बस्तर, बंदूक और इन्द्रू केवट का रास्ता


राजीव रंजन प्रसाद

यह मुख्यधारा किस चिड़िया का नाम है और कहाँ पायी जाती है? महानगरों को भी बहुत निकटता से देखा है, जहाँ हमेशा रहने वाली बिजली, जगमग सड़कें, मेट्रो और बसों के कॉरीडोर उस लुभावनी दुनिया का उदाहरण बने हुए हैं जिसको कथित तरक्की का प्रतिमान माना जाता है। ऐसे में आज भी ढिबरी युग में जी रहे हमारे गाँवों को, जिन्हें नक्शों तक में जगह नहीं मिलती उनके महत्व, उनके गौरव और योगदानों को भुला दिया जाना स्वाभाविक है। ठीक है कि सिविल सर्विसेज में सफलता पाने के लिए आपका यह जानना आवश्यक है कि महात्मा गाँधी कौन थे और इन्द्रू केवट का परिचय रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसीलिए यह भी कडुवा सत्य है कि गाँधीवाद का शाब्दिक अर्थ पकड़ कर बैठ जाने वाली हमारी पीढ़ी उसके मर्म तक नहीं पहुँच सकी चूंकि उसने राजनेताओं को महात्मा गाँधी की समाधि पर फूल चढाते देखा है किंतु इन्द्रू केवट के मृतक स्मारक की उपेक्षा उसे ज्ञात ही नहीं है।

indru कौन है इन्द्रू केवट? इस प्रश्न का उत्तर जानने की इच्छा रखने वालों से यह अपेक्षा भी अवश्य है कि क्या और कहाँ है बस्तर? लाल-आतंकवाद के साये में पिसते बस्तरिया आदिवासी, शहरी विश्वविद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने वाले कथित बुद्धिजीवियों को बंदूख से क्रांति करते प्रतीत होते हैं। उनकी फंतासियाँ इस अंचल की पीड़ा को शब्दों की चिपचिपी चाशनी बना देती है जिसमे रेलवे स्टेशन पर बैठ कर अंग्रेजी उपन्यास पढ़ने वाला युवा चिपकता जरूर है। हमारी बुद्धिजीविता वस्तुत: क्रूर राजनीतिज्ञ है और उनसे किसी भी परिस्थिति की सही विवेचना पाने की अपेक्षा रखना वृथा है। अगर ऐसा न होता तो गणपति और रमन्ना की कहानियाँ क्रांति की परिचायक नहीं बना दी गयी होतीं। फिर तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कथित बहसों में इन्द्रू केवट के उस योगदान पर भी चर्चा हो गयी होती जो एक समय बंदूख से इतर क्रांति की मशाल जलाये आदिवासी समाज को जगाने पैदल पैदल भटकता रहा करता था।

इन्द्रू केवट की कहानी वर्तमान बस्तर संभाग के उत्तरी क्षेत्र से जुड़ी है जो कभी कांकेर रियासत का हिस्सा हुआ करता था। अविश्वसनीय किंतु सत्य है कि दुर्गू कोंदल जैसे छोटे से गाँव के निवासी इन्द्रू केवट ने महात्मा गाँधी के सत्याग्रही मार्ग को जीवन में उतार लिया तथा वे इस आदिवासी अंचल में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के सूत्रधार बने। साधारण सी धोती और हाँथ में डण्डा यही उनका वेश और सामान था जिसके सहारे वे गाँव गाँव घूमते तथा गाँधी के आदर्शों व स्वतंत्रता की आवश्यकता जैसी बातों से ग्रामीणों को परिचित कराया करते थे। बात वर्ष-1933 की है जब महात्मा गाँधी दुर्ग आये हुए थे। उस समय यह निर्धन, आदिवासी सत्याग्रही अपनी लाठी टेकता हुआ पैदल ही निकल पडा दुर्गू कोंदल से दुर्ग तक; वह भी नंगे पाँव। आदिवासी अंचल के सत्याग्रही इन्द्रू केवट की मुलाकात जब महात्मा गाँधी से हुई और वे उनके समर्पण भाव तथा ओजस्विता को देख कर अत्यधिक प्रभावित हुए थे। गाँधी जी से हुई इस मुलाकात के बाद इन्द्रू केवट बस्तर के गाँव-गाँव घूम कर आदिवासी समाज को स्वतंत्रता के मायने समझाने लगे।

इन्द्रू केवट के कारण ही कांकेर रियासत ने राष्ट्रीय राजनीति का अर्थ जाना और तिरंगे से परिचित हुए। वर्ष 1944-45 की बात है जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों को धन, लकडी, अनाज आदि की आवश्यकता पडी। ऐसे में बस्तर और कांकेर रियासतें मुख्य रूप से उनके द्वारा शोषित हुईं। केवल कांकेर रियासत से ही अंग्रेज उस दौरान 41242 वर्गफुट उत्तम किस्म का सागवान कटवा कर ले गये थे। इसके अलावा आदिवासी किसानों से कम दाम में खरीद करवा कर लगभग अट्ठारह हजार मन धान और पच्चीस हजार रुपये राजस्व के रूप में वसूला गया था। वर्ष 1945 में नयी भू-राजस्व वयवस्था के तहत अनेक गाँवों को जोडा गया और हंटर के बल पर किसानों से उनकी फसल छीनी जाने लगी। इन्द्रू केवट ने तब लगान मत पटाओ का नारा दिया और राजा तथा अंग्रेजों के विरोध में जुट गये। खण्डी नदी के पास पातर बगीचा में सत्याग्रहियों की पहली बैठक हुई जिसमें पहली बार चरखा युक्त झंडा प्रतीक बना। इस बैठक में लगभग डेढ़ हजार आदिवासी प्रतिनिधि एकत्रित हुए थे। अहिंसक आन्दोलन जोर पकड़ने लगा और इसमे गुलाब हल्बा, पातर हल्बा, कंगलू कुम्हार जैसे अनेक आदिवासी उनके साथ जुड़ने लगे।

इस आदिवासी सत्याग्रही के गतिविधियों की जानकारी जैसे ही मिली तब अंग्रेजों का दबाव राजा पर पडा और इन्द्रू केवट की गिरफ्तारी का वारंट निकाला गया। जेल से बचने के लिए इस उन्होंने बड़ी ही युक्ति से काम लिया। धोती ही तो एकमात्र आवरण था उनका और बाकी शरीर पर उन्होंने ‘टोरा का तेल’ मल लिया। सिपाहियों ने उन्हें पकड़ा जरूर लेकिन वे फिसल कर उनकी पकड़ से छूट निकले और भाग गये। आन्दोलन बढ़ा तो लगभग तीन सौ गाँवों के किसान सत्याग्रही हो गये और अब पूरी ताकत राजा को लगानी पड़ी जिसके पश्चात इन्द्रू केवट और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पैदल ही रियासत की राजधानी कांकेर तक लाया गया। इन्द्रू केवट और उनके 429 किसान साथियों पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। अब समय सत्याग्रह की ताकत से परिचित होने का था। गाँव गाँव से लगभग दो सौ बैलगाड़ि यों में भर कर किसान इन्द्रू केवट और उनके साथियों को छुड़ाने कांकेर पहुँच गये। आन्दोलन को इस तरह फैलते देख अंग्रेज सकते में आ गये और उन्होंने आन्दोलनकारियों से समझौता कर लिया। राजद्रोह के मुकदमे वापस ले लिए गये तथा इन्द्रू केवट अपने साथियों के साथ रिहा कर दिये गये।

इन्द्रू केवट जब तक जीवित रहे बस्तर के गाँधी बन कर स्वतंत्रता आन्दोलन को अपना बहुमूल्य योगदान देते रहे। इन्द्रू केवट के गाँव में आज भी पोते मौजूद हैं। मैं उनके घर पहुँचा तो इस बात को जान कर बहुत दु:ख हुआ कि परिजनों के पास इन्द्रू केवट का एक पेंसिल स्केच छोड़ कर कोई भी तस्वीर, दस्तावेज अथवा जानकारी मौजूद नहीं है। परिजनों को सरकार से मदद की अनेक अपेक्षायें हैं। गाँव की पहचान ही इन्द्रू केवट से है और इसी कारण गौरव ग्राम मानते हुए प्रवेश द्वार बनवाया जा रहा है। गाँव के बाहर नदी के किनारे इन्द्रू केवट का आदिवासी परम्परा के अनुरूप बनाया गया मृतक स्मृति स्मारक अभी ठीक ठाक हालत में नदी के किनारे अवस्थित है।

काश कि इस मृतक स्मारक की महत्ता का अंदाजा हमारी पीढ़ी को होता तो वे अंतर कर पाते कि क्रांति और सत्याग्रह के वास्तविक मायने क्या हैं? व्यवस्था परिवर्तन का सही रास्ता क्या है? मुद्दों और जनपक्षधरता की लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है तथा नक्सलवादी बंदूकें किसलिए अनुचित है। बस्तर की आत्मा और उसकी जिजीविषा को समझने के लिए इन्द्रू केवट के रास्ते से हो कर गुजरना ही होगा।

(राजीव रंजन प्रसाद ‘आमचो बस्तर’ उपन्यास के लेखक हैं)

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