मोदी की मध्य एशिया यात्राः एक नए युग की शुरुआत


डॉ. सतीश कुमार

 

images1मोदी की मध्य एशिया यात्रा कई मायनों में नए युग की शुरूआत मानी जा सकती है। केवल इसलिए नहीं कि नेहरू जी के बाद प्रधानमंत्री मोदी पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने एक साथ पाँचों मध्य एशियाई देशों की यात्रा की हो, बल्कि इसलिए भी कि पिछले कई वर्षों से मध्य एशियाई देशों के लिए हमारी विदेश नीति में एक उदासीनता और शिथिलता का भाव बना रहा। इसका खामियाजा कई रूपों में देखा गया। जब पूर्व सोवियत संघ के साथ भारत की दोस्ती मजबूत जोड़ के साथ बनी हुई थी, उसी दौरान पूर्व सोवियत संघ का विखण्डन हुआ और कई नए राष्ट्र सोवियत संघ से अलग होकर एक देश के रूप में स्थापित हुए। रूस के साथ बेहतर संबंध का फायदा भारत को मिला। मध्य एशियाई नवनिर्मित राज्यों में हमारे दूतावास और कूटनीतिक इकाइयाँ मौजूद थी। लेकिन भारत की विशेष स्थिति और पकड़ के बावजूद मध्य एशिया के पाँचों राज्य भारत की मुट्ठी से रेत की तरह फिसलते चले गए। दूसरी तरफ भारत की विरोधी शक्तियाँ मसलन चीन अपनी चपेट में इन देशों को समेटने लगा। पाकिस्तान ने भी कमर कस ली और अफगानिस्तान में अपने पैर पसारकर भारत के लिए मुश्किलें पेदा करने लगा। इस्लामिक देश विशेषकर ईरान भी दृढ़-धर्मिता दिखाने लगा। हर तरफ से मध्य एशियाई देश भारत से कटते चले गए। व्यापारिक संबंध बनने की बजाय बिगड़ने लगे। अंतर्राष्ट्रीय पाईप लाईन महज (टापी) तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत में भी कोई विशेष सफलता नहीं मिली।
कांग्रेस सरकार की विदेश नीति ने मध्य एशिया को महज भारतीय पाठ्य पुस्तक में विवेचना का विषय बना दिया। वहीं चीन ने ‘वन रोड़ वन वेल्ट‘ की बात शुरू कर दी। चीन की यह विश्वव्यापी परिकल्पना भारत के लिए गले की हड्डी बनने लगा। दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, मध्य पूर्व एशिया और यूरोप को सड़क मार्ग से जोड़ने की बात चल पड़ी। दरअसल भारत की बेचैनी का कारण यह भी था कि चीन इस पूरे परिक्रम में भारत के पड़ोसी राष्ट्रों को जोड़ना चाहता है लेकिन भारत का नाम कहीं नहीं लिया। कथन चाहे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का हो या भारत विरोध का, भारत के नए प्रधानमंत्री के जेहन में यह बात कांटे की तरह चुभ गई। कारण और कई हो सकते है लेकिन मोदी की मध्य एशियाई यात्रा को इस रूप में देखा जा सकता है। पाँचों राज्यों से अलग-अलग समझौते, सांस्कृतिक आयाम से लेकर सामरिक मसौदे पर हस्ताक्षर, इस बात की पुष्टि करता है कि भारत मध्य एशियाई गणराज्यों में अपनी कमजोर पकड़ को मजबूत बनाना चाहता है। उसे बाहरी शक्तियों के प्रभाव से मुक्त करना चाहता है। मोदी की विदेश नीति का मुख्य पहलू आर्थिक विकास और मजबूत व्यापारिक संबंध ही है, जिसके प्रभाव से भारत की पकड़ मजबूत बन सकती है। 82002-meain_0
मध्य एशिया के सामरिक पहलूओं को देखतेे हुए प्रधानमंत्री मोदी का निर्णय ने केवल साहसिक है बल्कि एक बुद्धिमान और चतुर राजनेता जैसा भी है। मध्य एशिया दुनिया की महत्त्वपूर्ण शक्तियों के बीच घिरा हुआ है। उत्तर में रूस तो दक्षिण में अफगानिस्तान, पश्चिम में यूरोप और पूर्व में चीन की सीमाएं मिलती हैं। भौगोलिक स्वरूप पहाड़ीनुमा है। विश्व प्रसिद्ध भ्रमणकारी विद्वान मार्कपोलो ने इसे 13वीं शताब्दी में ‘रूफ ऑफ द वर्ल्ड‘ के रूप मेें पुकारा था। एक अन्य इतिहासकार ने यह टिप्पणी की थी कि जो कोई देश इन पहाडि़यों पर कब्जा कर लेगा, वह एशिया का मालिक होगा और जिसके शिकंजे में एशिया महादेश (महाद्वीप) होगा, दुनिया उसके कदमों में होगी। इतिहास इस बात का गवाह है कि मध्ययुगीन विश्वविजेता तैमूरलंग ने मध्य एशिया से ही अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। मुगल सलतनत का संस्थापक बाबर उजबेकिस्तान का रहने वाला था। 19वीं शताब्दी में ‘द ग्रेट गेम‘ मध्य एशिया को लेकर रूस और ब्रिटेन के बीच लड़ी गई। हर युग में इस क्षेत्र पर अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण शक्तियों में द्वंद चलता रहा है। पूर्व सोवियत संघ के विखण्डन के बाद पुनः जोरअजमाईश और रस्साकसी शुरू हो गई है। चीन हर कीमत पर इस इलाके को अपने वर्चस्व में रखना चाहता है। पुतिन की नीति रूस को पुनः इस क्षेत्र का संरक्षक बनाने की है। ईरान, तुर्की और अन्य मध्य पूर्व एशिया के देश इस्लामिक बंधुत्व और धर्म के नाम पर एक अलग टोली बनाने की जुगत में हैं। पाकिस्तान की नीयत भारत विरोध की है। पाकिस्तान हर कीमत पर भारत के विस्तार और समीकरण को तोड़ना चाहता है। जबकि भारत का सांस्कृतिक सबंध मध्य एशिया से बहुत पुराना है। कुषाण युग में संस्कृत में लिखी गई लिपियों से पता चलता है कि भारत के महत्त्वपूर्ण शहरों से मध्य एशिया के देशों में खूब जमकर व्यापार होता था। कई सांस्कृतिक स्थल दोनों देशों के बीच सेतु के रूप में काम करते थे। कई सूफी संत भारत आकर बस गए और यहाँ की सांस्कृतिक धरोहर को मजबूत किया। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयाम मध्य एशियाई देशों में खूब लोकप्रिय है। हिंदी फिल्म जगत की गूंज मध्य एशिया के कस्बों में सुनाई देती है। यही कारण है कि तकरीबन हर सफल हिंदी फिल्म का भाषाई रूपांतरण मध्य एशिया की भाषा में किया जाता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने मध्य एशियाई देशों के उस पक्ष से भारत के संबंध बनाने की कोशिश की है, जिसकी बुनियाद न केवल मजबूत है बल्कि पौराणिक है। उजबेकिस्तान के साथ व्यापार और ‘सिल्क रूट‘ में गति लाने की बात वहाँ के राष्ट्रपति करिमोअ के साथ की। पर्यटन और निवेश को आगे बढ़ाने के समझौते भी हुए। साइबर सुरक्षा के मसौदे भी तैयार किए गए। उल्लेखनीय है कि उजबेकिस्तान में यूरेनियम का प्रचुर भंड़ार है। समझौते के अनुसार हर वर्ष करीब 2000 मीट्रिक टन यूरेनियम का आयात उजबेकिस्तान से भारत में होगा। इसी प्रकार का समझौता कजाकिस्तान के साथ भी किया गया। यहाँ से 5000 मीट्रिक टन यूरेनियम हर वर्ष भारत भेजा जाएगा।
भारत ने सुरक्षा और इस्लामिक आतंकवाद जैसे मुद्दों पर भी बातचीत की। उल्लेखनीय है कि तजाकिस्तान और दक्षिणी किर्गिस्तान में इस्लामिक अतिवादी तत्व सक्रिय है। इनकी धमाचौकड़ी मध्य एशिया के अन्य राज्यों की राजनीति को भी प्रभावित करती है। ‘इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उजबेकिस्तान‘ की मिलीभगत अलकायदा से है। निरंतर विस्तार अफगानिस्तान की सीमाओं से होते हुए भारत की परिधि में भी प्रवेश करता है। तकरीबन 1400 कि.मी. की तजाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा दक्षिण एशिया को प्रभावित करती है। पाक-अफगान सीमा पहले से ही दहशतगर्दों के निशाने पर है। ऐसे हालात में भारत का चिंतित होना लाजमी है। यही कारण था कि मोदी ने मध्य एशिया देशों की यात्रा की समाप्ति तजाकिस्तान के साथ की। तजाकिस्तान के साथ कई महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हसताक्ष हुए, जिसमें रक्षा और सुरक्षा पर विशेष बल दिया गया।
imagesहर तरह से भारत की विदेश नीति में मोदी की मध्य एशियाई देशों की यात्रा को एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन के रूप में देखा जाएगा। यह यात्रा ऐसे वातावरण में सम्पन्न हुई, जिसका सामरिक महत्त्व है। भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि को मजबूती देने में यह यात्रा काफी सहयोगी होगी। अनुबंधों के अनुपालन के साथ जो गति मध्य एशिया में थम गई थी, वह ऊॅलाचे भरने लगेगी। सांस्कृतिक आयाम ये लेकर सामरिक गठबंधन को एक मजबूत इकाई दोनों क्षेत्रों में बनने की उम्मीद की जा सकती है।

(लेखक झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष हैं)

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