मानवता, धार्मिकता और राष्ट्रीयता


डॉ. विनोद बब्बर

क्या भारत एक अंतर्राष्ट्रीय सराय है? घुसपैठियों का स्वर्ग है? क्या किसी को अपने घर में बसाने से पहले उसका चरित्र और व्यवहार नहीं देखना चाहिए? क्या आंख बंद कर दुनिया के किसी भी देश से आने वाले शरणार्थियों को स्वीकार कर लेना चाहिए? क्या मानवता राष्ट्रीयता से बढ़कर है? सरकार की प्रथम जिम्मेवारी उसके अपने नागरिक हैं या शरणार्थी? इन दिनों ऐसे अनेक प्रश्न उठ रहे हैं। कारण है म्यनमार केे रोहिंग्या शरणार्थियों को भारत में बसाने अथवा न बसाने पर चल रही बहस।
रोहिंग्या शरणार्थियों के बारे में भारत में बहुत जानकारी नहीं रही हैं लेकिन मीडिया में इनकी चर्चा कुछ वर्ष पूर्व बोधगया में हुए बम विस्फोटों के बाद से आरंभ हुई। इसलिए यह जानना जरूरी है कि ये रोहिंग्या हैं कौन? ये लोग हमारे पड़ोसी देश म्यांमार के अराकान प्रांत में रहते हैं लेकिन मूल रूप से ये बांग्लादेशी मुस्लिम हैं। भारत की स्वतंत्रता से कुछ समय पूर्व आजाद हुआ म्यांमार बौद्ध बहुल देश है। वर्तमान तनाव का कारण समझने के लिए हमे थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा।
दरअसल इस्लाम और बौद्ध जीवन दर्शन में बहुत भिन्नता है। बौद्ध अहिंसा के पुजारी हैं तो इस्लाम कुर्बानी का पक्षधर है। 16वीं शताब्दी में बर्मा (म्यनमार का पुराना नाम) के राजा ने पशु वध को अमानवीय बताते हुए इस पर पाबंदी लगाई। लेकिन ये लोग किसी भी कीमत पर उसे मानने को तैयार न थे। हालांकि कालांतर में कुछ बदलाव भी हुआ। यथा उनसे कहा गया कि वे पशुवध के बाद घर से निकलने से पहले यह सुनिश्चित करें कि कपड़ों पर खून के निशान न हो। ताकि खून देखकर दूसरे लोगों की भावनाएं आहत न हो। लेकिन वे इसे मानने को तैयार न थे।
तनाव के बावजूद रोहिंग्या मुसलमान पशुवध ज़रूर करते है। इससे वहां के लोगों में यह आम धारणा बनी कि वे स्थानीय लोगों की भावनाओं का कभी भी सम्मान नहीं करेंगे।
एक अन्य कारण यह कि शेष विश्व में भी इस्लाम का बौद्ध सहित सभी अन्य धार्मिक विश्वासों को अस्वीकार करना है। बुद्ध की विशाल मूर्तियां प्रमाण है एक समय बौद्ध मत अफगानिस्तान के बामियान प्रांत तक फैला था। लेकिन इस्लाम के उदय के बाद स्थिति बदली। मुस्लिम आक्रमणकारियों से परेशान होकर बौद्धों को वह क्षेत्र छोड़ना पड़ा। आक्रांता लगातार इन विशाल मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने में लगे रहे। अंततः 2001 में तालिबानी शासक मुल्ला उमर ने विश्व विरासत में शामिल उन प्रतिमाओं को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। इस घटना के बाद म्यनमार में खुशी मनाये जाने से वहां उनके प्रति ‘असहिष्णु’ होने की धारणा बनी।
भारत और शेष विश्व की तरह म्यनमार में भी रोहिंग्या मुसलमानों ने स्थानीय लोगों के साथ समन्वय नहीं किया। कट्टरता जारी रही। जिन क्षेत्रों में ये बहुमत में आ गये उन्होंने वहां के मूल निवासियों का सफाया करना आरम्भ कर दिया। इसी प्रकार की अनेक घटनाओं के बाद म्यनमार के लोग इन्हें विदेशी और देशद्रोही मानने लगे। क्योंकि वे म्यांमार को काटकर अपने अलग देश की मांग भी करने लगे। स्वाभाविक रूप से वहां की सरकार और सेना को इनके विरूद्ध कार्यवाही करनी पड़ी।
बेशक वर्तमान समस्या म्यनमार की है लेकिन हमारे मानवाधिकारी संगठन बहुत परेशान हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें आतंकवादियों तक के मानवाधिकारों की चिंता रहती है लेकिन निर्दाेषों और विपरीत परिस्थितियों में काम कर रहे सुरक्षाबलों के जवानों के मानवाधिकार याद नहीं रहते। ये संगठन रोहिंग्याओं को भारत में बसाने की मांग करते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत तक जा पहुंचे है। आश्चर्य कि बात तो यह है कि जिस कश्मीर में धारा 370 के कारण किसी दूसरे राज्य के भारतीय नागरिक वहां नहीं बस सकते। यहां तक कि वे कश्मीरी पंडितों को वहां फिर से बसाने को तैयार नहीं है परंतु वहां भी इन रोहिंग्या शरणार्थियों को अपने यहां शरण देने को तैयार है क्योंकि वे एक खास सम्प्रदाय के है।
वैसे यह कोई पहली बार नहीं है। इससे पूर्व भी करोड़ों बंगलादेशी घुसपैठियें अवैध रूप से यहां रह रहे हैं। पुलिस रिकार्ड साक्षी है कि ये लोग बड़ी संख्या में आपराधिक घटनाओं में शामिल रहते है। अनेक लोग अन्य काम भी करते है। पिछले दिनों नोएडा में घरेलू कामकाज करने वाली बंगलादेशी महिला के चोरी करते पकड़े जाने पर उन लोगों ने उस अपार्टमेंट पर पत्थरों से हमला किया। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अनेक बंगलादेशी घुसपैठियों ने भ्रष्ट व्यवस्था का लाभ उठाते हुए अपने वोटरलिस्ट में अपने नाम दर्ज करवाने के लिए आधारकार्ड तक बनवा लिये हैं। सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद राजनेता वोटबैंक के कारण कोई इनपर कार्यवाही नहीं करते। पिछली सरकार के एक मंत्री इन्हें स्थाई रूप से भारत की नागरिकता देने की वकालत करते रहे हैं। दुःखद पहलू यह है कि जो लोग इन्हें निकाल बाहर करने की वकालत करते थे वे सत्ता में आकर वे भी अब तक कुछ नहीं कर सके है।
इन्हें मानवता के आधार पर भारत में शरण देने के पक्षधरों से पूछा जाना चाहिए कि क्या राष्ट्रीयता का कोई अर्थ नहीं है? अगर नहीं तो फिर दुनिया के सभी देशों में पासपोर्ट वीजा क्यों? नागरिकता संबंधी इतने नियम क्यों? अगर आप मानवता के इतने पक्षधर है तो बताये कि आपके मन में आपने अपनी बस्ती में कूड़ा बीनने वाले बच्चों के लिए दया, ममता क्यों नहीं उमड़ती? आप उन बच्चो को अपनाये न परंतु कम से कम एक बच्चे की स्कूल फीस या अन्य खर्चे की जिम्मेवारी क्यों नहीं लेते? अपने देश के गरीबों,, बेघरों, कर्ज से परेशान आत्महत्या करते किसानों और उनके बेसहारा बच्चों के लिए आपकी मानवता क्यों सो जाती है? बिना पूछे, बिना पासपोर्ट के चुपचाप आपके देश में चोर की तरह घुसने वाले कल ंइसी तरह आपके घर में घुसे तो क्या आप मौन रहोगे? तब आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी?
आश्चर्य है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अािकारी भारत को इनकी मदद न करने के लिए कोसता है लेकिन अपने वीटों पावर प्राप्त देशों साधन संपन्न ब्रिटेन, अमरीका आदि कोे इन्हें अपने देशों में बसाने का निर्देश क्यों नहीं देता?
निसंदेह मानवता और धार्मिकता का महत्व है लेकिन राष्ट्रीयता स्वयं में एक आस्था है व राष्ट्र एक विशिष्ट पहचान। इतिहास साक्षी है कि हमसे अधिक मानवता, दया की कल्पना भी संभव नहीं है। हमने शत्रुओं तक पर दया दिखाकर बदले में धोखा खाया है। धर्म के आधार पर देश के बंटवारे के बावजूद हमने पंथनिरपेक्षता को अंगीकार किया। दुर्भाग्य की बात यह कि इस विषय पर हमे वे भी उपदेश देने की कोशिश कर रहे हैं जहां 70 वर्षों में अल्पसंख्यकों का प्रतिशत 20 से 2 पर पहुंच गया। जबकि हमारे यहां यह अनुपात औसत से अधिक बढ़ रहा है।
यह विडम्बना ही है कि भारत को मानवता सीखाने वाले म्यांमार हिंसा की प्रतिक्रिया में देश के कुछ स्थानों पर उन्मादी नारों संग हिसंक प्रदर्शन करते है। क्या उनकी मानवता की परिभाषा में अपनी मांगे मनवाने के लिए हिंसा करना जायज है? क्या देश को अपने मनमाने ढ़ंग से चलाने की कोशिश में लगे ये लोग यह नहीं जानते कि किसी भी राष्ट्र की प्रथम जिम्मेवारी अपने नागरिक हैं। स्वतंत्रता के 70 वर्षों बाद भी यहां सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सुनिश्चित नहीं कर सके हैं तो दूसरों की जिम्मेवारी क्यों और कैसे संभालें? क्या उन्होंने इस बात पर विचार किया कि दुनिया का सर्वाधिक अहिंसक समाज आखिर इतना उग्र क्यों हो गया कि रोहिंग्याओं का वहां रहना दूभर हो गया?

Bangladeshi Muslim activists of an Islamic group shout slogans as they gather in front of Baitul Muqarram National Mosque to protest against the deaths of Rohingya Muslims in the Rakhine state of Myanmar, in Dhaka, Bangladesh, December 18, 2016. REUTERS/Mohammad Ponir Hossain

वे लोग जो भारत सरकार और यहां की जनता पर अनावश्यक दबाव बनाने में अपनी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं, क्या उसका एक अंश उन लोगों को यह समझाने के लिए क्यों नहीं करते कि वे जहां भी रह रहे हैं, वहां के स्थानीय समाज के साथ समन्वय का अभ्यास बनायें। दूसरों कीे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और केवल स्वयं के विश्वास और मान्यताओं को ही ठीक और शेष सबको नकारने की मानसिकता को बदलने की उन्हें सीख क्यों नहीं दी जाती? उन्हें सीखाओं कि कोई भी धर्म राष्ट्र धर्म से बढ़कर नहीं हो सकता। निज धर्म के साथ-साथ राष्ट्र धर्म को भी अपने व्यवहार में लाना समय की मांग है। आखिर हमारा धार्मिक व्यवहार दुनिया के किसी दूसरे कोने से क्यों संचालित हो? उसका वहां की परिस्थितियों के अनुसार समन्वय क्यों न हो? यह सभी को समझना ही चाहिए कि किसी राष्ट्र का धार्मिकरण करने की सोच को त्याग कर अपने धर्म का राष्ट्रीकरण करना ही मानवता का विस्तार है। यदि हमारी धार्मिकता हमें आत्मकेन्द्रित बनाती है तो यह निश्चित है कि हम धर्म के संकुचित अर्थों से बंधे हैं। यदि म्यनमार के रोहिंग्या शरणार्थी और उनके भारतीय समर्थक अपने व्यवहार को मानवता के अनुकूल बना ले तो उन्हें कभी भी विस्थापित होने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। समय की मांग है कि सभी को कट्टरपंथी लोगों से दूरी बनाते हुए स्वयं को आधुनिक शिक्षा और राष्ट्रधर्म से जोड़ना चाहिए। यही मानवता है, यही धार्मिकता है और यही राष्ट्रीयता है। इसके विपरीत आचरण अस्वीकार्य है।

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