राष्ट्रीय सुरक्षा और कांग्रेस का तबेला


प्रो. सतीश कुमार

पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयं सेवक प्रमुख मोहन भागवत के बयान को तोड़ मरोड़कर पेस किया गया। आर.एस.एस. प्रमुख ने सेना की कर्मठता पर कोई प्रश्न नहीं उठाया, संघ के आधिकारिक प्रवक्ता डॉ. मोहन वैद्य ने स्पष्ट शब्दो में कहा कि परिस्थितियाँ आने पर तथा संविधान द्वारा मान्य होने पर भारतीय सेना को सामान्य समाज को तैयार करने में ६ महीने लग जाएंगे लेकिन संघ के युवको को तैयार करने में महज ३ दिन लगेगा क्योंकि संघ से जुड़े हुए युवा अनुशासित होते है। दरअसल भारत में आज भी मीडिया पर कांग्रेस और वामपंथियों की पकड़ मजबूत है। उनकी नजर में देश की राजनीति उदारवाद वामपंथ की हो सकती है लेकिन दक्षिणपंथ उदारवादी नहीं बन सकती। प्रधानमंत्री ने आम जनता की भावनाओ को संसद में रखा था। आज भी देश हर दिन कांग्रेस के पाप के घड़े से रिस रहे जहर का निशाना बन रह है। हर दिन लोग कश्मीर में मारे जा रहे है। वोट बैंक की राजनीति के तहत देश की सुरक्षा और विदेश नीति बनायीं गयी चकमा शरणार्थीओ के लिए भारत के पूर्वी राज्यों का अभ्यारण बना दिया गया। रोहिंग्या को भी बसाया गया। जब मोदी की सरकार ने २०१७ में इस ताला जड़ दिया तो वामपंथियो और कांग्रेस ने खूब हो हल्ला किया।
आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की नीव जिस तरह से डाली गयी और भारत को एक नवोदित देश कह कर पुकारा गया। अर्थात भारत का जन्म ही १९४७ में हुआ। धर्म संस्कृति समाज और राष्ट्र का विद्रूपीकरण कर एक राष्ट्र राज्य के रूप जाने लगा। राष्ट्र राज्य के रूप में स्थापित किया गया। जिसकी नीव पश्चिमी सोच पर टिकी थी। जहाँ पर संस्कृति को धर्म मान लिया गया। अर्थात हिन्दू संस्कृति जो इस देश की विरासत थी वह अन्य बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा लाये गए धर्मो के श्रेणी खड़ा कर दिया गया। बाद में चलकर वोट की राजनीति ने हिन्दू संस्कृति को इस रूप में पेश किया गया कि यह अन्य धर्मो से निम्न है। राष्ट्रीय दृष्टि से हिन्दू संस्कृति की पहचान को निरंतर धूमिल करने की कोशिश की जाने लगी। विवेकानंद और मदनमोहन, महामना को सांप्रदायिक कहा गया। मोदी की सरकार ने इतिहास में किये गए भूलो को सुधारने की पहल शुरू की। देश को एक परिवार के जकड़न से निकलने की कवायद शुरू की। चूँकि वामपंथी व्यवस्था गाँधी परिवार के गमले में उपजे हुए खर पतवार थे। इसलिए उनकी निष्कंटक जीवन चर्या पर रोक लग गयी। उनकी हताशा और बेचैनी स्वाभाविक थी। उन्होंने गोलबंद होकर सरकार पर निशाना साधने लगे।
अगर प्रधानमंत्री ने यह कहा कि देश कि सुरक्षा को गाँधी नेहरू परिवार ने हासिये पर धकेल दिया है तो इसमें अतिश्योक्ति कहाँ है। भारत की विदेश नीति धर्म निर्देशित बनायीं जाने लगी। जब आजाद भारत में इजराइल के साथ सम्बन्ध बनाने की पहल की तो नेहरू के एक मंत्री अब्दुल कलाम ने यह कहकर उसको रोक दिया की इससे पाकिस्तान नाराज हो जाएगा और हमारा मुस्लिम तबके की भावनाये भी आहात होगी। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा की पटेल हमारे प्रथम प्रधानमंत्री होते तो देश की इतनी दुर्गति नहीं होती, इसमें क्या गलत है?

संसद में उठे इस विवाद को अगर निष्पक्ष अकादमिक नजरिये से नापा तौला जाए तो प्रधानमंत्री द्वारा कहे गये शब्दों में बल है, सच्चाई है जिसे छिपाया गया है। जब मोदी ने कहा कि यह कांग्रेस के पाप से आज भी झुलसा हुआ है, हर दिन कुछ-न-कुछ ऐसा होता है जिसकी नींव 1947 में खोदी गई थी। बहुतेरे इसके उदाहरण है। यहाँ पर जिक्र चंद घटनाओं और प्रसंगो की जरूरी है। जिससे देश के आम नागरिकों को महरूम रखा गया था। पहला, कश्मीर का मुद्दा। पिछले एक महिने में हमारे कई जवान शहीद हुए। निरंतर आतंकवादी हमले और पाकिस्तानी घुसपैठ जारी है। 70 वर्षों में जम्मू-कश्मीर का मसला कांग्रेसी राजनीति में इतना पिस चुका है कि उसका सुनयोजित हल खोज पाना अत्यंत ही कठिन काम है। लेकिन यहाँ पर कुछ बुनियादी प्रश्नों को पूछा जाना समयानुकूल है। पहला, नेहरू जी ने जम्मू-कश्मीर को भारत में विलय की शर्तो से क्यो जकड़ दिया ? जबकि वहाँ के महाराजा परिस्थितियों के कारण स्वतः और स्वाभाविक रूप से भारत में विलय के लिए राजी थे ? नेहरू क्या सोचकर जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्रसंघ की चौखट पर गुहार लगाने चले गए ? क्या इससे देश का भला हुआ ? जब भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को ललकारते हुए मुजफ्फराबाद, ग्रामीण पुंछ और गिलगित को अपने कब्जें में कर लिया था तो अचानक युद्ध विराम की घोषणा कर एक अलग पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर बनाने की छूट क्यों दी गई ? इतना ही नही जब गृह मंत्री पटेल 64 करोड़ रूपये पाकिस्तान को नहीं देने की जिद पर अड़ गए थे तो क्यों नेहरू ने पटेल के विरोध में एक अलग मोर्चा खोल दिया ? गांधी जी के दबाव में यह राशि पाकिस्तान को दी गई। क्यों नेहरू जी चीन के प्रधानमंत्री को भारत बुलाकर भारतीय नृत्य का लुत्फ उठाने का मौका दिया ? तिब्बत किस तरीके से भारतीय प्रभाव से फिसलकर चीन के चंगुल में अटक गया ? किस तरीके से भारतीय विदेश नीति राष्ट्र हित से अलग हटकर वोट बैंक की तराजू पर मापी जाने लगी ?
यदि प्रधानमंत्री ने इन तमाम खामियों को बटोरकर यह कहा कि कांग्रेसी नीतियों की वजह से खंजर हमारे देशवासियों को झेलना पड़ रहा है तो इसमें अतिश्योक्ति क्या है ? पटेल ने गृहमंत्री की हैसियत से दो टूक शब्दों में यह जवाब दिया था कि जब कोई देश हमारे साथ युद्ध की स्थिति में है तो उसे हम पैसा क्यों दे ? संधि हुई थी तो शांति और व्यवस्था को लेकर हुई थी, तब तय हुआ था कि भारत 64 करोड़ की राशि मुहैया करवाएगा। लेकिन पाकिस्तान इस पैसे से हथियारों की खरीद-फरोख्त कर हमें ही मारने मिटने पर उतारू है। कश्मीर की जनता मुस्लिम थी और राजा हिन्दू, इसलिए नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय संत गुरू बनने के चक्कर में कश्मीर का बंटाधार कर दिया। दूसरी तरफ अंग्रेजियत के अतिशय प्रेम ने कश्मीर मुद्दे को अअंतर्राष्ट्रीय कलेवर पहना दिया। बाद की विश्व राजनीति की धुंध में पाकिस्तान को अमेरिकी मदद की तलब थी, वह भी मिलनी शुरू हो गई। बाद में चीन ने पाकिस्तान की बांह थाम ली। पाकिस्तान ने चीन को कश्मीर मुद्दे का मुख्य सिपहसलार बना दिया। इसके बदले एक बड़ा हिस्सा चीन को दे दिया। यह सब कुछ दृष्टि दोष की वजह से पैदा हुआ जो कांग्रेस की देन थी। उसके उपरांत इंदिरा गांधी के द्वारा चकमा शरणार्थियों के लिए भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों को रैन बसेरा बना दिया गया। तकरीबन हर उत्तर पूर्वी राज्यों की जनसांख्यिकी बदलने लगी। विद्रोह और विद्वेष की चिंगारी फैलने लगी। इसके अतिरिक्त और कई उदाहरण है। नेपाल के राजा त्रिभुवन भारत के साथ मिलना चाहते थे। मिलने-मिलाने की बात तो दूर की रही, नेपाल तक भारत विरोधी बन गया। सत्ता के गलियारों में भारत विरोध की महत्वपूर्ण इकाई नेपाल में बनकर तैयार हो गई। कौन जिम्मेदार है इसके लिए ? आज नेपाल अगर भारत से संयमित दूरी की बात करता है तो इसके पीछे भारत की दोषपूर्ण नीति रही है जिसे पल्लवित और पुष्ठित कांग्रेस की सरकार ने किया। तिब्बत को हड़पने के बाद चीन की सेना नेपाल तक पहुंच गई। नेपाल की सीमा भारत के चार बड़े राज्यों से मिलती है। जो आसन भारत का अंग्रेजों के दौरान था वह टूटता चला गया, हमारे प्रधानमंत्री चीन से प्रेम कम भयभीत ज्यादा दिखने लगे। यह कारवां तकरीबन 2014 तक चला। पूर्व प्रधामंत्री मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल के अंतिम चंद दिनों में यह कहा था कि भारत की अपनी कोई सामरिक संस्कृति नहीं है, वे सच कह गए थे, लेकिन इसके लिए दोषी कौन है, चीन के मसले पर कांग्रेस के दो मंत्री अलग अलग राग अलापते रहे. कोई चीन को खतरा बताता तो कोई चीन को मित्र कहकर बुलाता। मोदी की सरकार ने अपनी विदेश नीति को एक सामरिक ढांचे में बांध दिया है। मेक इन इंडिया, और लुक एक्ट पालिसी इसके बेहतरीन उदहारण है। पटेल ने १९४८ में अमेरिका के तरफ उन्मुख होने कि सलाह नेहरू को दी थी, लेकिन नेहरू अपनी जिद पर भारत को अमेरिका विरोधी बना दिया। जिसका खामियाजा भारत को ६ दशकों तक झेलना पड़ा। कई नियामक और प्रसंग है जिसकी चर्चा देश में होनी चाहिए। देश की जनता प्रबुद्ध है। २०१९ चुनाव राष्ट्र की सुरक्षा और अस्मिता के लिए जरुरी है। देश की जनता को जानने का पूरा हक़ है की गलतिया कब और क्यों हुई है। इसकी कीमत देश ने कैसे चुकाया है और आज भी चुका रहा है। इस व्यूह रचना से निकलने के रास्ते कहाँ से निकलती है। कौन हमें निकाल सकने में सक्षम है। इन सारे मसलो पर चर्चा होनी चाहिए।

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