वंदे मातरम्


नत्थी सिंह बघेल

व्यक्ति जिस देश में जन्म लेता है वह उस देश में बड़ा होता है, वहाँ का अन्न-जल खाता-पीता है, खेलता-कुदता है, पढ़ता-लिखता है, सामान्यतया उस देश का नागरिक होता है। उसके नाम के साथ प्रायः उस देश का नाम भी लिया जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति नेपाल का नागरिक है, तो उसे नेपाली ही कहते हैं। इसी प्रकार अन्य देशों के नागरिक भी उसी देश से संबोधित किये जाते हैं। यथा अफ्रीका वालों को अफ्रीकी, चीन वालों को चीनी, जर्मन वालों को जर्मनी, पाकिस्तान वालों को पाकिस्तानी इत्यादि। जिस का मतलब है कि वे लोग उक्त देशों से संबंधित हैं। वे लोग जहाँ के नागरिक होते हैं। प्रायः अपने देश के प्रति समर्पण का भाव रखते हैं। अपने देश की आन, बान और शान के लिए, उन में सदैव न्यौछावर होने का भाव मिलता है। अधिकतर उन लोगों में अपने देश के प्रति धर्म, साम्प्रदाय, क्षेत्रवाद सहित किसी भी वाद का भाव नहीं पाया जाता है। उन लोगों में अपने देश को समर्पण का भाव सर्वप्रथम और सर्वोच्च स्थान पर विराजमान है। किंतु हिंदुस्तान में इसके विपरीत भाव का बोलबाला है।
विश्व के प्रत्येक देश में पाकिस्तान सहित समान नागरिक संहिता पाई जाती है। परंतु हिंदुस्तान है जहाँ पर इस प्रकार की संहिता का संवैधानिक प्रवधान का अभाव है। हिंदुस्तान में धर्म निरपेक्षता के आधार पर नागरिक संहिता अपनाई जाती है। कश्मीर के विषय में कोई समान नागरिक संहिता लागू नहीं होती। इसके अतिरिक्त संविधान के अनुसार महिला तथा बाल संरक्षण की गारंटी का प्रावधान तो है फिर क्या कारण है कि एक धर्म विशेष में महिलाओं के लिए उसके अपने नियम-कानून अपनाए जाते हैं। उन्हीं नियम-कानूनों के अनुसार महिलाओं के साथ व्यवहार किया जाता है। देश की समान नागरिक संहिता को वे अपने धर्म के विरूद्ध मानते हैं। आखिर ऐसा क्यों?
भारत आज पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से ग्रस्त है। जिस का मुख्य कारण जनसंख्या की अप्रत्याशित बढोतरी है। देश में सरकार द्वारा बढती जनसंख्या पर नियंत्रण लगाने के लिए नसबंदी जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, परंतु आश्चर्य है कि एक धर्म विशेष के ठेकेदार नसबंदी को अपने धर्म के विरूद्ध मानते हैं और निरंतर देश की आबादी बढ़ाने में लगे हुए हैं। कई जगह पर तो सुनने को मिलता है कि फलां खान साहब या अली साहब के 24-25 बच्चे हैं। यह भारत भू पर अनावश्यक रुप से भार और अन्याय नहीं तो और क्या है? बहुसंख्यकों पर हिंदू कोड बिल लागू होता है जिस के अंतर्गत केवल एक पत्नी रखने का प्रवधान है, परंतु दूसरी ओर कोई कोड बिल लागू नहीं होता और एक अल्पसंख्यक होने के नाते वह कई कई बीवियां रख सकता है। आखिर इस देश में ऐसा क्यों? जब भारत में रहने वाले सभी धर्मों के अनुयायी भारत माँ का अन्न-जल, सर्दी-गर्मी, हवा-पानी आदि का समान रुप से उपयोग करते हैं तो उस मातृभूमि, भारत माँ को जो बिना भेदभाव किए सब को समान रुप से जीवन संबंधि आवश्यकताओं को पूरी करती है, वह वास्तव में माँ नहीं तो और कौन है फिर उसे माँ कहने से गुरेज़ क्यों? क्या किसी धर्म में माँ को नमस्कार करना वर्जित है? और यदि ऐसा है तो वह धर्म कदापि धर्म कहलाने योग्य नहीं हो सकता। पवित्र कुरान के अध्ययन करने पर कहीं ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता जहाँ पर माँ-बाप को बंदगी या सलाम न की जाए। फिर इस्लाम के वे स्वयम्भू ठेकेदार भारत माँ को, जिसका वे अन्न-जल खाते-पीते हैं, को नमस्कार करना अपने धर्म के खिलाफ करार क्यों देते हैं? पवित्र कुरान में तो माँ की ऐड़ियों के नीचे जन्नत मिलता बताया गया है।
भारत में कुछ तथाकथित अल्पसंख्यक नेता सीना फाड़-फाड़ कर चिल्लातें हैं कि वे ‘वंदेमातरम्’’ नहीं बोलेंगे, चाहे उन की जान क्यों न चली जाए। एक अल्पसंख्यक सांसद ने तो 12 मार्च, 2018 को अपनी एक जनसभा में नाथूराम गोडसे को ‘नंबर-1, हिंदू रत्न ‘आतंकवादी‘ बताया और श्री नरेंद्र मोदी, जो देश के प्रधान मंत्री हैं, को अपना दुश्मन कहा। मेरा उन महोदय से विनम्र निवेदन है कि क्या आज से 70 साल पहले की परिस्थितियों का उन्होंने अध्ययन किया है? ऐसी कौन सी परिथितिय थीं, जिन के कारण नाथू राम गोडसे को हिंसा का सहारा लेना पड़ा, क्योंकि वह तो स्वयं अहिंसावादी था। अपने भड़काउ भाषण से वे सांसद महोदय जो एक जनप्रतिनिधि हैं, देश और देश की जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं? रहा सवाल श्री नरेंद्र मोदी जी का, तो राजनीति में न कोई सदैव दुश्मन होता है और न ही मित्र। इसके अतिरिक्त किसी भी देश का प्रधान मंत्री उस देश का सबसे बड़ा सम्मानित व्यक्ति होता है, वह चाहे किसी भी धर्म अथवा सम्प्रदाय से संबंध रखता हो। उस की शान में अनर्गल बेतुकी बयानबाजी करनी कोई नीतिगत सोच नहीं है, अपितु निंदनीय और अशोभनीय अवश्य है। इसके अतिरिक्त इन्हीं महोदय ने पुणे की अपनी एक जनसभा में कहा-‘हमने कभी मुल्क का सौदा नहीं किया न ही करेंगे।

70 सालों में हमें डराया-धमकाया जा रहा है, लेकिन हम डरने वाले नहीं हैं।‘ इसके साथ-साथ उन्होंने अपने चतावनी भरे लहजं में कहा-‘हमें जान से मारना है तो मार दीजिए, लेकिन हम जिन्दा हैं तो यहीं रहेंगे।‘
इस विषय में यह कहना उचित होगा कि भारत में जब देश आजाद हुआ था तब देश के समस्त राज-रजवाडे़ और रियासतों के शासकों ने सहर्ष भारत के गणराज्य में शामिल होने की घोषणा कर शामिल हो गए। परंतु केवल हैदराबाद के तत्कालीन निजंाम शासक ने भारत गणराज्य में शामिल होना स्वीकार नहीं किया और अलग ही स्वतंत्र रहने को चुना। क्योंकि अंग्रेजों ने जब भारत को स्वतंत्र किया था तो राजे-रजवाड़े तथा रियासतों को भारत गणराज्य में शामिल होेने अथवा स्वतंत्र रहने को उनकी मर्जी पर छोड़ दिया था। और यदि कांई राज-रजवाड़ा या ाियासत पाकिस्तान की सीमा से सटा हो तो वह अपनी इच्छा से पाकिस्तान में भी मिल सकता था। यद्यपि हैदराबाद रियासत किसी ओर से भी पाकिस्तान की सीमा से नहीं सटी थी परंतु फिर भी तत्कालीन हैदराबाद निजंाम ने अपनी रियासत पाकिस्तान को देना चाहता था। धन्य है तत्कालीन भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लब भाई पटेल जी को, जिन की सूझ-बूझ से निजंाम हैदराबाद ने बड़ी मुश्किल से भारत गणराज्य में मिलना स्वीकार किया।
उक्त सांसद महोदय की हास्यप्रद पंक्तियां पढ़ कर हंसी भी आती है और आश्चर्य भी होता है कि भारत जैसे देश में उन्हें कौन ड़राता-धमकाता है? इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज भारत में अल्पसंख्यक के नाम पर सारी सरकारी सुविधाएं केवल भारत का मुसलमान ही भोग रहा है। अन्य अल्पसंख्यक जिन में सिख, ईसाई, यहूदी, जैन पारसी आदि का तो कहीं नाम ही नहीं आता। इससे तो यह कहावत साकार होती है कि खाएं भी और गुर्राएं भी।
आज हर मुसलमान यह अच्छी तरह जानता है कि भारत में वोट बैंक की राजनीति का बोलबाला है अतः जिस धर्म-सम्प्रदाय की जितनी अधिक वोट होंगी उसी की पार्टी राज करेगी। जब देश का 1947 में बटवारा हुआ था तब मुसलमान नेताओं ने उनकी 17 प्रतिसत जनसंख्या के आधार पर मांग कर देश के दो टुकड़े करवा कर पाकिस्तान ले लिया था। आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 22 प्रतिसत लांघ चुकी है, अतः भविष्य में वह दिन दूर नहीं जब देश के फिर से टुकड़े हों अथवा एक अन्य पाकिस्तान की मांग उठेगी। 1947 में महात्मा गांधी जी की उदारता का परिणाम यह हुआ कि मेवात के मुसलमानों को जो पाकिस्तान जा रहे थे, उन्हें वापस बुला लिया गया जो आज बहुत बड़ा मुस्लिम खेत्र बन गया है, जहाॅ से गांव देहात तो लगभग हिंदू विहीन हो चुका है, अब शहरों-कस्बों से भी हिंदू पलायन कर रहे हैं।
आज भारत में समान नागरिका संहिता लागू करने की, जनसंख्या के आधार पर अल्पसंख्यक समुदायों का पुनः अवलोकन करने की ओर ध्यान देने की आवश्यकता हैो भारत माता की जय नहीं बोलनेे वालों के विषय में भी विचार करना जरूरी है।

No Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *