मतदाता जागरण गीत


प्रवीण आर्य

shankhnaad.2जागो जागो सोने वालो, तुम्हे जगाता फिरता हूँ |

लुटने पिटने से बच जाओ, शोर मचाता फिरता हूँ ||

निद्रा की अलसाई बाहें, थपकी दे दे सुला रही,

सुविधाओं की लोरी गा गा, सुख के झूले झुला रही |

नवयुग के निर्माताओं की, नींद उड़ाता फिरता हूँ ||

शक हूणों यवनों ने लुटी, इस धरती की अरुणाई,

निज निर्बलता के हाथों से, पिटती आई तरुणाई |

सन सैतालिस बासठ की, वो याद दिलाता फिरता हूँ ||

ननकाना कैलाश गवायाँ, ढाके की मलमल बंदी,

कश्मीरी पंजाबी रोये, व्याकुल बंगाली सिन्धी |

आंध्र बिहार असम घायल की, व्यथा सुनाता फिरता हूँ ||

केवल एक अहिंसा के बल, कब आज़ादी पाई है,

बलिदानी वीरों की वो, कुर्बानी ही रंग लाई है |

अखंडता की रक्षा हित, आवाज़ लगता फिरता हूँ ||

इतिहासी आँखों ने देखी, गैरों की हर मक्कारी,

मक्कारी के साथ घूमती, फिरती देखी गद्दारी |

गद्दारों पर गुरु गौबिंद की गाज गिराता फिरता हूँ ||

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