पुरस्कारों का अनादर


डॉ. अंजनी कुमार झा

indexसाहित्य अकादमी का लब्ध प्रतिष्ठित पुरस्कार और भारत सरकार के अन्य प्रकार के सम्मान को वामपंथ से जुड़े साहित्यकार-रचनाकारों द्वारा लौटाना देश का अपमान है। चूँकि केन्द्र में भाजपा सरकार है, इसलिये वे पूरे देश में नकारात्मक माहौल बनाना चाहते हैं। इसके लिये वे हमेशा एक ही भोथरा औजार ‘‘सांप्रदायिकता’’ का इस्तेमाल करते हैं। इस बार एक व्यक्ति की हत्या पर ऐसी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की मानो सचमुच सद्भाव के सभी तंतु समाप्त हो गये। बार-बार दोहराने से झूठ को भी ‘सच’ बनाने में माहिर इन वामपंथियों को बालाघाट में भाजपा नेता की अल्पसंख्यक युवकों द्वारा नृशंस हत्या की याद नहीं आई। समझौता एक्सप्रेस के बोगी एस-4 में आग लगाने की घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की, किन्तु गोधरा कांड को अवश्य गलत बताया। क्रिया पर चुप रहना और प्रतिक्रिया को वीभत्स बताना वामपंथियों का पुराना शगल है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सफल विदेश यात्रा और कूटनीतिक विजय की कभी तारीफ नहीं की गई। पड़ोसी देशों से मधुर संबंध, जी-8, ब्रिक्स देशों से अच्छे तालमेल के साथ विदेशी मुद्रा में बढ़ोत्तरी के साथ निवेश में अभिवृद्धि पर इन्होंने न कहीं बोला और न कहीं लिखा। पूर्वोत्तर की समस्या का समाधान, बांग्लादेश की सीमा विवाद की समाप्ति जैसी अनेक उपलब्धियों को दरकिनार कर केवल एक की हत्या को विश्वव्यापी बनाने की घृणित कोशिश हो रही है। आजम की तरह यूएनओ की बात भी करें तो आश्चर्य नहीं। वस्तुतः कांग्रेस सरकार के काल में हमेशा बिना किसी कार्य के वामपंथी मलाईदार पद पर रहते हैं, जो अब असंभव है। इसलिये कन्नड़ लेखक एम.एस. कलबुर्गी की हत्या के विरोध में तो कभी अखलाक की हत्या को लेकर केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को लज्जित करने के लिये वामपंथी ऐसे हथकंडे का इस्तेमाल करते हैं। सनद रहे कि कर्नाटक में कांग्रेस जबकि उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार है। दोनों पार्टियों की सरकारें वामपंथी लेखकों को लाभ पहुँचाती है। ऐसे में अगर ये अपनी परंपरागत फायदा पहुँचाने वाली पार्टियों का विरोध करेंगे तो उन्हें बैठ-बिठाये मलाई नहीं मिलेगा। यह बात आम नागरिक को भी पता है कि कानून व्यवस्था राज्य सरकार के हाथ में है। ऐसे में केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को दोषी ठहराना मूर्खतापूर्ण कदम है। वस्तुतः 23_10_2015-protest_20151023_121932साम्प्रदायिकता के मुद्दे को उछालकर और वह भी बिना वजह वामपंथी वोटों की सौदेबाजी कांग्रेस, सपा से करती है। लालू की पार्टी राजद को इस घृणित खेल से कोई मतलब नहीं है, क्योंकि यह खुद ही जातिवादी पार्टी है। इसी कारण लालू के सत्ताकाल में सीपीआई के लगभग सभी विधायक राजद में शामिल हो गये थे। उपन्यासकार व 1999 के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता विनोद शुक्ल ने सम्मान वापस करने के बजाय यह कहा कि वह इसे सलीब की तरह ढोते रहेंगे। उनसे केवल एक सवाल पूछना चाहिये कि वह तो छत्तीसगढ़ के बडे़ कवि हैं और उस प्रदेश से भली-भांति परिचित हैं तो फिर बतायें कि नक्सलियों द्वारा पुलिसकर्मियों और निर्दोष लोगों की हत्या पर क्या कभी कुछ बोला, लिखा? उत्तर नहीं है, क्योंकि अगर मुँह खोला तो मार डाले जायेंगे, किन्तु भाजपा सरकार को निशाना बनाने पर भरपूर प्रचार मिलेगा, कांग्रेस की केन्द्र या राज्यों की सरकारों में लाभ का पद मिलेगा। तभी तो समाजवादी पार्टी की सरकार भी इन्हें लाभ पहुँचाती है। कारण, वामपंथी हिन्दुओं को कोसेंगे तो लाभ सपा को मिलेगा। बार-बार यही खेल दोहराया जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक ही कहा कि विपक्ष सांप्रदायिकता का हव्वा खड़ाकर अल्पसंख्यकों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर रहा है। केन्द्रीय संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद और वित्त मंत्री अरूण जेटली ने सटीक सवाल किया कि आपातकाल और मुजफ्फनगर दंगे के समय पुरस्कार और सम्मान लौटाने की याद कभी नहीं आई। उल्लेखनीय है कि आपातकाल के दौरान प्रेस की आजादी के साथ-साथ बड़ें पैमाने पर कई बार लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हुआ लेकिन उस वक्त ऐसी आवाजें नहीं सुनी गईं थीं। क्या कांग्रेस के शासनकाल में दंगे, भ्रष्टाचार नहीं हुये? क्या वामपंथी विचारकों ने सम्मान लौटाये? भीषण गरीबी, चीन का आक्रमण, जीप खरीद घोटाला, सैन्य उपकरण क्रय घोटाला, राष्ट्रमण्डल खेल घोटाला समेत अनेक कांडों पर वामपंथी लेखकों ने एक मैडल भी वापस नहीं किये। उल्टे चुप्पी साधकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया गया।1445666722Sahitya
दिलचस्प तथ्य यह है कि अब तक देश के 25 मशहूर लेखकों व साहित्यकारों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का एलान किया है। इनमें से सिर्फ 8 लेखकों ने साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर पुरस्कार लौटाने की बात कही है। बाकी लेखकों ने सिर्फ मीडिया के सामने ही ऐलान किया है। जिन लेखकों ने साहित्य अकादमी को अपना पुरस्कार लौटाया है, उनमें से सिर्फ तीन ने ही एक लाख का चेक वापस किया। साहित्य अकादमी पुरस्कार अब तक एक हजार चार लेखकों को मिला है। सुर्खियाँ बटोरने के लिये सबसे पहले नयनतारा सहगल (विजय लक्ष्मी की पुत्री) ने पुरस्कार लौटाने की घोषणा की। फिर सुनियोजित षड्यंत्र के तहत अलग-अलग दिशा और क्षेत्रों से वापस करने वालों के बयान टी.वी और प्रिंट मीडिया में आने लगे। जान-बूझकर बिहार का विधानसभा चुनाव का समय चुना गया, ताकि महागठबंधन (लालू-नीतिश) को लाभ मिल सके। हालांकि, सपा और एनसीपी को उचित हिस्सा नहीं मिला, तो दोनों अलग हो गये। वामपंथी लेखक-साहित्यकार सृजनधर्मिता से कोसों दूर होकर वोटों की राजनीति करने लगे हैं। यह अब स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है। एक और झूठ का पर्दाफाश तब हुआ जब पंजाबी लेखिका दलीप कौर ने पद्मश्री लौटा दिया। उनसे पूछना चाहिये कि वर्ष 84 के सिख दंगे से ज्यादा दुखदायी कांड तो हाल में नहीं हुआ, फिर आज वापसी क्यों? नंदीग्राम, सिंगूर कांड में दर्जनों निहत्थों की मौत, सैकड़ों के बेघर हो जाने से उपजा क्रंदन के बाद भी पुरस्कार वापसी की राजनीति तो दूर एक शब्द भी न बोला और न लिखा। केरल में प्राध्यापक टी.जे. जोसेफ का दाहिना हाथ काट लिया गया। दोष था कि पैगम्बर मोहम्मद पर सवाल पूछ लिये थे। यह राज्य तो वामपंथ का दुर्ग है। इसके बावजूद वामपंथी लेखक ने अतिवादी, सम्प्रदायवादी संगठन के अमानुषिक कदम का विरोध नहीं किया। कारण केवल एक है मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण में सहयोगी बने रहना। इन धूर्तताओं, चालबाजियों को देखकर एक घटना याद आती है कि महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जलियावाला बाग गोलीकांड के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी। ऐसे में इन पुरस्कारों की सामाजिक भूमिका क्या है? साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ठीक कहा कि अकादमी के पुरस्कारों का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिये। ashok-vajpeyee_650x400_41444196374साहित्यकार से अपेक्षा यही रहती है कि वे हर बदलाव, समाज की हर अच्छाई-बुराई पर प्रतिक्रिया देंगे। ज्यादातर यह प्रतिक्रिया उनकी रचनाओं के रूप में सामने आती है। खुद स्वाधीनता आंदोलन सबसे बड़ा उदाहरण है। दुनिया में ऐसे बहुत उदाहरण हैं जहाँ अपनी संवेदनशीलता को व्यक्त करने या अपना विरोध जताने के लिये साहित्यकार सड़कों पर उतरे किन्तु देश के कथित बुद्धिजीवियों की ये कदमताल उपहास पैदा करता है। डेनसयेसे और थियेटर कलाकार माया राव ने संगीत नाटक अकादमी अवार्ड को जब वापस किया तो सलमान रूश्दी ने पीठ थपथपाई। हालांकि, साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजी गई मृदुला गर्ग इस ओछी हरकत से सहमत नहीं है। हिन्दी लेखकों, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, कश्मीरी लेखक गुलाम नबी ख्याल, कन्नड़ लेखक श्रीनाथ डी. एन., और के बीर भद्रप्पा, कोंकणी लेखक एन. शिवदास, अनुवादक जी. एन. रंगनाथ राव, अंग्रेजी के कवि के.की. एन. दारूवाला, राजस्थानी लेखक नंद भारद्वाज, समेत अन्य रचनाकारों से एक सवाल और पूछने की जरूरत है कि क्या चार लाख से अधिक कश्मीरी हिन्दुओं को जब बलपूर्वक कश्मीर से खदेड़ा जा रहा था, हत्या, लूट-पाट, बलात्कार किया जा रहा था तब इनकी कलम की स्याही कक्यों सूख गई थी? क्यों वे गूंगे थे? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की याद केवल अभी क्यों आ रही है? निश्चित रूप से एक गहरी साजिश के तहत वे पुरस्कार वापस कर देश की फिजां में जहर घोल रहे हैं। अब जब पाकिस्तानी लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता फौजिया सईद ने कहा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले लोग मूलतः हिन्दू ही हैं, इस टी.वी. इंटरव्यू के बाद तो वामपंथियों का तो बड़ा हथियार ही हाथ से निकल जायेगा। फौजिया ने साफ लफ्जों में कहा कि 99 फीसदी पाकिस्तानियों के पूर्वज हिन्दू ही थे। उन्होंने दावा किया कि उपमहाद्वीप का इतिहास बताता है कि हिन्दुओं को मारा गया और मुस्लिम हमलावरों ने जबरन उनका धर्म परिवर्तन किया। जैद हामिद से
air5-1438726087टी.वी. इंटरव्यू में यह भी कहा कि अगर हम यह स्वीकार कर लेंगे कि हममें ये बुराइयाँ हैं तो शायद हमारी आँखें ज्यादा खुली रहें। उधर पूर्व केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर ने छह और साहित्यकारों द्वारा अकादमी पुरस्कार लौटाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि यह विरोध का सही तरीका नहीं है क्योंकि यह पुरस्कारों का अनादर है। अवार्ड बौद्धिक, साहित्य, रचनात्मकता की पहचान होती है। यह राजनीतिक गतिविधि नहीं है। कार्ल मार्क्स ने 22 जुलाई, 1853 को एक लेख में भारतीय इतिहास के बारे में लिखा है कि भारतीय समाज का कोई इतिहास नहीं है। यह उन लोगों का इतिहास है जिन लोगों ने कभी विदेशी आक्रमणों का प्रतिरोध नहीं किया जो बिलकुल निष्क्रिय बैठे रहे और जो भी आया, भारत को पराभूत कर, लूट कर चला गया।
(कार्ल मार्क्स, द फ्यूचर रिजल्ट्स ऑफ द ब्रिटिश रूल इन इंडिया, द न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, 22 जूलाई, 1853, पृष्ठ 21)
1962 के चीनी आक्रमण और 1965 में भारत-पाक आक्रमण के समय मार्क्सवादी इतिहासकारों की भूमिका निष्क्रिय रही। एक भी कम्युनिस्ट नेता या प्रगतिशील लेखक ने चीन की क्रूरता की भर्त्सना नहीं की। आश्चर्यजनक तथ्य है कि भारत की इस करारी पराजय के बाद भी ऐसे विचार के नेताओं और लेखकों की चीन यात्रा में कोई कमी नहीं आई। पाकिस्तान को करारा जबाव देने के बाद भी कथित बुद्धिजीवियों ने भारतीय सैनिकों और सरकार की प्रशंसा नहीं की। स्वतंत्रता आंदोलन में इनकी भूमिका नगण्य ही नहीं बल्कि संदिग्ध भी थी। श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनते ही, राजसत्ता को क्रूरतापूर्वक अधिनायक अंदाज में चलाने के लिये इन बुद्धिजीवियों ने भरपूर सहयोग दिया। बदले में साहित्य अकादमी, पद्मश्री आवार्ड के अतिरिक्त विभिन्न सांस्कृतिक-शैक्षणिक पदों पर विराजमान रहे। तब उन्हें इंदिरा गांधी की हिटलरी, भ्रष्टाचार कहीं नहीं दिखी। आपातकाल में सभी वामपंथी विचारक, लेखक इंदिरा के पिछलग्गू बने रहे। कम्युनिस्ट पार्टी के रेडकार्ड होल्डर डॉ. नुरूल हसन को शिक्षा मंत्री बनाया गया। सोवियत संघ ने भी इन घटनाओं तथा अवसर को समयानुकूल बताया। (इंटरनेशनल अफेयर्स, मास्को, नवम्बर, 1975) इतिहासकारों, लेखकों की मनमाने ढंग से नियुक्तियों का सिलसिला इंदिराकाल में इन्हीं वामपंथी विचारकों के इशारे पर शुरू हुआ। विश्वविद्यालयों में केवल कम्युनिस्ट काडर ही योग्यता माना जाता था। जे.एन.यू. एक बड़ा उदाहरण है। कई इतिहासकारों, प्राध्यापकों की नियुक्तियाँ बिना इंटरव्यू के की जाती रही। साहित्य अकादमी, तीनमूर्ति, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, जे.एन.यू. इंडिया हिस्ट्री कांग्रेस आदि भारत विरोधी और इंदिरावादी षड्यंत्रों का अड्डा माना जाता था। इतिहास पाठ्यक्रम की स्कूलों की पुस्तकें लिखने के लिये एन.सी.ई.आर.टी. के माध्यम से प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकारों-रोमिला थापर, रामविलास शर्मा, डी.एन. झा, विपिन चन्द्र, इरफान हबीब को लगाया गया। 1969 से 2006 तक यह ‘खेल’ चलता रहा। मोटे तौर पर हिन्दू धर्म तथा संस्कृति का बहिष्कार, मुगल आक्रांताओं को महिमामंडित तथा भारतीयों को नीचा दिखाने वाले विचारों की पुरजोर व्याख्या इतिहास में की गई। आर्य, वैदिक संस्कृति, रामायण, महाभारत को पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया। इतिहास से पृथ्वीराज चौहान, राणा सांगा जबकि विज्ञान से आर्यभट्ट, पाणिनी आदि को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया। मानविकी और विज्ञान के विषयों से भारतीय संस्कृति, वैज्ञानिकों, संत-परंपरा, प्राचीन विद्या आदि को पूरी तरह खारिज कर इसका मखौल उड़ाया गया। इतना ही नहीं शून्य, वायुयान के आविष्कार तथा चरक-चिकित्सा को कपोल-कल्पित बताया गया जबकि रमन-इफेक्ट आज भी पश्चिमी देशों में पढ़ाया जाता है।prashad-4_1445601964
अत: अब इन वामपंथी साहित्यकार को अपने बेरोजगार एवं अपनी काली करतूतों पर से पर्दा हटने का खौफ़ सता रहा है। यहीं साहित्यकार अपने आकाओं के निर्देश पर साहित्य के नाम पर घृणित राजनीति कर रहे है। अभी हाल ही में भारतीय साहित्यकार के सांझे मंच ‘जनमत’ ने प्रमुख साहित्यकारों सर्वश्री डॉ. नरेंद्र कोहली, सूर्यकान्त बाली, डॉ. कमलकिशोर गोयनका, पद्मश्री श्याम सिंह शशि, परमानन्द पांचाल आदि के नेतृत्व में साहित्य अकादमी पर जोरदार प्रदर्शन कर साहित्य अकादमी के अध्यक्ष को इन तथाकथित साहित्यकारों के विरुद्ध ज्ञापन दिया। सिख समाज के एक संगठन ने भी इन साहित्यकारों के दोगलें रुख पर  84 के दंगों पर इन ‘संवेदनशील’ साहित्यकारों की भर्त्सना करते हुए बड़ी संख्या प्रदर्शन किया। अब इन साहित्यकारों को समझ लेना चाहिए कि अपने बेसिरपैर की रचनाओं के दम पर चलने वाले एवं कहीं हद तक साहित्यिक ‘दादागिरी’ अब जागरूक भारतीय समाज सहन नहीं करेंगा।

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