मोदी सरकार के कृषि क्षेत्र में ध्यान देने से उम्मीदें जगी


शिवाजी सरकार

namoभाजपा सरकार बड़ी दुविधा में है। विरासत के रूप में उसे खाली राजकोष,बेमानी सबसिडी वाले फिजूल खर्च वाले कार्यक्रम जैसे मनरेगा और खाद्य सुरक्षा मिले है जिससे जनता को दिखावटी फायदा मिला। मनमोहन सरकार के ऐसे कार्य से देश का निर्माण न होना था और न ही हुआ। मोदी सरकार को अब नीचे से उपर तक देश निर्माण के लिए जुटना होगा।

वित मंत्री अरूण जेटली को नए नए प्रयोगों से धराशायी हुई जा रही अर्थव्यवस्था को विकास की पटरी पर लाना होगा। बजट हो सकता है कि नया लगे लेकिन यह मनमोहन सरकार के फरवरी में पेश किए पुराने बजट सरीखा ही हो सकता है। इसकी सीमाएं तय हैं। जेटली के सामने यह एक कठिन चुनौती है जिसमें उसे यह तय करना है कि इसे छोडे या करें,जो सच में असंभव है, जिसमें वो फंस गए है। उन्होंने भाजपा के विजन दस्तावेज,घोषणापत्र, कुछ पारंपरिक मान्यताओं और आधुनिक संदर्भो से बहुत कुछ लिया है।

जेटली को मुद्रास्फीति के रुझान को पलटने के लिए कुछ योजनाओं को बनाना होगा। सोने की कीमतें  छोड़कर ओर किसी वस्तुओं में अभी तक सकारात्मक लक्षण नहीं दिखे हैं। केवल एक नीति में बदलाव करने की इच्छा से जिसमें बड़ी कंपनियों से आयात की अनुमति दी जाए, उससे बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है। हालांकि इससे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर असर नहीं पड़ा। यह वित्त मंत्री और नरेंद्र मोदी सरकार की अग्निपरीक्षा है।

लोगों को मोदी सरकार से बहुत उम्मीदें है। वे मनमोहन-कांग्रेस सरकार के शासनकाल में बरसों से नुकसान उठा रहे हैं। वे एक अलग नजरिए के साथ अलग तरह से इस सरकार को काम करते हुए देखना चाहते है। मनमोहनामिक्स बुरी तरह नाकाम रहा है और लोग अब उसकी कतई वापसी नहीं चाहते हैं। कूड़ा फैंकना ठीक है न कि उसे दोबारा अमल में लाना।

संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों आईएमएफ-विश्व बैंक मनमोहन के अर्थशास्त्र मॉडल को छोड़ने की बात कर रही हैं। वह नया मॉडल अभी तक नहीं आया है जिसमें अर्थशास्त्र का पूंजीकरण, उपभोक्ता वस्तुओं और एक मुक्त बाजार को देने का संकेत करता हो । 1991 में आई आर्थिक नीतियों ने अधिक संदेह पैदा किया। जिसमें से अधिकांश सच साबित हुई है। यह जनता के पैसे से बड़े घरों की मदद करने वाली योजना ही थी।

नौकरियां नहीं है, गरीबी बढ़ी हैं, मैनुफैक्चरिंग और उद्योगों की बुरी हालत है। लोंगो की सादगी भरी जिंदगी बहुत मंहगी हो चुकी है। यहां आपको अपनी जीवनशैली को भूलना होगा। जेटली से उम्मीदें हैं कि वे इसे ठीक करें।

उन्होंने कुछ कृषि विशेषज्ञों से बातचीत करके एक सकारात्मक संदेश दे दिया है। जी हां, विकास और अच्छी जीवनशैली तभी संभव है जब कृषि क्षेत्र की महत्व दिया जाए और पूरा ध्यान उस पर केंद्रित किया जाए। महात्मा गांधी ने कहा था-भारत एक कृषि प्रधान देश है, जो आज के दिन पूरी तरह सत्य है। इससे भविष्य में होने वाली विकास की रणनीति का आधार बनेगा। लोग जेटली से अर्थव्यवस्था के उदेश्य में बदलाव चाहते हैं। पर कारपोरेट इस विचार से चिंतित हो उठा है। उन्हें अपनी सत्ता कमजोर होती लग रही है। ताकत कम हो रही है। किसान बहुत बड़ी संख्या में हैं लेकिन उनके पास वह ताकत नहीं है जो कारपोरेट के पास है।

atal jiअटल बिहारी सरकार द्वारा शुरू की गई मूल्य स्थिरीकरण कोश को पुनः मोदी सरकार लागू करने की इच्छुक नजर आ रही है। इससे कॉफी और चाय की कीमतों में वृद्वि हुई थी। एक ही आशा है कि अन्य वस्तुओं के साथ ऐसा नहीं होगा जिसको यह शामिल करना चाहते है। लोग जैसा कि कई अर्थशास्त्रियों का कहना है एक विकासशील उपभोक्तावादी समाज को ऊंची कीमत का भुगतान करना होगा, के सुनने के मूड में नहीं हैं।

खेतों की ओर उन्मुख नीतियों पर सावधान होकर कड़ी जांच की आवश्यकता होती है। अमेरिका जिसे एक ऐसे देश के रूप में पेश किया जाता है जहां अक्सर खाद्यान्न और आवश्यक वस्तु की कीमते बरसों से स्थिर बनी हुई है। लेकिन उन्होंने यह उच्च कृषि सब्सिडी के माध्यम से हासिल किया है। मोदी सरकार भी संभवतः यही चाहती हैं, लेकिन फंड की कमी इसमें एक बड़ी बाधा बन रही है। सरकार चलाने के लिए ही पैसा बड़ी कठिनाई से जुटाया जा रहा है।}

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