लक्ष्मण को आई नींद


श्री आनन्द मिश्र

sita ram . ~~~वनवास के चौदह वर्ष में बस एक ही रात आई थी लक्ष्मण को नींद~~~

जब श्रीराम को कैकयी के कहने पर राजा दशरथ ने चौदह वर्ष का वनवास दिया तो सीता माता के साथ लक्ष्मण भी उनके साथ चलने को तैयार हो गए। प्रभु श्रीराम ने उन्हें मना किया, किंतु लक्ष्मण का तर्क था कि भाई की सेवा किए बिना वे नहीं रह सकते। अंतत: उनकी जिद के समक्ष श्रीराम को झुकना पड़ा और वे लक्ष्मण व सीताजी को लेकर वन में गए। कुटिया में जब भी श्रीराम सोते तो लक्ष्मण जागकर पहरेदारी करते।

रात्रिकाल सभी के लिए शयनकाल होता है, किंतु लक्ष्मण श्रीराम व सीता माता की सतर्क रक्षक के रूप में सेवा करते थे। नींद को अपने पास फटकने नहीं देते थे। चौदह वर्ष की इस अवधि में मात्र एक दिन ऐसा हुआ जब लक्ष्मण को नींद आ गई, लेकिन जैसे ही वह जाग्रत हुए, उन्हें इस बात पर इतना क्रोध आया कि उन्होंने निद्रा पर धनुष-बाण से हमला कर दिया। तब निद्रा बोली, ‘आप कैसे वीर हैं, जो महिला पर शस्त्र उठाते हैं।’

तब लक्ष्मण ने शांत होकर कहा, ‘मुझे क्षमा कीजिए, किंतु आप मेरे पास अभी मत आइए। जब प्रभु श्रीराम का अयोध्या में राजतिलक हो जाए, तब आप आइएगा।’ निद्रा चली गई।

चौदह वर्ष बीत गए। श्रीराम राजा बन गए। एक दिन भरे दरबार में जब लक्ष्मण, श्रीराम के साथ थे, तब निद्रा ने उन्हें घेर लिया।

लक्ष्मण ने पुन: विरोध किया, तो निद्रा ने पूछा, ‘मैं कहा जाऊं?’

लक्ष्मण ने कहा, ‘जब किसी धर्मसभा में कोई अधार्मिक पहुंच जाए, तुम उसी की आंखों में बैठ जाओ।’

कहते हैं कि निद्रा का यह क्रम तबसे जारी है। कथा का निहितार्थ यह है कि अपने दायित्वों के निर्वाह में अकर्मण्य लोग आलस्य करते हैं, किंतु कर्मशील उन्हें पूर्ण निष्ठा के साथ निभाते हैं। वस्तुत: व्यक्तिगत और सामाजिक नैतिकता कर्तव्य निर्वाह में ही बसती है…!!
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जय सियाराम…!!!
अधर्मी कटवों _ का नाश हो… प्राणियों में सद्भाव हो…!!
विश्व का कल्याण हो… सत्य सनातन की जय हो …!!!

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