राष्ट्रपाल क्यों न कहा जाये राष्ट्रपति को?


डॉ. विनोद बब्बर

चुनाव आयोग द्वारा गणतंत्र भारत के 14वें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होते ही राजनैतिक सरगर्मियों तेज हो गई है। इस चुनाव में लोक सभा, राज्यसभा और विधानसभा के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं। 26 जनवरी, 1950 को भारत के गणतंत्र घोषित होने के बाद से अबतक 13 राष्ट्रपति (3 कार्यवाहक राष्ट्रपति भी) हो चुके है। इस दायित्व का निर्वहन देश के स्वनाम धन्य विभूतियों ने किया है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ही एकमात्र ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने लगातार दो बार इस पद को सुशोभित किया। उनके बाद क्रमशः डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डॉ. ज़ाकिर हुसैन, डॉ.वराहगिरि वेंकट गिरि, डॉ. फ़ख़रुद्दीन अली अहमद, डॉ. नीलम संजीव रेड्डी, ज्ञानी जैल सिंह, डॉ. रामास्वामी वेंकटरमण, डॉ. शंकरदयाल शर्मा, डॉ. के. आर. नारायणन, डॉ. ऐ. पी. जे. अब्दुल कलाम, श्रीमती प्रतिभा पाटिल और वर्तमान डॉ. प्रणब मुखर्जी हमारे राष्ट्रपति हैं।
भारतीय राष्ट्रपति राष्ट्र प्रमुख और भारत के प्रथम नागरिक हैं, साथ ही भारतीय सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख सेनापति भी हैं। राष्ट्रपति के पास पर्याप्त शक्ति होती है परंतु ऐसा माना जाता है कि इनके अधिकांश अधिकार वास्तव में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिपरिषद के द्वारा उपयोग किए जाते हैं। हमारे राष्ट्रपति दिल्ली की रायसीना हिल पर बने राष्ट्रपति भवन में रहते है। इन पंक्तियों के आप तक पहुंचते- पहुंचते यह लगभग सुनिश्चित हो जायेगा कि अगले पांच वर्षों तक इस पद पर कौन आसीन होगा।
यह हमारे लोकतंत्र का उज्ज्वल पक्ष है कि सरकारें बदलने के बावजूद राष्ट्रपति और सरकार के सबंध सौहार्द्धपूर्ण रहे हैं। राजनैतिक प्रतिबद्धता पर पद की गरिमा को महत्व दिया जाता रहा है। क्योंकि इस पद तक पहुंचे व्यक्तित्व से यह राष्ट्र संविधान के पालक की आपेक्षा करता है। इसलिए बदलते परिवेश में क्या यह बहस एक बार फिर से आगे बढ़नी चाहिए कि जब राज्य के शासन प्रमुख को राज्यपाल कहा जाता है तो फिर राष्ट्र के शासन प्रमुख को राष्ट्रपाल क्यों नहीं कहा जाता? जिसे हम राष्ट्रपति कहते हैं उसे दुनिया भर में प्रेसिडेंट कहा जाता है, जोकि अंग्रेजी शब्द है। उर्दू वाले उन्हें सदर-ए-जम्हूरियत कहते हैं तो राष्ट्रभाषा हिन्दी में राष्ट्रपति क्यों?
राष्ट्रपति बनाम राष्ट्रपाल बहस पुरानी है। इस संबंध में अनेक तर्क दिये जाते रहे हैं परंतु इस और ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन इस बार परिवेश बदला हुआ है। जो लोग इस मांग पर बल देते रहे हैं संयोग से उन्हीं में से अनेक लोग इस मांग को पूरा करने की स्थिति में है। ऐसे में यह उचित समय है जब इस विषय पर फिर से चर्चा होनी ही चाहिए। यहां स्मरणीय है कि कुछ वर्ष पूर्व सूचना के अधिकार के अंतर्गत यह पूछे जाने पर कि गांधीजी को राष्ट्रपिता की उपाधि कब और किसने दी थी। तो उत्तर में बताया गया था कि ‘भारतीय संविधान में इस प्रकार की कोई उपाधि नहीं है।’
सर्वप्रथम राष्ट्र, पति एवं पिता के अर्थ पर दृष्टिपात करें। राष्ट्र वस्तुतः जन, संस्कृति व क्षेत्र का समायोजित स्वरूप होता है। जबकि आम व्यवहार में पिता का अर्थ हैं, जन्म देने वाला जोकि राष्ट्र जैसी विशाल संस्था के संबंध में उचित नही कहा जा सकता। भारतीय दर्शन के अनुसार जन्म देने वाला, उपनयन करने वाला, विद्या या शिक्षा देने वाला, भोजन देने वाला अर्थात पालन करने वाला तथा जीवन में विभिन्न भय से रक्षा करने वाला, ये पाँच पिता ही होते हैं। हम राष्ट्र को ‘राष्ट्र पुरूष’ अर्थात देवता के रूप में मान्यता देते हो अथवा ‘राष्ट्रदेवी’ अर्थात भारत माता के रूप में वंदन करते हो, हम सभी उसकी संतान तो हो सकते हैं पर उसके पति-पिता आदि नहीं। अब यदि संस्कृति की दृष्टि से बात करें तो दुनिया की सबसे प्राचीन, सभ्यता संस्कृति का पिता उन्नीसवीं सदी में जन्मा कोई महापुरूष कैसे हो सकता है?
आज यदि स्वयं गांधीजी होते तो संभवत वे ं इस राष्ट्र के महान गौरव के सम्मुख नतमस्तक होते हुए राष्ट्रपुत्र कहलाने में गर्व अनुभव करते। गांधी जी ही क्यों, भारत की महानतम परंपरा में भगवान राम अथवा श्रीकृष्ण हो या वाल्मीकि, वेदव्यास, पाणिनि, कपिल, शंकराचार्य, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, कालिदास व चाणक्य जैसे लाखों उद्भट विद्वान, दार्शनिक, वैज्ञानिक तथा भगवान महावीर, गौतम बुद्ध, गुरुनानक, कबीर, तुलसीदास व रामकृष्ण परमहंस जैसे लाखों महात्मा सन्त, जनक युधिष्ठिर से लेकर चन्द्रगुप्त मौर्य विक्रमादित्य, समुदगुप्त, शालिवाहन, महाराणा प्रताप, शिवाजी जैसे ं वीर, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि रमण व स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानंद जैसे विचारकों ने जन्म लिया है किन्तु किसी को राष्ट्रपिता की उपाधि नहीं दी जा सकती। दुनिया में भारत ही एकमात्र राष्ट्र है जहां राष्ट्रभूमि को माँ के परम-पवित्र व सर्वाधिक गरिमामय सम्बोधन से संबोधित करते हैं। जहाँ श्रीराम कहते हैं, ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादापि गरीयसी अर्थात् जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है’ भला उस राष्ट्रभूमि का कोई सुयोग्य पुत्र स्वयं को राष्ट्रपिता के रूप में कैसे स्वीकार कर सकता है। इसीलिए तो हम श्री राम अथवा श्रीकृष्ण को भी राष्ट्रपुरुष कहकर संबोधित करते है, राष्ट्रपिता नहीं।
वर्तमान प्रधानमंत्री गांधीजी से प्रभावित हैं इसीलिए उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण अभियान गांधी जयन्ती के अवसर पर आरंभ किये गये। अपने महापुरुषों को सम्मान देना भारत की परम्परा है। मतभिन्नता के बावजूद गांधीजी अपने सर्वथा नए प्रयोगों और देश की स्वतंत्रता के लिए किए गए उनके प्रयासांे के लिए हम सभी के लिए सम्माननीय और एक महान नायक हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में कुछ लोगों ने उन्हें बापू तो कुछ ने महात्मा कह कर पुकारा। इन्हीं कारणों से वे महानतम् राष्ट्रपुत्र कहलाने के हकदार तो निश्चित रूप से हैं। राष्ट्रपिता शब्द अति उत्साह में दिया गया प्रतीक है, जोकि व्यवहारिक प्रतीत नहीं होता। आखिर किसी पिता का अपनी संतति के आस्तिव में आने से पूर्व होना तथा उसकी उत्पत्ति का कारक/कारण होना चाहिए। अतः यह विचारणीय है कि क्या ऐसा पिता संभव है जिसके जन्म से हजारो, लाखों वर्ष पूर्व ही उसके वंशजों (राष्ट्र) का आस्तित्व रहा हो? शायद नहीं निश्चित रूप से ऐसा नहीं हो सकता।
क्या यह सत्य नहीं कि देश का प्रबुद्ध वर्ग ही नहीं आम जनता भी ‘पति’ तथा ‘पिता’ के अर्थ को केवल एक ही रूप में लेती है। उनके लिए ‘राष्ट्रपति’ शाब्दिक दृष्टि से अटपटा है क्योंकि कोई भी व्यक्ति चाहे कितना भी महान क्यों न हो। इस राष्ट्र का पति अथवा पिता नहीं हो सकता। अतः उसे ‘राष्ट्रपति’ के स्थान पर ‘राष्ट्र-पाल’ कहना ज्यादा उचित होगा। व्याकरण की दृष्टि से ‘पति’ शब्द को पुल्लिंग माना जाता है। यह भी सर्वज्ञात है कि हमारी 12वीं प्रेजिडेंट देश की प्रथम महिला राष्ट्राध्यक्षा रह चुकी हैं। लेकिन उनके लिए ‘पति’ शब्द का उपयोग व्याकरण और व्यवहारिक दृष्टि से कितना जायज था। इस देश में विद्वानों की कमी नहीं है जो वैकल्पिक शब्द भी सुझा सकते हैं और फिर शब्द चयन आयोग ही है जो ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए ही गठित किया गया है। यह राष्ट्र भाषा हिन्दी सहित समस्त भारतीय भाषाओं के विद्वानों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है कि वे प्रेसिडंेट शब्द का सर्वमान्य विकल्प सुझाकर एक बार फिर से साबित कर दे तो हमारी भाषाएं किसी दृष्टि में कमतर नहीं अपितु विश्व की समृद्धतम भाषाएं हैं।
आशा है यह बहस बिना किसी राजनैतिक विवाद में उलझे इस देश को नये राष्ट्र प्रमुख के साथ- साथ नया पदनाम देने में सफल होगी। ताकि देश के सर्वोच्च पद के उच्चारण में ही गरिमा के साथ साथ भारतीयता झलके न कि भ्रम! आखिर समय के साथ अप्रसंगिक हो चुके एक हजार से अधिक कानूनों को समाप्त कर दिया, संविधान में अनेक संशोधन हुए तो यह छोटा सा लेकिन महत्वपूर्ण संशोधन क्यों नहीं? सौ करोड़ से अधिक भारतीयों के लिए राष्ट्र जीवंत, सार्वभौमिक, युगांतकारी और हर विविधताओं को समाहित करने की क्षमता रखने वाला एक दर्शन है। इसलिए इस राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख को राष्ट्रपाल नाम कर अनुग्रहित करें।
डा. विनोद बब्बर

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