जी हाँ, मृत्यु उत्सव ही है


डॉ विनोद बब्बर

कल हमारे पड़ोस में रहने वाले सरदार उजागर सिंह जी इस नश्वर संसार की अपनी यात्रा सम्पूर्ण करते हुए अनन्त में विलीन हो गए। पुत्र, पौत्रों सहित भरा पूरा परिवार है। इसलिए उनकी अंतिम यात्रा बहुत धूमधाम से निकाली गई। बैंड बाजे तो थे ही अनेक सजी सफेद घोड़ियां भी थी जिन पर उनके पौत्र आदि बैठे थे। खील, पताशे, सूखे मेवे, सिक्के लुटाये जा रहे थे। अनेक लोगों के लिए यह दृश्य अनोखा था। सर्वत्र यही चर्चा का विषय रहा कि शव यात्रा में शानदार बैंड और सजी धजी घोड़ियों क्यों? खुशी का अवसर है या शोक का? घर का एक सदस्य चला गया तो यह सब करने की क्या जरूरत है? किसी के लिए यह दिखावा था तो कुछ के लिए धन की बर्बादी। यानी अनेक प्रश्न। प्रश्नों के उपप्रश्न। उपप्रश्नों के भी प्रकार।
यह शरीर नश्वर है। एक दिन सब छूट जाना है। हम सब संसार रूपी इस रंगमंच पर परिस्थितियों द्वारा सौंपी गई भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। जो कलाकार रंगमंच पर शानदार अभिनय करता है तो शो के अंत में उसके लिए तालियों की गड़गड़ाहट होती है। जो खिलाड़ी अच्छा खेलता है तो उसके आऊट होकर पवैलियन लौटने पर पूरा स्टेडियम उसका अभिनन्दन करता है। लोग उसे सलाम, प्रणाम करते हैं। किसी कार्यालय से सेवानिवृत्त होने वाले किसी अच्छे अधिकारी या कर्मचारी की विदाई में औपचारिकता नहीं, सचमुच एक अलग भाव रहता है। अनेक लोग उनका अनुसरण करने की सोचते हैं। हम सबके के जीवन में ऐसे अनेकों अवसर उत्सव होते हैं। तो सम्पूर्णता से जीने के बाद अनन्त में विलीन होने वाले को विदाई का यह तरीका आखिर प्रश्नों के घेरे में क्यों?
यह संसार रंगमंच है इसी पुष्टि गुरुवाणी भी करती है, ‘देखन आयो जगत तमाशा’। हम सब इस जगत में तमाशा देखने और उसका एक पात्र बनने के लिए आये हैं। जगत तमाशा तो चलता रहेगा लेकिन इस तमाशो में अब ‘मेरी’ भूमिका नहीं तो क्या मैं मंच घेरे रहूं? अन्य पात्रों के अभिनय में रूकावट बनकर उनकी घृणा का पात्र बनूं? नहीं, नहीं, अब मुझे मंच पर नहीं होना चाहिए। प्रसन्नता पूर्वक मंच छोड़ने को शायद आप किसी ‘स्थितप्रज्ञ’ के लिए संभव माने, आम आदमी के लिए नहीं। लेकिन प्रसन्नतापूर्वक विदा करना तो बहुत कठिन नहीं है।
शरीर थक जाये, जर्जर हो जाए तो क्या फिर भी हम उसे छोड़ना नहीं चाहेगे? शायद एक सीमा तक उसे फिर से तरो ताजा करने का प्रयास और आस करें लेकिन जब जान लेंगे कि अब कुछ नहीं हो सकता तो ‘मुक्ति’ की कामना शरशैय्या पर पड़े केवल पितामह भीष्म ने ही नहीं की, उस अवस्था में हर व्यक्ति करता है। इसीलिए तो कहा गया-
जिस मरने से जग डरे मेरे मन आनंद
जब मरिहूँ तब पाइ हौं पूरण परमानंद।
बचपन में महामृत्युंजय मंत्र की चर्चा सुनता था। मुझे किसी ने बताया कि यह ‘मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र’ है। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। स्पष्ट है कि ऋ़ग्वेद और यजुर्वेद में शामिल यह मंत्र त्रयंबकम् (त्रि-नेत्रों वाले) से की गई प्रार्थना है जिसका भावार्थ इस प्रकार है- ‘हे प्रभ जिस प्रकार उर्वारुकम (ककड़ी,। विशेष- पंजाब में खरबूजे को भी ककड़ी कहते हैं) एक नाजुक बेल से जुड़ी होती है मैं भी यही दशा है। हे प्रभु मुझे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् तक इस नाजुक बेल से अलग मत करना। यानी प्रार्थना करने वाले अपने जीवन को परिवार और समाज के लिए उपयोगी (सुगंध और मिठास) होने की कामना कर रहा है। अपने कर्तव्यों के उचित निर्वहन की संतुष्टि के बाद उसे बेल से अलग होने पर कोई अफसोस नहीं होगा।
यह बात बहुत देर बाद समझा कि मृत्यु पर विजय का अर्थ मृत्यु की अनिवार्यता को बाधित करना नहीं हो सकता। उसे तो होना ही लेकिन ‘सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्’ होकर हो तो संतुष्टि और आनंद।
आत्मा अजर अमर है और देह नश्वर तो मृत्यु का अर्थ केवल इतना है कि हमारा तबादला ट्रास्फर हो रहा है। यह ठीक है कि इससे कुछ लोगों को हमसे बिछड़ना अच्छा नहीं लग रहा। शायद हमें भी उनसे बिछड़ना प्रिय न हो परंतु हमें प्रियकर और हितकर के अंतर को समझना होगा। यहां लिपिक था, इस पोस्ट को छोड़ वह अधिकारी हो रहा है तो बताओं गलत कैसे? यहां छोटे मकान के बदले वहां उसे बंगला मिल रहा है तो गलत क्योंकर? यहां पुराने फटे कपड़ों के बदले उसे नये वस्त्र मिल रहे है तो भला किसी को अफसोस क्यों होगा? अफसोस तो उसे ही होगा जो उसका शुभचिंतक न हो? इसी तरह यहां जर्जर शरीर छोड़ने पर उसे नया और स्वस्थ शरीर मिल रहा है तो शोक का औचित्य?
मृत्यु पर पदमभूषण गोपालदास नीरज ने क्या खूब कहा है-
न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ, बस इतनी सिर्फ बात
किसी की आँख खुल गई, किसी को नींद आ गई!

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