोने की चिड़िया माना जाता था खेतों में लहलहाती फसलें जल से भरी नदियाँ प्रकृति के हर मौसम यहाँ मिलते थे अत : हमलावर यहाँ की समृद्धि से आकर्षित हो कर हमले करते रहते थे कुछ लूटपाट कर वापिस लौट जाते थे अधिकतर यहीं के हो कर रह गये । दूर दराज से कारवां भूख प्यास से त्रस्त नदियों के किनारे ठहर कर शीतल जल पीकर प्यास बुझाते होंगे, थके तन बेहाल हो कर गुनगुनी रेत पर पेट के बल लेटते ही माँ जननी की गुनगुनी गोद याद आती होगी अपने वतन की दिशा को देखते हुए गले से भर्रायी आवाज निकली होगी माँ तुम्हें सलाम यही है वन्दे मातरम ।
अधिकतर समाज यहीं का है जिन्होंने इस्लाम स्वीकार किया था उनके पूर्वज संस्कृति यहीं की है लेकिन उन्होंने बुत शिकनी मानसिकता को ग्रहण किया वह भारत माता में बुत देखते हैं यह तो एक भावनात्मक आस्था हैं जिसका शीश हिमालय कन्या कुमारी तक के विशाल भूभाग के चरण पखारता हिन्द महासागर ,दोनों तरफ अरब की खाड़ी और बंगाल की खाड़ी है । कुछ विचारक अपने देश को धरती का टुकडा मानते हैं और दूसरी विचारधारा वाले दुनिया पर राज करना चाहते हैं अपनी विचार धारा को प्रेम से या ताकत के बल पर फैलाना चाहते हैं लेकिन धरती अपनी गति से धुरी पर घूमती रहती है नश्वर पुतले नहीं सोचते धरती जब हिलती है उसके गर्भ में हजारो राजवंश और सभ्यतायें समा जाती हैं ,जब ज्वाला मुखी फटते हैं अंदर से धधक कर बहता गर्म लावा निकलते समय विध्वंसकारी होता है लेकिन ठंडा होने पर धरती का एक हिस्सा बन जाता । भारत माता का असली स्वरूप और शक्ति 130 करोड़ वन्दना में उठते हाथ हैं उनमें ओबेसी या ‘उस जैसी मानसिकता वालों’ का हाथ नही उठा क्या फर्क पड़ता है ? ओबेसी ने संविधान का तर्क दिया संविधान में वन्देमातरम कहने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता ,लेकिन इस्लाम में कहीं नहीं लिखा धरती को माँ कहना कुफ्र है दुनिया के देश अपनी धरती को मदर लैंड , जर्मनी में फादर लैंड, फ़ारसी में भी मादरे वतन कहते हैं इस्लामिक विद्वान मादरे वतन ज़िंदा बाद मानते हैं । माँ और धरती माँ दोनों से प्यार किया जाता है धरती के ऊपर भरण पोषण का इंतजाम है नीचे विलासता का सामान खोदते जाओ देखो धरती के गर्भ में क्या नहीं है ?बहुत कुछ है
विश्व के कई देश आर्थिक मंदी से ग्रस्त हैं बेरोजगारों की संख्या बढती जा रही है धीरे- धीरे वही राजनेता जनप्रिय हो रहे हैं जो रोजगार बढ़ाने के लिए प्रवासियों और अवैध रूप से काम कर रहे विदेशियों को देश से निकालने का नारा लगाते हैं। प्रवासियों को मिले रोजगार उनकी समृद्धि आँखों में खटकने लगी हैं यही कारण हैं अमेरिका और योरोपियन देशों में भारतीयों पर हमले होने लगे हैं तेल उत्पादक देशों में बड़ी संख्या में लोग काम करते हैं लेकिन तेल की कीमते घटने से कई कंपनियां बंद हो गयीं भारतीयों के रोजगार संकट में हैं कई देशों में क्रान्ति से राजनीतिक संकट की स्थिति है का संकट है ।अपने वतन से दूर बसे भारतीयों के दिलों से पूछो वह दूसरे देश में प्रवासी कहलाते हैं दूसरे दर्जे के नागरिक हैं कभी भी नफरत के शिकार हो कर निकाले जा सकते हैं कई देशों से भारतवंशी खाली हाथ निकाले भी गये हैं लौटने पर अपना वतन स्वागत करता है परदेस में उनकी सुरक्षा की चिंता स्वदेश का दायित्व हैं ।
अनेक देश बर्बाद हो गये सीरिया ,ईराक अफगानिस्तान के बाशिंदें जीने के लिए आज दर बदर हैं ,कई देश बर्बादी के कगार पर हैं। सोने जैसा‘सीरिया ईराक’ कितनों ने अपनों को खोया कोई गिन सकता है लाखों लोग अपनी धरती छोड़ कर शरणार्थी बनने के लिए विवश हो गये उनके सिर पर खुला आसमान है और दूसरो के देश की धरती अपनी मादरे वतन की याद में कितना रोते हैं धरती का सिजदा करने के लिए तड़पते हैं। आतंकवादी विचारधारा विध्वंस कारी है निंदनीय है उसका कोई मजहब नहीं है । बगदादी की ‘खुरासान’ विचार धारा ? खुरासान ईरान का एक शहर है वहाँ के बाशिंदे अपने सरनेम में खुरासान जादे लिखते हैं यहाँ के बाशिंदे दूसरी और तीसरी सदी में कई स्थानों से पलायन कर यहाँ बसे थे लेकिन इस्लामिक स्टेट का सपना देखने वाले खुरासान का फ़ारसी में अर्थ ‘यहाँ से सूरज निकलता है’ लेकिन अब खुरासान मोड्यूल कट्टर इस्लामिक संगठन है जिसका 2012 में नामकरण किया गया। संगठन आईएस के साथ मिल कर काम करता है इसका संचालन सीरिया से होता था वहीं अधिक सक्रिय था वहाँ से भी बिस्तर गोल हो रहा है उनकी नजर कश्मीर की वादियों पर है हाथ में पत्थर लेकर उनकी ही सुरक्षा में तैनात सैनिकों को पत्थर मारते किशोर किशोरियां में उन्हें आत्मघाती और जेहादी नजर आते हैं जिनके दम पर दुनिया को इस्लाम करने का स्वप्न दिखाई देता है बरगला कर दूसरे देशों के नौजवानों की भर्ती जारी है ।बगदादी के नक्शे में खुरासान का क्षेत्र ईरान (जबकि ईरान शिया बाहुल्य क्षेत्र है) ,अफगानिस्तान ,उज्बेगिस्तान और तुर्कमिस्तान प्रमुख थे पहले पाकिस्तानी और तालिबानी इसके सदस्य बने थे । अब पूरे भारत, श्री लंका और चीन के कुछ भूभाग पर कब्जा कर वह अपना इस्लामिक स्टेट बनाने का दिवास्वप्न देख रहा है जिसका वह खलीफा होगा उसकी सल्तनत में काला झंडा फहराया जाएगा, ‘झंडा फैलेगा या नहीं’? अब तो बगदादी को स्वयं पता नहीं है वह कितने दिन जियेगा । बरगलाए गये जेहाद के नाम पर उकसाए गये जब अपना वतन छोड़ कर इस्लाम के नाम पर जेहादी बनने जाते हैं जल्दी समझ जाते हैं भूल हो गयी उनका दिल अपने वतन की मिटटी के लिए कितना रोता है लेकिन अपना वतन दूर होता है मौत सामने जिस जन्नत की कल्पना की थी उसका कहीं अता पता नहीं है ।
वन्दे मातरम ऐसा नारा है जिस पर सैनिक शहादत देता है शहीदों की अर्थी के पीछे भी भारत माँ पर शहादत देने वालों के लिए वन्दे मातरम भारत माँ की जय का नारा लगाती भीड़ बलिदान का सम्मान करती है । वन्दे मातरम का विवाद राजनैतिक है उसे धार्मिक रंग देने की कोशिश की जा रही हैं ।यह विषय राजनैतिक गलियों से गुजर कर धार्मिक गलियों में जा चुका है कुछ प्रभावशाली मदरसों ने फतवे जारी किये जिनमें कहा इस्लामिक मान्यताएं मुस्लिम समाज को वंदेमातरम् कहने की इजाजत नहीं देती फतवे की व्याख्या करते हुए कहते हैं तर्क के आधार पर इन्सान ही दूसरे इन्सान को जन्म दे सकता है जमीन को माता कहना उनके शब्दों में तर्क के आधार पर सही नहीं है अपनी पोषक धरती को माँ माने या न माने यह हर व्यक्ति की निजी धार्मिक मान्यता है सोच पर हैरानी होती है ।

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