माँ के हाथ का स्वेटर


डॉ. विनोद बब्बर

बहुत पीछे छूट गई वो सलाईयां
स्वेटर बुनती मां की कलाईयां
प्रेम की बुनावट के अनूठे डिजाइंन
वात्सल्य में गुथे वे फंदे,
उन फंदो में रंग थे, गरमाहट थी
उन डिजाईनों में सजी थी
अपने बेटे के लिए अनन्त दुआएं
अपार खुशियां, संवेदनाएं
अब बाजार है, स्वेटर है, पैसे भी हैं
लेकिन नहीं है तो बस
मां का प्रेम, समर्पण, सदभावना
ओह!
हम बड़े क्यों हो गये हैं?
किस दुनिया में खो गये हैं?
तन्हाईयों, तनावों के करीब हो गये हैं
सच में हम बहुत गरीब हो गये हैं!

अचानक सर्दी बढ जाने पर तीन दशक पहले मां के हाथो बुना स्वेटर सिर पर ओढ़ा तो अनायास प्रकट हुई ये पंक्तियां। हो सकता है कि आप कहें कि स्वेटर सिर पर क्यों? इसलिए बताना चाहता हूं- स्वेटर छोटा हो गया है इसलिए रात्रि में सिर पर ओढ़कर सोता हूं।

No Comments