मेरा भी नहीं, तेरा भी नहीं, तो फिर किसका है यह बजट


भुवन भास्कर

 

imagesअरुण जेटली के बजट पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और मज़ेदार बात यह है कि ये दोनों ही प्रतिक्रियाएं अपने-अपने पक्ष के एक्स्ट्रीम पर हैं। पहली प्रतिक्रिया उस वर्ग की ओर से आ रही है जिसके लिए केंद्र सरकार का बजट सस्ता-महंगा और टैक्स छूट की सुर्खियों से ज़्यादा कुछ नहीं है। इसे आम आदमी कहते हैं। यह आम आदमी इस बजट से बहुत निराश है। टैक्स स्लैब में बदलाव नहीं हुआ, छूट की सीमा नहीं बढ़ी, सर्विस टैक्स में बढ़ोतरी हो गई। बाप रे बाप! यूपीए ने तो 10 साल में नर्क फैलाया था, इस मोदी सरकार ने तो 10 महीने में ही आम आदमी की कमर तोड़ दी। तो यह पहले वर्ग की प्रतिक्रिया का अंदाज़ है।
दूसरा वर्ग वह है जो केंद्रीय बजट को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा तय करने का दीर्घकालिक अहम दस्तावेज मानता है। इस वर्ग ने अरुण जेटली के पहले पूर्ण बजट को ऐतिहासिक और अभूतपूर्व करार दिया है। फर्स्टपोस्ट के एडिटर आर जगन्नाथन ने अपने आलेख में जहां उन 12 सुधारों की गिनती की है, जिसके कारण यह बजट असाधारण है, वहीं अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने इसे आज तक पेश तमाम बजटों में सबसे क्रांतिकारी करार दिया है। विभिन्न संस्थानों से जुड़े अर्थशास्त्रियों, जैसे अभीक बरुआ, राधिका राव, निलाया वर, अनंत नारायण, सचिन मेनन, अनिमेष श्रीवास्तव आदि ने इसे ग्रोथ का बजट बताया है। पत्रकार और अर्थशास्त्री स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर ने इसे ग्रोथ और निवेश के लिहाज से बहुत सकारात्मक बजट कहा है।
अब सवाल यह है कि अगर यह बजट आम आदमी के लिए इतना खराब है, तो देश के लिए इतना अच्छा क्यों है? देश के नागरिकों और देश के हितों के बीच इतना डिस्कनेक्ट क्यों है? या क्या सचमुच यह डिस्कनेक्ट है? एक समस्या तो मुझे यह समझ में आती है टीवी समाचारों के युग में प्रतिक्रियाएं देने और पाने की हड़बड़ी कुछ इस तरह तथ्यों पर भारी हो जाती है कि गंभीर विश्लेषण की ज़रूरत और महत्व, दोनों ही पीछे छूट जाते हैं। मैं एक बिज़नेस जर्नलिस्ट के तौर पर पिछले 8 सालों से सक्रिय तौर हर बजट से नज़दीकी से जुड़ा रहा हूं, लेकिन आज भी बजट भाषण ख़त्म होते ही सार्वजनिक तौर पर प्रतिक्रिया देने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। स्पीच को एक बार फिर देखना पड़ता है, एनेक्सर में लिखे फाइन प्रिंट को समझना पड़ता है और फिर भी कई बातें समझ नहीं आतीं तो विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का विश्लेषण पढ़ना, सुनना होता है। लेकिन फेसबुक और ट्विटर पर पोस्ट और कमेंट डालने की होड़ इतनी प्रबल है कि बजट ख़त्म होते-होते रेलवे स्टेशन पर खड़े और बसों में सफर कर रहे लोग भी बजट पर अंतिम निर्णय देने से नहीं चूकते। टीवी की दुकान चलाने की मज़बूरी ऐसी है कि बाज़ार में शॉपिंग कर रही किसी भी महिला को पकड़ लिया जाता है। वो बेचारी कहती है कि मुझे तो कुछ पता ही नहीं, तो रिपोर्टर अपने डेस्क से की गई ब्रीफिंग के आधार पर उसे 3 प्वाइंट बताता है और फिर कहता है अब बताइए, कैसा है ये बजट आपके लिए। और फिर मैडम पूरे बजट का पोस्टमार्टम कर डालती हैं। शाम होते-होते ये कोरस इतना बढ़ जाता है कि तमाम विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री और जानकारों का गूढ़ विश्लेषण नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बन जाता है।
और अब बात उस डिस्कनेक्ट की, जिसकी मैंने पहले चर्चा की। देश के नागरिकों का हित और देश का हित एक-दूसरे से अलग कैसे हो सकते हैं। इसका श्रेय मैं कांग्रेस पार्टी को देता हूं। कांग्रेस के 60 सालों के शासन ने इस देश के लोगों में एक अजीब सी हीन भावना भर दी है। जवाहरलाल नेहरू और नरसिम्हा राव को छोड़ कर कांग्रेस के किसी प्रधानमंत्री ने देश के विकास के लिए दूरगामी योजना बनाने का काम नहीं किया। जनता के सामने तुरत-फुरत में रोटियां फेंक कर वोट लेने की कांग्रेस की रणनीति ने यहां कई पीढ़ियों को इस मानसिकता का बना दिया कि वह सरकार की समीक्षा केवल इस आधार पर करती है कि उसके अपने अकाउंट का बैंक बैलेंस रातोंरात कितना बढ़ गया। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में तो यह सरकारी प्रवृत्ति आपराधिक स्तर तक पहुंच गई। किसानों की ऋण माफी से लेकर मनरेगा के तहत घोर अनुत्पाद कार्यों के नाम पर धन की बंदरबांट कर भ्रष्टाचार के विकेंद्रीकरण के कई नायाब उदाहरण इस सरकार ने पेश किए। और जनता मस्त रही। इसलिए कि उसका बैंक बैलेंस बढ़ रहा था, उसकी जेब में पैसे आ रहे थे। क्या हुआ जो देश की जीडीपी ग्रोथ रेट 9 से फिसल कर 4.5 फीसदी पहुंच गई, क्या हुआ जो महंगाई दर दहाई अंकों में बनी रही, क्या हुआ जो बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई, क्या हुआ जो तीनों रक्षा सेनाओं के प्रमुख गोपनीय पत्र लिख कर सरकार से गुहार लगाते रहे कि हमारी सेनाएं संसाधनों के अभाव में अंदर से खोखली हुई जा रही है, क्या हुआ जो हम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लाचार और बेचारे की तरह कोने में खड़े रहने लगे, क्या हुआ जो म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव जैसे हमारे पड़ोसी राष्ट्र चीन के चारागाह बन गए, क्या हुआ जो हमारी अपनी मैन्युफैक्चरिंग पिछले 10 साल में तबाह हो गई और हमारे बाज़ार चीनी उत्पादों से अटे पड़े हैं, क्या हुआ जो कोयला के विश्व के सबसे बड़े भंडार होने के बावजूद हमारी हज़ारों मेगावाट की क्षमता तैयार होने के बाद भी इस्तेमाल नहीं की जा पा रही है, क्या हुआ जो 20 किलोमीटर प्रतिदिन सड़कें बनाने का दावा करने वाली सरकार 3 किलोमीटर सड़क ही प्रतिदिन बना पा रही है। तो सोनिया गांधी के निर्देशन और डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने यह कमाल कर दिया कि इस देश के नागरिकों और देश के हित में फ़र्क पैदा हो गया।
अरुण जेटली के बजट पर आम लोगों की प्रतिक्रिया इस फ़र्क का नतीजा है। इस बजट में निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर का माहौल ठीक करने के लिए ज़बर्दस्त इनोवेटिव कदम उठाए गए हैं। रोजगार के मौके बढ़ाने और माइक्रो तथा स्मॉल स्केल इंडस्ट्री के लिए कई फैसले लिए गए हैं। टैक्स में सीधे छूट नहीं दी गई है लेकिन बचत को बढ़ावा देने के लिए बड़े इनसेंटिव रखे गए हैं। मोदी की राजनीतिक समझ पर तो शायद ही किसी को संदेह हो, तो यह बजट भी उसी का एक नमूना है। इस बजट में किए गए फैसलों का असर 2-3 साल में दिखने लगेगा। उसके बाद सरकार के पास थोड़ा फिस्कल स्पेस भी होगा और आखिरी 2 साल में मोदी सरकार इस देश के लोगों को रेवड़ियां बांटेगी। फिर आखिरी 2 साल में जय-जय और फिर फ़तह। मुझे लगता है कि सरकार इसी रणनीति पर काम कर रही है। ख़ैर, राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, देखने की बात होगी। लेकिन मुझे खुशी इस बात की है कि पहली बार देश में एक ऐसी सरकार है जिसके लिए देश हित सर्वोपरि है और जो जनता के सामने टुकड़े फेंक कर उसे समृद्धि का आभास देने के बजाए वास्तव में देश की नींव मज़बूत कर लोगों को सशक्त करना चाहती है। और उसके पास इतनी प्रबल इच्छाशक्ति वाला नेतृत्व भी है।
मोदी सरकार को इस ऐतिहासिक बजट के लिए धन्यवाद।
(लेखक वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार हैं) modi-and-arun_t_27

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