पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की विदेश नीति


प्रो. सतीश सिंह

इमरान खान पाकिस्तान के २२ वे प्रधानमंत्री बनेण् नेशनल असेंबली में इमरान ने बहुमत सिद्ध कीण् लेकिन यह ताज उनके लिए काँटों का ताज होगाण् पिछले कुछ दिनों में इमरान ने नया पाकिस्तान बनाने की बात की हैण् कैसा होगा यह नया पाकिस्तानघ् उल्लेखनीय है कि इमरान के सामने विश्व राजनीति में हो रहे परिवर्तन में पाकिस्तान कि हैसियत क्या होगी वह महत्वपूर्ण होगाण् विश्व दो खेमो में बट चुका हैण् चीन और चीन का विरोधी खेमाण् चूकि पाकिस्तान चीन से पूरी तरह चिपक गया हैण् चीन और पाकिस्तान के बीच सम्बन्ध में अब कुछ नया बनाने के लिए कुछ है नहींण् अमेरिका से पाकिस्तान का रूखापन मुश्किल होने जा रहा हैण् भारत पाकिस्तान सम्बन्ध इमरान खान के नेतृतव में बनने कि बजाये बिगड़ने की उम्मीद हैण् इसके कई कारन सामने दिख रहा हैण् मंत्रिमंडल में २० मंत्रियो को सपथ दिलाई गयीण् जिसमे शिरीन माजरी भी शामिल हैण् शिरीन माजरी ने कारगिल युद्ध ख़तम होने के बाद भारत पर परमाणु हमले की वकालत की थीण् मंत्रिमंडल में कई और ऐसे चेहरे है जो भारत विरोध की मानसिक रोग से ग्रसित हैण् इमरान खान पूरी तरह से इस कोशिस में है है की सार्क सम्मलेन पाकिस्तान में होण् भारत श्रीलंका में सार्क समेल्लन का हिमायती हैण् पूरी उम्मीद है की सार्क सम्मलेन को लेकर दोनों देशो के बीच में तल्ख़ माहौल पैदा होगाण् भारत बहुत पहले से ही सार्क में धींगमुस्ती को देखते हुए बिम्सटेक की शुरवात कर दी थीए जिसकी बैठक कठमांडू में इसी महीने में होने वाली हैण् और कई ीसे मसले है जहा पर इमरान खान का अड़ियल रुख भारत पाकिस्तान सम्बन्ध के बीच में आड़े आएगाण् पाकिस्तान में चुनाव के बाद से ही सीमा पर गोली बड़ी की घटनाये बाद गयी हैण् यह इस बात का हिमायती है की सेना सर्कार बनने के पहले से ही सुरक्छा और विदेश नीति को अपने गले में लटकाये हुई हैण् इमरान खान केवल सेना के आदेशों का पालन करते हुए दिखेंगेए ऐसे हालत में भारत पाकिस्तान सम्बन्ध में कोई गुणात्मक परिवर्तन की उम्मीद टूयूब लाइट में भींगे कपड़े सूखने जैसा होगाण्

आर्थिक संकट : इमरान के सामने सबसे बड़ी मुसीबत आर्थिक ढ़ाँचे को लेकर होगी। पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान के आर्थिक हालात अत्यंत ही गंभीर बने हुए हैं। इस बात की उम्मीद की जा रही है प्रधानमंत्री बनने के तत्काल बाद इमरान खान को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का दरवाजा खटखटाना होगा। पाकिस्तान में विदेशी पूंजी का सूखा पड़ा हुआ है। तकरीबन 12 मिलियन डॉलर की जरूरत पाकिस्तान को है। यहां एक पेंच भी है। मुद्रा कोष पर नियंत्रण अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों को है क्योंकि अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोषा में करीब 16.52 प्रतिशत का योगदान देता है लेकिन अमेरिकी मंत्री माइक पोम्पिओ ने कहा कि अमेरिका पाकिस्तान को यह लोन अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से नहीं लेने देगा। पिछले दिनों इमरान ने अमेरिका के विरोध में बहुत कुछ कहा था। नवाज शरीफ और पूर्व की सरकारों पर यह इल्जाम लगाया गया था कि गलत नीतियों की वजह से पाकिस्तान को पूर्ववर्ती सरकारों ने अमेरिका का एक मुहल्ला बना दिया। हम ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे। अमेरिकी मंत्री ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से रकम लेकर चीन को लौटाने के लिए अमेरिका कभी भी इजाज्त नहीं देगा।
चीन और अमेरिका के बीच समन्वय : पाकिस्तान चीन की गोद में सिमट गया है। पाकिस्तान के लिए यह भी एक चुनौती है। प्रधानमंत्री बनने के बाद हर प्रधानमंत्री की पहली यात्रा चीन की होती है। इमरान भी पहले चीन जाएगें लेकिन चीन के लिए इमरान के शब्द बाकी अन्य नेताओं से अलग नहीं होंगे। नवाज शरीफ ने 2013 की चीन यात्रा के दौरान यह कहा था कि चीन-पाकिस्तान का संबंध हिमालय की श्रृंखलाओं से ऊँचा, सागर की गहराइयों से भी गहरा और मद्य की मिठास से भी मीठा है। इसके बाद बचा ही क्या जो इमरान चीन के पक्ष में बोल पाएगें। चीन दक्षिण एशियाई देशों को शतरंज के मोहरे के रूप में उपयोग करता है। किसकी कितनी क्षमता है, उसका आंकलन चीन अपने लाभ के अनुसार करता है। पिछले कुछ वर्षो में ‘सीपेक‘ और ‘वन बेल्ट वन रोड़‘ के तहत पाकिस्तान एक सहयोगी देश नहीं बल्कि चीन का किराएदार बन गया है। चीन के कर्ज का बोझ इतना बड़ा हो गया है कि पाकिस्तान की जमीने चीन की मिलकियत बनने जा रही है। वहीं दूसरी और पाकिस्तान और अमेरिका के बीच संबंध निरंतर घटता जा रहा है। 1971 में जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर चीन-अमेरिका संबंध की शुरूआत कर रहे थे तो उस प्रक्रिया का बिचौलिया पाकिस्तान ही हुआ करता था। पुनः पाकिस्तान ने अमेरिका के जिए मुस्लिम देशों के दरवाजें खोले। बदले में अमेरिका ने पाकिस्तान को ‘मुलायम मुस्लिम देश‘ की संज्ञा दी और अपना महत्त्वपूर्ण आर्थिक और सामरिक सहयोगी बना लिया। 5 दशकों तक लेन-देन का सिलसिलर चलता रहा। बात 2001 के आतंकी हमले के बाद बिगड़नी शुरू हुई। ओसामा-बिन लादेन की हत्या और भारत-अमेरिका संबंध की चुनौतियों ने पाकिस्तान-अमेरिका संबंध को डीप फ्रिजर में डाल दिया। बात पिछले वर्ष तब और बिगड़ी जब अमेरिकी सेना के द्वारा ऑफ पाक सीमा पर गलती से सलाना में 24 पाकिस्तानी सैनिकों की जाने चली गई। बदले में पाकिस्तान ने अमेरिकी सेना को दी गई कोरिडोर को बंद कर दिया। अफगानिस्तान मुहिम की महत्त्वपूर्ण इकाई पाकिस्तान रहा है। अमेरिका ने चुनौती दी कि वह पाकिस्तान की मदद के बावजूद भी अफगानिस्तान में सैनिक कार्यवाही करता रहेगा। पाकिस्तान को अमेरिका ने पांच दशकों बाद अर्थहीन और असंगत घोषित कर दिया। दूसरी तरफ पाकिस्तान के जेहादी संगठन ने पूरी तरह से पाकिस्तान-अमेरिका संबंध को तोड़ने की घोषणा कर दी।
अब यह चुनौती नए प्रधानमंत्री के समक्ष होगी कि कैसे अमेरिका के साथ बिगड़ते हालात को रास्ते पर लाया जाए। बात केवल अमेरिका की नहीं है। शीत युद्ध के उपरांत पुनः दुनिया गुटबंदी में बंट गई है। कई अमेरिका समर्थित मुस्लिम देश पाकिस्तान के साथ अपने संबंध को बनाने में हिचकेंगे। ऐसे हालात पाकिस्तान के लिए नई मुश्किले पैदा करेंगे।
इमरान की भारत नीति : पाकिस्तान में चुनाव के उपरांत सीमा पर तल्खी बढ़ गई है। दोनों तरफ से गोलाबारी की खबरे हैं। इमरान खान ने भारत से बेहतर संबंध की बात कही है लेकिन इमरान जिसकी गोद में खेल रहे हैं उसकी नियत और नीति दोनों भारत विरोधी है। पिछले 70 दशकों में पाकिस्तान की सेना ने भारत-पाकिस्तान संबंध को बनने नहीं दिया। बंगलादेश, कश्मीर और कारगिल के प्रतिशोध में पाकिस्तान की सेना भारत विरोध की नीति बनाती रही है। विदेश नीति सेना के इशारे पर चलती है। नवाज शरीफ का पतंग इसलिए कटा कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान संबंध को नाए सिरे से बुनने की कोशिश की थी। नवाज शरीफ ने पिछले दिनों यह कहा था कि कारगिल आक्रमण की खबर उन्हें पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री वाजपेयी के द्वारा मिली थी। किसी भी देश के लिए इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति और क्या होगी कि चयनित प्रधानमंत्री को युद्ध या आक्रमण की सूचना विरोधी देश के प्रधानमंत्री से मिले। इमरान खान की राजनीतिक हैसियत भी नवाज जैसी नहीं है। इसलिए भारत के संदर्भ में सब कुछ वैसा ही होगा जैसा सेना तय करेगी।। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कम एक मैनेजर के रूप में ज्यादा दिखेंगे। उन्हे हर आदेश के लिए सेना की स्वीकृति लेनी होगी।

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