बैंकों का हाल: मालदारों पर रहम, किसानों पर सितम


डॉ. अंजनी कुमार झा

vijay-4एक तरफ तो सरकारी बैंक विजय माल्या जैसी बड़ी मछलियों को लेकर नरम हैं, दूसरी तरफ किसानों की कमर तोड़ रहे हैं। छोटे किसान लगातार परेशान हैं, लेकिन सरकार और बैंकों की उनमें कोई दिलचस्पी नहीं है। समस्या यह है कि राजनीतिक दलों के लिए भी यह कोई मुद्दा नहीं है। ऐसे में हर समस्या की तरह ही इसका भी हल सुप्रीम कोर्ट ही है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले ही महीने कर्ज वसूली के मामले में रिजर्व बैंक, राज्य सरकारों और केंद्र को फटकार लगाते हुए पूछा था कि आखिर क्यों अलग-अलग सरकारी बैंकों से मोटी रकम लेकर बैठे पूंजीपतियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई, जबकि गरीब किसानों से कर्ज वसूली के लिए उन्हें खेत तक बेचने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, 29 बैंकों के करीब 1.4 लाख करोड़ रुपये एनपीए हैं। अदालत ने इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश भी दिए है। हालांकि, यह काम सरकार और बैंकों का है, लेकिन करना सुप्रीम कोर्ट को पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा कि बकायेदारों से कर्ज वसूलने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? उनके नामों को सार्वजनिक करने में क्या दिक्कत है? इस पर बैंक अधिकारियों की प्रतिक्रिया थी कि बड़े बकायेदारों के नामों का खुलासा करने से अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। इस हास्यास्पद दलील के कारण ही पूंजीपति करोड़ों डकार जाते हैं और किसान 10-20 हजार कर्ज लेकर भी आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाते हैं। इसी भ्रष्ट व्यवस्था के कारण महंगाई और बेरोजगारी है। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने बड़ी सर्जरी की बात कही, लेकिन यह कब होगी यह नहीं बताया।

1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के कारण उम्मीद जगी थी, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण स्थिति उल्टी होती जा रही है। दूसरी तरफ निजी बैंकों का एनपीए न के बराबर है और वे काफी लाभ में हैं। हड़ताल और तालाबंदी से भी मुक्त हैं। कॉपोरेटिव बैंकों का शुरू में तो खूब जोर रहा लेकिन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने की वजह से अब जबर्दस्त घाटे में चल रहे हैं। ऐसे में गरीबों का कोई नहीं है और वे फिर महाजनों के चक्कर में फंसने के लिए अभिशप्त हैं।images

दिलचस्प बात है कि सबसे बड़ा सरकारी बैंक एसबीआई करीब साढ़े 41 हजार रुपये कर्ज को वापस पाने की उम्मीद छोड़ चुकी है। आरटीआई के जरिए मांगी गई जानकारी पर बैंकों ने जो जवाब दिया उसका आंकड़ा चौंकाने वाला है। हालांकि, कुछ बैंकों ने डूबी राशि के बारे में जानकारी देना भी उचित नहीं समझा। सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व बैंक को निर्देश दिया है कि वह 500 करोड़ रुपये से अधिक राशि का चूना लगाने वाले बकायेदारों के बारे में सूची उसे सौंपे।

10 साल में वसूली बनाम रिकवरी (सभी राशि करोड़ रुपये में )

बैंक लोन माफी रिकवरी
एसबीआई 41,641 11,566
बैंक ऑफ बड़ौदा 9929 3177
इलाहाबाद बैंक 7259 204
आईडीबीआई 7174 1471
कॉर्पोरेशन बैंक 3732 691
देना बैंक 3350 1170
बैंक ऑफ महाराष्ट्र 3031 1099
स्टेट बैंक ऑफ पटियाला 2197 475
स्टेट बैंक ऑफ बिकानेर
एंड जयपुर 2001 403
पंजाब नेशनल बैंक 1539 595

मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने डिफॉल्टरों पर कार्रवाई को लेकर 2003 में याचिका दायर की थी। उन्होंने रिजर्व बैंक के उस सर्कुलर की भी निंदा की, जिसमें बैंकों को विलफुल डिफाल्टरों के नाम सार्वजनिक नहीं करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशांत भूषण ने कहा कि केवल 2015 में बैंकों ने और 40000 करोड़ रुपये कर्ज को बट्टे खाते में डाल दिया।

कर्ज चुकाने के मामले में पांच बड़े कारोबारी समूहों की हालत बेहद खराब है। जयप्रकाश समूह 65% कर्ज चुका नहीं पा रहा है। इसी तरह लैंको 38%, जीएमआर 37%, एस्सार 36% कर्ज नहीं चुका पा रही हैं। ब्रिटेन में कोरस के अधिग्रहण के नौ साल बाद भी टाटा स्टील पर 9.8 अरब डॉलर यानी करीब 65 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। मार्च 2015 तक टाटा ग्रुप की सभी कंपनियों पर दो लाख करोड़ से अधिक का कर्ज था। इससे साफ है कि जिन भारतीय समूहों ने कर्ज के दम पर कारोबार बढ़ाने की कोशिश की, वे आज पतन का सामना कर रहे हैं।

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