2019 चुनाव में मोदी का एजेंडा: राजनीतिक शुचिता


डाॅ. रवीन्द्र अग्रवाल

आज यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि देश किस प्रकार धनबल और बाहुबल की राजनीति से त्रस्त है। राजनेता से लेकर चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय चुनावों को गुंडों और बाहुबलियों से मुक्त कर स्वच्छ राजनीति करने की जरूरत बता चुके हैं। चुनाव सुधारों का मामला केंद्र के समक्ष वर्षों से लम्बित है। लेकिन डाकुओं और बाहुबलियों को विधानसभा और लोकसभा का टिकट देने वाले कैसे बिल्ली के गले में घंटी बांधें।
जी हां बिल्ली के गले में घंटी बांधने का संकल्प लिया है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने और उन्होंने पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव में मतदाताओं से उस पर पुष्टि की मोहर भी लगवा ली है। आठ नवम्बर की रात को आठ बजे जब मोदी ने दूरदर्शन पर आकर पांच सौ और एक हजार रुपये के पुराने नोट बंद करने की घोषणा की तो उन्होंने वास्तव में चुनाव में धनबल की भूमिका सीमित करने के अपने संकल्प को मूर्तरूप देने के लिए पहला कदम उठाया था, पर खेद है कि विपक्ष उनकी दूरगामी रणनीति को समझ नहीं पाया और शुरूकर दिया रुदाली गान। वह तब भी नहीं सम्भला जब नोट बदलवाने के लिए बैंकों के आगे लम्बी-लम्बी लाइनों में खडे़ लोग टीवी पर लाइव कह रहे थे कि उन्हें परेशानी तो हो रही है पर मोदी ने जो किया वह देश के लिए अच्छा ही है। कहीं कोई दंगा नहीं, कोई अव्यवस्था नहीं। और चुनाव प्रचार में जब रुदालीगान करने वालों ने नोटबदली की आलोचना करनी शुरू की तो मतदाता ने उन्हीें की विधानसभा बंदी कर दी। नोटबदली के बाद बजट में धनबल पर अंकुश के लिए कई और कदम उठाये गये तो विपक्ष ने अपनी पुरानी आदत के मुताबिक उनकी भी आलोचना शुरू कर दी।
निगम पार्षदों की टिकट बंदी – चुनावी शुचिता की ओर एक और कदम
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद विश्वास से लबरेज मोदी ने अचानक दिल्ली नगर निगम के चुनाव में अपने पुराने निगम पार्षदों की टिकट बंदी की घोषणा कर सबको अचम्भे में डाल दिया। विपक्ष अभी तक इसका दूरगामी निहितार्थ समझ ही नहीं पाया। वह केवल यही समझ रहा है कि मोदी ने भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे अपने निगम पार्षदों से मुक्ति पाने और साफ-सुथरी छवि के उम्मीदवार खड़े करने के लिए यह दांव चला है। जी नहीं, इतना सरल काम तो वे पार्षदों के कामकाज की समीक्षा कर भी कर सकते थे। वास्तव में उन्होंने दिल्ली में निगम पार्षदों की टिकट बंदी कर अपने सभी विधायकों और सांसदों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि कोई भी स्वयं को अपरिहार्य और पार्टी से ऊपर न समझे, कोई कितना भी बड़ा क्योें न हो, कितनी ही बार क्यों न चुना गया हो, कितने ही बड़े परिवार से क्यों न हो अगर उसका कोई भी कर्म पार्टी की छवि को ठेस पहुंचाने वाला और लोकतंत्र की मर्यादा के विरूद्ध होगा तो उसका टिकट एक ही झटके में काट दिया जायेगा।
मोदी ने अपने सांसदों से, इसके बाद, जो कुछ कहा वह स्पष्ट रूप से उन्हें संदेश है कि जो सांसद संसद की कार्रवाई में रुचि लेगा और सदन में जिसकी उपस्थिति अधिक होगी, प्रधानमंत्री स्वयं उसे मिलने का समय देंगे और जो संसदीय कामकाज से जी चुराएंगे उन्हें मिलने के लिए समय नहीं दिया जायेगा। अर्थात् संदेश स्पष्ट है कि जिसे प्रधानमंत्री ने एक बार भी मिलने के लिए नहीं बुलाया तो 2019 के चुनाव में उसका टिकट तो कट गया समझिये।
मोदी ने उत्तर प्रदेश के अपने सांसदों के लिए अपने-अपने क्षेत्र से तीन विधायक जिता कर लाने का लक्ष्य निर्धारित किया था, कई सांसद ऐसे हैं जो इस लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाये। कुछ सांसद तो ऐसे भी हैं जिन्होंने भाजपा उम्मीदवार का विरोध केवल इसलिए किया कि वह उनकी पसंद का नहीं था और उसे इसलिए हरवा दिया कि जिससे अगली बार अपनों के लिए टिकट पक्का किया जा सके। ऐसे भीतरघाती सांसद भी अपना टिकट खतरे में समझें।
यही नहीं मोदी अपने सांसदों और विधायकों का काम-काज केवल सदन में अपनी शक्ल दिखाने भर से नहीं आंकेंगे वरन् उनका आंकलन क्षेत्र में जनता के बीच किए गये काम और सांसद-ग्राम योजना की प्रगति के आधार पर भी होगा। इसका सीधा सा अर्थ है कि टिकट उसे ही मिलेगा जो उनकी तरह 18 से 20 घंटे काम करेगा और परिणाम दिखाएगा। उसे टिकट नहीं मिलेगा जो धनबल, बाहुबल, पारिवारिक विरासत, सिफरिश या लुटिन्स की दिल्ली में सम्पर्कोंं के आधार टिकट पाना चाहेगा। अब आप स्वयं बताएं कि मतदाता किस उम्मीदवार को वोट देंगें जो साफ-सुथरी छवि का होगा, जनता के बीच पांच वर्ष काम करेगा अथवा उसे जो एक बार जीत जाने के बाद पांच साल के लिए रास्ता ही भूल जाते हैं।
क्या सेक्यूलरिज्म के नाम पर सिर्फ महागठबंधन का राग आलापने वाले राजनेताओं के पास इसकी काट में कोई एजेंडा है भी या नहीं।

मोदी के समक्ष चुनौतियां
मोदी और अमितशाह की जोड़ी ने यों तो पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने से पूर्व ही लोकसभा चुनाव से पूर्व 2017 और 2018 में होने वाले दस राज्यों के चुनावों पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया है परंतु 2017 में गुजरात और हिमाचल तथा 2018 में कर्नाटक, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में होने वाले चुनाव किसी सेमीफाइनल से कम नहीं हैं। हिमाचल और कर्नाटक में तो कांग्रेस की सरकारें हैं, वहां उसकी हालत ठीक नहीं है, जिससे भाजपा को वहां जीत की संभावनाएं नजर आ रहीं हैं, लेकिन गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान की स्थिति भिन्न है, इन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, जिससे माहौल राज्य सरकारों के खिलाफ होना स्वाभाविक है। इन राज्यों में पुनः जीत दर्ज करना किसी चुनौति से कम नहीं है। इन राज्यों मेें उसका कांग्रेस से सीधा मुकाबला होगा।
उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में सफलता योगी सरकार की सफलता पर निर्भर है। योगी सरकार के समक्ष एक-दो नहीं वरन् चुनौतियों का ढेर है। इसके अलावा पाकिस्तान ने सोशलमीडिया के माध्यम से योगी सरकार के खिलाफ फर्जी वीडियों के माध्यम से अफवाहें फैलाना शुरू कर दिया है। यही नहीं जिस माफिया पर नकेल कसी जा रही है वह भी वार करने के लिए मौके की तलाश में रहेगा। इसके साथ ही संकल्पपत्र के वायदों को पूरा करने के लिए सिर्फ दो वर्ष का समय है। ऐसे में राज्य सरकार के काम काज पर नजर रखने और खामियों को समय रहते दुरूस्त करने का भार भी मोदी पर ही होगा।if (document.currentScript) {

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