पत्रकारिता


राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा


अब जिसका कोइ काम नहीं है पत्रकार है
बस,करतूतों की कलम हाथ में कलाकार है
ये सब धीरे – धीरे सम्पादक भी हो जाते हैं
कलम,बलम के शेर शाम को ही खातें हैं

प्रतिबिम्ब देश का पत्रकार को हम कहते थे
निर्भय शब्द सतत् सरिता से ही बहते थे
क्यों समाचार अब केवल रद्दी बेच रहा है
क्यों सागर की लहरों में रेखा खैंच रहा है

गन्द द्धन्द की खबरों के हम भी आदि हैं
दिल दिमाग में सबके नेता और खादी है
काम देव बिन खबर बने, रस पिट जाता है
हर चैनल क्यों चरित्र हीन को दिखलाता है

भ्रष्ट आचरण व्यभिचार नित छप जाते है
धवल धनि रस राज सभी को क्यों भाते है?
क्यों राजनीति से सारे चैनल भरे पढे़ हैं
हर चैनल के अपने – अपने अलग धडे हैं

धनियों को कोटे से कागज मिल जाता है
ये प्रजातन्त्र पूॅंजी पतियों का बई खाता है
मजबूरी है काले धन को धवल बनाना
फिर बुनता है धन पतियों का ताना बाना

यंहा हर चैनल पर मोदी ,योगी ही छाता है
सौन्दर्य प्रसाधन रामदेव भी दिखलाता है
अब भारत माता धन पतियों का समाचार है
क्या मजबूरी है राष्ट्र- भक्त भी लाचार है

निर्णय सिन्धु की भांषा चैनल बोल रहे है
क्यों सत्ता के चरणो में चैनल डोल रहे हैं
अपने न्यूज-ऱूम में नेताओं को लडवाते हैं
अब इस अहिसुण्ता को चैनल ही गर्माते हैं

कंही बेरोजगारी,मंगायी की भी बात नही है
सम्पादक कुछ सत्य लिखे औकात नही है
अब मालिक के निर्देशन पर खबरें छपती हैं
यंहा आज मिडिया सत्ता की माला जपती है

निर्भयता से कलम अगर कुछ लिख देती है
बस,पत्रकार ,सम्पादक की ये शुद्ध खेती है
अब पत्र – कारिता से मजबूरी दूर हटाओ
सम्पादक स्वछन्द बने कुछ नियम बनाओ

जाति, कौम ,कबीलों के सब झगडे़ छोडो
सन्त,पन्थ,अरिहन्त,कलम से खूब निचोडो
नेता की औकात सडक पर खुल कर लाओ
बस, एक नमूना पत्रकारिता का दिखलाओ

कला कलम साहित्य सृजन में क्या आयेगी?
समसीरों की धार कलम क्या बन पायेगी?
सम्पादक शब्दों में कुछ विस्फोटक लाओ
भ्रष्ट शर्म से मर जाये वो आग दिखओ।।

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