अच्छे दिन कैसे आयेंगे


डॉ. अंजनी झा

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‘रंगभूमि’ (1925) का सूरदास उजबक- सा दिखता है, पर पहला आम आदमी है जो अपनी जमीं बचाने के लिए औद्यौगिक विकास के नाम पर ‘लूट’ और राजनैतिक छल-छद्म से दिलेरी के साथ संघर्ष करता है |
सोची-समझी रणनीति के तहत सरकार की कार्यप्रणाली किसान वर्ग को कंगाल बना रही है | बड़ें किसानों को कभी भी सरकार की ऐसी नीतियों से नुकसान नहीं होता है | छोटे और मझोले किसान हमेशा प्रभावित होते रहे हैं | सरकार की शहर में भीड़ कम करने की नीति का भी नये भूमि अधिग्रहण कानून से बड़ा पलीता लग रहा है | गाँव के लोगों को गाँव में ही रोजगार मिले, यह केवल चुनावी नारा बन कर रह गया |
जान-बूझकर सरकार देश की कृषि व्यवस्था को चौपट करने पर आमादा है | भारत की पूरी व्यवस्था कृषि पर टिकी है | लोक, संस्कृति, संस्कार, सामाजिक ताना-बाना, परिवार व्यवस्था सब कुछ कृषि के इर्द-गिर्द घूमती है | आज़ादी के बाद भी किसानों को कुतरने का काम थम नहीं रहा है | असंगठित किसान तंत्र और नेतृत्व की घोर कमी ने किसान को धीरे-धीरे भूमिहीन और मजदुर बना रहा है |
सब्सिडी, चकबंदी, मुकदमेबाजी, बीज, खाद, सिंचाई, बाज़ार में कु-व्यवस्था को दूर करने में सरकार की दिलचस्पी न होने के कारण सैकड़ों किसान कर्जदार होकर आत्महत्या करने को विवश हैं | तेजी से कृषि के प्रति उदासीन होकर लोग ‘कुछ’ पैसे के लिए शहर की ओर दौड़ लगा रहे हैं | ऐसे में बज़ट ने फिर रुलाया | नये भूमि अधिग्रहण कानून ने संप्रग सरकार से कहीं ज्यादा कठोरतापूर्ण शिकंजा
कसा | हजारों किसान-मजदूरों की पैदल यात्रा और संसद का धेराव के बावजूद सरकार कुतर्कों में व्यस्त है | कारपोरेट घरानों के फायदे के लिए बना कानून देर-सवेर भारत को खोखला और कंगाल बना देगा |
शिवसेना इस कानून को जमीं निगलने वाला बकासुरी कानून पहले ही कह चुकी
है | उद्धव अपने नेताओं को निर्देश के चुके हैं कि वे गाँव-गाँव में जाकर किसानों को समझाएं कि भाजपानीत सरकार का यह विधेयक कितना नुक्सानदेह है | एकता परिषद् के बैनर तले जामा प्रदर्शनकारियों में मध्यप्रदेश सहित 17 राज्यों के किसान शामिल थे | नेतृत्व करने वालों में पी.वी. राजगोपाल और के. एन. गोविन्दाचार्य प्रमुख रूप से थे | उधर सरकार को घेरने दिल्ली में जमे अण्णा हजारे ने कुपित स्वर में कहा कि सरकार इस विधेयक को लालर ग्रामसभा को खत्म करना चाहती है और फिर लोकतंत्र को | उन्होंने कहा कि नये कानून के तहत अगर किसानों की ज़मीन अधिग्रहित होती है तो वह तब तक अदालत नहीं जा सकता जब तक सरकार उसे इसकी अनुमति नहीं दे देती |
सरकार का कहना है कि हम किसानों के हित में यह कानून लाए हैं | हजारों की तादाद में दिल्ली में जुटे आदिवासी-वनवासी किसानों को शंका है कि दबाव का असर भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ बदलाव की रस्म अदायगी तक ही सीमित न रह जाए | ‘हमें भूमि अध्यादेश नहीं भूमि पर अधिकार चाहिए’ और ‘जल, जंगल और जमीन, ये हो जनता के अधीन, जैसे नारों की गूंज से प्रदर्शनकारियों की थकान मिटती रही | भूमि अधिकार चेतना यात्रा में दस करोड़ लोगों के प्रतिनिधि शामिल थे | चौतरफा घिर चुकी सरकार ने बचाव में कहा कि राज्य सरकारों की भी यहीं इच्छा थी | सरकार का कहना है कि 32 राज्य सरकारों और केन्द्र शासित राज्यों ने केन्द्र को ज्ञापन देकर कानून में संशोधन की मांग की थी और कहा था कि इस कानून के चलते विकास कार्य असंभव हो रहे हैं |
कांग्रेस ने किसानों की जमीन का अधिग्रहण करके कंपनियों को देने के लिए हर हथकंडे का इस्तेमाल किया | स्पेशल इकनोमिक जोन (सेज) के नाम पर किसानों की हजारों हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित कर उद्योगों को दी गई | संसद की स्थाई समिति की रिपोर्ट और सी.ए.जी. ने इस बात का खुलासा किया कि एसईजेड के नाम पर किसानों की जो बेशकीमती जमीन कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के समय अधिग्रहित की गई, उसमें से लगभग आधी का ही इस्तेमाल हुआ, जबकि आधी जमीन उद्योग जगत दबाकर बैठ गया | आज़ादी के छियासठ साल बाद किसान-आदिवासियों के राजनैतिक- सामजिक संगठनों और जागरूक नागरिक समाज के सतत प्रयासों से ब्रिटिश काल का भूमि अधिग्रहण कानून (1894) पिछली सरकार के समय संशोधित किया गया | आश्चर्य है कि इतने सालों बाद भी बदस्तूर जारी था और संशोधित हुआ तो कारपोरेट जगत के हित को ध्यान में रखकर किया गया | यह साकार तो चार कदम और आगे निकलकर पूंजीपतियों की गोद में जा बैठी | हालाँकि, सितम्बर, 2013 में संसद ने जो संशोधित भूमि अधिग्रहण अधिनियम पारित किया, वह नितांत दोषमुक्त नहीं था | किसान नेताओं और नागरिक-सामाजिक संगठनों ने तर्क दिए थे कि इसमें भूमि के स्वामी किसानों, आदिवासियों के लिए समुचित मुआवजे का प्रावधान नहीं हो पाया है | इसमें ऐसे चिर-रस्ते अब भी थे जिससे होकर सरकार अपनी चहेती निजी कंपनियों को लाभ पहुंचा सकती थी | सिंचाई परियोजनाओं को जहाँ इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया था, वहीँ पूर्ववर्ती अधिनियम के सदृश यह भी औद्यौगिक गतिविधियों और व्यापार-वाणिज्य की तरक्की के नाम पर निजी कंपनियों के लिए किये जाने वाले भूमि अधिग्रहण को हरि झंडी दिखता था | अपनी पुश्तैनी जमीन से बेदखली के खिलाफ ग्रामीण आबादी को 2013 का अधिनियम जो संरक्षण और मुआवजे की क्षतिपूर्ति देता था, उसके प्रमुख प्रावधानों से इस अध्यादेश के जरिये सरकार ने पल्ला झाड लिया | मूल अधिनियम में विकास परियोजना से प्रभावित होने वाली अधिकांश आबादी की स्वीकृति के अभाव में भूमि अधिग्रहण पर पाबंदी थी इसमें यह प्रावधान था कि निजी क्षेत्र की परियोजना के लिए अस्सी फीसदी प्रभावित आबादी की मंजूरी और सार्वजनिक-निजी भागीदारी वालि परियोजना के लिए सत्तर प्रतिशत प्रभावित आबादी की स्वीकृति के, भूमि का अधिग्रहण औने-पौने दामों पर कर सकती है | अधिनियम में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आरम्भ करने से पूर्व विकास परियोजना के कारण होने वाली संभावित क्षतियों का सामाजिक आकलन करना अनिवार्य था | लेकिन यह अध्यादेश सामाजिक क्षति आकलन की अनिवार्यता को भी ख़ारिज कर देता है | खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अधिनियम में यह भी निर्धारित था कि दो या दो से ज्यादा फसलें देने वाली उर्वर भूमि को किसी भी सूरत में अधिग्रहित न किया जाए, लेकिन अध्यादेश में अधिग्रहित भूमि को उपयोग में लेने की छूट-अवधि की मियाद भी बढ़ा दी 1
गई | भूमि की इस बर्बादी को रोकने के लिए अधिनियम में यह प्रावधान रखा गया था कि जिस उद्देश्य निर्धारित समयावधि में भूमि का उपयोग अनिवार्य होगा, अन्यथा भूमि को मूल मालिक को लौटना पड़ेगा | भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धाराओं का उल्लंघन करनेवाले अधिकारियों के खिलाफ जुर्माने के प्रावधान भी इस अध्यादेश के द्वारा निरस्त कर दिए गये | सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम (2013) के किसान-आदिवासी हितैषी प्रावधानों पर पानी फेर दिया |
सरकार की इस मुहीम को उद्योग जगत का पूरा समर्थन हासिल है | संगठन फिक्की की अध्यक्ष व ललित हास्पिटल समूह की सी.एम.डी. ज्योत्सना सुरि के मुताबिक, “फिक्की लगातार इस मुद्दे को अथात रहा है कि भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव किया जाए | इसे व्यावहारिक और सबके लिए बराबरी का बनाया
जाए |
जगजाहिर है कि पश्चिक बंगाल में तीन दशक से चले आ रहे वामदलों के गढ़ को ध्वस्त करने के लिए ममता बनर्जी ने अपना सबसे बड़ा हथियार सिंगूर और नंदीग्राम को बनाया था | नोएडा के आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण ने 2012 में मायावती के राजनैतिक अवसान की पटकथा लिखी | पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के राजकुमार राहुल ने भट्ठा-पारसौल गांवों में किसानों के समर्थन में गिरफ्तारी दी थी | तब की विपक्षी भाजपा के राजनाथ सिंह और अरुण जेटली ने गाज़ियाबाद में किसानों के मुद्दे पर गिरफ़्तारी दी थी | इस वर्ष 7 जनवरी को अनूपपुर (मप्र०) जिले के जैतहरी में भूमि अधिग्रहण को लेकर गोलीबारी में तीन किसान और छः पुलिसकर्मी घायल हो गए थे | इलाहाबाद के पास करघाना में बिजलीघर बनने के विरोध में धरना-प्रदर्शन लंबे समय से जारी
है | साकार बार-बार दोहराती रही है कि अध्यादेश ग्रामीण भारत का बेहतर ढंग से ख्याल रखता है | अगर यह बयान सच होता तो जज़रों किसान सडकों पर न
होते | अत: आवश्यकता इस बात की है कि सरकार इस अध्यादेश को वापिस ले | और सबकी सहमति से एक नया भूमि अधिग्रहण बिल लाये |

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1 Comment

  1. Balram Misra says:

    It is certanly a politically motuvated article, unmindful of the fact that village level industries will need land. The author should have given importance to industries also to see that cash flow takes place in villages. The land acquisition should in fact be called land purchase, which may be redefined and modified. Let government leave the issue to farmers of villagers, and vote whether they want developmental activities to take place , or just the profession of farming at the mercy of luck.Let the issue be depoliticised and kept away from cheap popularity, and it will be found that our villages do need ways for self sustenance and, hence, industrialization.Two most important factors are essential for industrialization, money and land.Farmers have no money, and the industrialists have no land. Some middle path will have to be invented in overall interest of the Nation, rather than condemning the industrialists, and Modi government.One option may be taking land on lease, say for 50 years, with farmers’ stake in prominence. Farmers may have active participation in both, PASEENAA and PAISAA, i.e. labour and money, by having shares and job opportunities. That the desired develpoment of our nation will not possible unless importance of industries is is recognized was enunciated by Maan. Dattopant ji Thengadee, the founder of Bharateeya Mazdoor Sangh and the Bhaarateeya Kisaan Sangh decades back. As the true seer of the interests of the Nation he had given us a wonderful doctrine in a cyclic form : Industrialize Nation, Nationalize Labour, Labourize Industries. Nation will have to be Industrialized to enable villagers be rich. Labour will have to be Nationalized to enable them keep the overall interessts of the Nation and avoid the populist measures often adopted by anti-nationalist elements flourishing on green pastures of our land, Industries will have to be Labourized with the understanding of of getting fortune for their PASEENAA; with the slogan given by BMS; DESH KE HIT MEN KAREN GE KAAM, KAAM KE LENGE POORE DAAM. Here the term Labour stands for Farmers also. Nation will have to be Industrialized for growth. Our friend China gives us an instance. It is quite unfortunate for the Nation as a whole that the politically ambitious groups of many pseudo- secularists, misguided socialists, and a few followers of the faded communism appear to be hired by certain anti- farmer, anti- industries, and anti- Indian persons to make noise on the issue with the sole motive of legpulling of Narendra Modi, who wants to make India as per the dreams of Dattopant Thengadee and Deen Dayaal Upaadhyaaya. A firm and ruthless democratic step will have to be taken for the development of the Nation.