मिजोरम में हिंदी शिक्षकों की दुर्दशा


विनोद बब्बर

पिछले दिनो पूर्वोत्तर के सीमान्त राज्य मिजोरम की राजधानी आईजोल के अपने एक सप्ताह के प्रवास के दौरान हमने अनुभव किया कि वह राज्य हिंदी से अछूता है। किसी भी व्यवसायिक स्थल को तो दूर सड़क पर लगे संकेत चिन्ह, नाम आदि भी घोषित त्रिभाषा फार्मुले को धता बता रहे थे। मिजोरम में दो केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं लेकिन उपलब्ध सीटों से आधे ही छात्र हैं। एक विश्वविद्यालय में शोध कार्य करने वाले दोनो छात्र विभिन्न प्रान्तों के हैं। कारण स्पष्ट है कि मिजोरम में स्कूली स्तर तक हिंदी की अनदेखी किया जाना है।
एक कार्यक्रम में मिजोरम के हिंदीसेवी डा. वी. आर. राल्टे ने इसके अनेक कारण बताये। यथा- मिजो ‘भाई’ शब्द का मनमाना अर्थ लगाते रहे हैं क्योंकि मिजो भाषा में ‘भ’ नहीं है। वे लोग ‘भ’ के बदले ‘व’ उपयोग करते हैं इसलिए ‘भाई’ उनके लिए ‘वाई’ हो जाता है जिसे वे ‘शत्रु’ मानते रहे हैं। एक अन्य मिजो विद्वान श्रीमती रिबाका ने स्वीकार किया कि उन्हें भी हिंदी और हिंदी बोलने वालों से नफरत थी लेकिन जब वे हिंदी के करीब आई तो अपनी मानसिकता पर प्रायश्चित हुआ। उन्होंने मिजोरम में धैर्यपूर्वक हिंदी को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।
अपने मिजोरम प्रवास के दौरन एक दिन मुख्य बाजार में पहुंचते ही अचानक तेज आंधी तूफान के साथ बारिश के कारण हमें ‘टीचर्स इन’ नामक भवन में शरण लेनी पड़ी जहां पहले से ही भारी भीड़ थी। मैं अपने साथी श्री एस.के.स्याल के साथ प्रथम तल स्थित कैन्टीन में गया तो सीढ़ियों में भी लोगों को बैठे देखा। हमने जानना चाहा कि आखिर ये कौन लोग हैं और चारों तलों पर हर तरफ क्यों बैठे हैं तो कैन्टीन के प्रबंधक ने बताया कि मिजोरम के हिंदी शिक्षक भूख हड़ताल पर हैं। उसने हमें मिजोरम सी.एस.एस. हिंदी शिक्षक संघ के सचिव श्री अजारिया ललथ्लेड़लियाना से मिलवाया। श्री अजारिया ने बताया कि केन्द्र सरकार हिंदीतर राज्यों में सीएसएस के अंतर्गत पांच वर्षों के लिए हिंदी शिक्षकों का वेतन देती है। उसके बाद यह जिम्मेवारी राज्य सरकार को निभानी होती है। यह योजना मिजोरम सहित अनेक राज्यों में लागू की गई लेकिन मिजोरम के अतिरिक्त सभी राज्य सरकारों ने तय अवधि के बाद इस जिम्मेवारी को संभाल लिया। बार- बार अनुरोध के बावजूद मिजोरम सरकार ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। अतः कार्यकाल (फरवरी, 2011 से फरवरी 2017) समाप्त होने के बाद इन 1305 शिक्षकों का वेतन बंद कर दिया गया है। हिंदी शिक्षण भी बंद होने के कगार पर है। ऐसे में हजारों बच्चों को हिंदी से जोड़ने वाले मिजोरम केे इन 1305 हिंदी शिक्षकों के सामने आंदोलन के अतिरिक्त कोई रास्ता शेष नहीं है। लगातार भूख हड़ताल के कारण 53 लोग अस्पताल में पहुंच चुके है। 4 महिला शिक्षिकाओं का गर्भपात हुआ तो शेष की स्थिति भी अच्छी नहीं है। केन्द्र और राज्य सरकार को भेजे प्रतिवेदनों की प्रति भी देते हुए बताया कि इन शिक्षकों की नियुक्ति डीपीसी (डिपार्टमेंट प्रमोशन कमेटी) ने की। लेकिन अब कहीं भी उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। मिजोरम विश्वविद्यालय में आयोजित समारोह में वहां कुलपति ने जरूर उनकी स्थिति पर चिंता व्यक्त की परंतु राज्य सरकार का मौन है।
हिंदी किसी जाति, धर्म की नहीं बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की अस्मिता से जुड़ी होती है इसलिएं हमारा देशभर के सभी हिंदीप्रेमियों से अनुरोध है कि वे अपने प्रभाव/ दबाव का उपयोग करते हुए राष्ट्रभाषा हिंदी के माध्यम से मिजोरम को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने में अपना योगदान दें। इन हड़ताली शिक्षकों की मांगों पर राज्य सरकार को विचार करना चाहिए।

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