नैतिक शिक्षा से मानवता संभव


डॉ. अंजनी कुमार झा

naitik shiksha मूल्यपरक शिक्षा के बिना ‘शिक्षा’ अशिक्षा है। शिक्षा से आशय केवल डिग्री नहीं है, बल्कि ऐसा ज्ञान जो समाज के उन्नयन में दीपक की भांति कभी न बुझने वाली दिव्य ज्योति हो। देश और समाज में शिक्षित व्यक्ति की कद्र उसी सनातन परंपरा के तहत आज भी भारत में होती है। ग्रामीण भारत में यह आज भी विद्यमान है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली और स्वातंत्रयोत्तर भारत में नेहरुयुगीन काल में भी दोषपूर्ण शिक्षा नीति से नैतिकता का काफी ह्यस हुआ। इसका प्रस्फुटन सभी क्षे़त्रों में विद्यमान है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, रविन्द्रनाथ टैगोर, महर्षि अरविन्द, स्वामी विवेकानन्द, पंडित मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, गोलवलकर, एकनाथ रानाडे समेत अनेक समाज सेवियों, संत-महात्माओं ने बार-बार इस गंभीर मुद्दे पर गहरी चिंता प्रकट की और कई मंचों पर वर्तमान शिक्षा प्रणाली को असंगत बताया। दुर्भाग्यवश हमारी कृषि व्यवस्था की तरह शिक्षा व्यवस्था को सुनियोजित ढंग से कु-व्यवस्था में परिवर्तित कर ‘बाजार’ के हवाले कर दिया गया। इसी का दुष्परिणाम है कि पढ़े-लिखे शिक्षित वर्ग से लोगों का विश्वास टूटता जा रहा है।
कभी सत्य-राष्ट्रीयता, समर्पण, बलिदान का पर्याय माने जाने वाला शिक्षित अब धोखेबाज और स्वार्थी के रूप में जाना जाता है। कारण, नैतिकता को प्राथमिक शिक्षा से ही समाप्त कर देना। गुरूकल शिक्षा व्यवस्था को जान-बूझकर हतोत्साहित किया गया। आयातित अंग्रेजी सोच वाली व्यवस्था में भारतीयता अर्थात् मूल्यनिष्ठता विलापित हो गया।
हम पशुवत ढंग से भौतिक रूप में समृद्ध हो रहे हैं। यांत्रिक गति से दौड़ रहे हैं, पर क्यों, मालूम नहीं। सूचनाओं का अपार भंडार इक्टठा हो रहा है, पर विचार-गवेषणा शून्य है। कारण, नैतिकता, प्रतिबद्धता, निःस्वार्थता गौण है। भारतीय परम्परा के अनुसार जब-जब संस्कृति और सभ्यताएँ अधःपतित हुई हैं, तब-तब मानवीय मेधा विभ्रमित और विमूढ़ हुई है। जब स्वामी विवेकानंद से पूछा गया कि ‘‘आज की विश्वविद्यालयीन शिक्षा प्रणाली में क्या दोष है?’’ उन्होंने उत्तर दिया,‘‘क्यों, वह तो आदि से अन्त तक दोषों से भरी हुई है।’’ वे बोले, ‘‘यह बाबुओं का उत्पादन करने में सक्षम एक कुशल यंत्र के अतिरिक्त और क्या है? उनके विचार में, सक्षम एक कुशल यंत्र के अतिरिक्त प्रशिक्षण है, जिसके द्वारा संकल्प- शक्ति की अभिव्यक्ति को और उसके प्रवेग को सन्तुलित एवं लाभप्रद बनाया जाता है। देश की शाश्वत परम्परा तथा आदर्शों के प्रति सचेत न होने पर विश्रृंखलापूर्ण समृद्धि से राष्ट्र अधोगति की ओर जा रहा है। हम अपनी सभ्यतागत बौद्धिक विरासत को पहचानें। अपने आधारभूत प्रत्ययों, पदों, मानों, आदर्शों, लक्ष्यों, परम्पराओं, व्यवस्थाओं, बीज-पदों, ज्ञानधाराओं को मूल्यनिष्ठ शिक्षा से फिर जानें।
यूरंडपंथियों, कम्युनिस्टों, सेकुलरिस्टों ने राज्यतंत्र के बल पर मूल्यहीन शिक्षा प्रणाली जो विकसित कर दी, उसे पुनः पाने के लिये क्रांतिकारी कदम उठाने की आवश्यकता है। भारत रत्न पं. मदन मोहन मालवीय गुलामी के उस दौर में भारतीय युवाओं को शिक्षा, संस्कृति और रोजगार के साथ मूल्यपरकता को लेकर विशेष चिंतित रहते थे। आज उनकी अंतर्दृष्टि, दर्शन और विचारों का प्रंसार बेहद जरूरी है।a1
विवेकानन्द की दृष्टि में- ‘‘सच्ची शिक्षा वह है, जिससे चरित्र का निर्माण होता है। शरीर और मन बलशाली बनते हैं, बुद्धि बढ़ती है और व्यक्ति आत्मनिर्भर बनता है। वे ऐसी शिक्षा देने के पक्ष में थे, जिससे उसका चरित्र बने, बुद्धि का विकास हो, मानसिक शक्ति बढ़े और वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके। उनकी नजर में शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य मनुष्य का निर्माण तथा विकास करना है। वह हमेशा अपने व्याख्यानों में कहा करते थे कि व्यक्ति के साथ ही राष्ट्र का विकास भी शिक्षा का उद्देशय होना चाहिए। वह ऐसी शिक्षा के विरोधी थे, जिसके द्वारा नौकरी प्राप्त करके अपना पेट मात्र भरा जा सके। पश्चिम के अंधानुकरण तथा उसके विचारों को बिना युक्ति की कसौटी पर कसे मान लेने पर उनका कहना था- ‘जब हम सुनते हैं कि प्राचीनकाल के किसी साधु या ऋषि ने सत्य को प्रत्यक्ष किया तो हम इसे नहीं मानते, परंतु यदि कोई कहे कि यह हवसले का मत है या टिंडल ने बताया है तो हम उनकी सारी बातों को मान लेते हैं।
आधुनिक शिक्षा ने मनुष्य को आत्मविश्वासी, सक्षम और निष्ठावान नहीं बनाया, इसी कारण अनेक समस्याएँ पैदा हो गईं। हिन्दी भाषा के माध्यम से आजादी आने की बात महात्मा गांधी ने कही थी, वह आजादी आई ही नहीं। नैतिक शिक्षा के अभाव के कारण हम मनुष्य के धर्म को भूल गए, मनुष्यता को छोड़ बैठे। मनुष्य होने का विश्वास और व्यवहार को भूल गए। आधुनिक होने का बहुत बड़ा मूल्य चुकाया हमने। अपने अतीत को गाली देना सीखा। पूर्वजों के आचरण में हमें दोष ही दोष दिखने लगे। स्वाभिमान और आत्मगौरव को भूल कर आत्मदम्भी बन गए। ऋषि-मुनि कहते थे- आत्मानं विद्धि (स्वयं को पहचानो। ‘मैं’ के नीचे स्व दब गया। स्वातन्त्रयं परमं सुखम् देश का जीवनदर्शन है। अध्यात्म का अर्थ ही भूल गए। अनात्मवादी हो गए। स्वतंत्रता और स्वच्छन्दता का अर्थ भूल गए। राष्ट्र का अर्थ‘ ‘नेशन’ मानने लगे, जबकि राष्ट्र का अर्थ प्रकाश होता है। बिना नैतिकता के प्रकाश नहीं आ सकता। आज हम प्रकाशित भले हो रहे हैं, किन्तु निष्प्रभावी और निष्प्राण होकर। ऐसे जीवन का कोई ‘अर्थ’ नहीं है। भरत का भारत आज शोकाकुल है। अपने वैभवशाली अतीत के पन्ने पलटने पर गुलामी, दासता, आक्रमण, जबरन धर्मातरण, स्वार्थपरकता, धनलिप्सा और लूट बाजार को देखकर हम ज्योतिहीन हो गये । फिर भी -मेक इन इंडिया’ के जरिये उम्मीद की किरण दिख रही है। कई राष्ट्रीय विचारों के संगठन नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल कराने में जी-जान से जुटे हैं। विद्याभारती, शिक्षा बचाओ आंदोलन की भूमिका अहम् है।
रवीन्द्रनाथ के विनोबा के शब्दों में कहें तो ‘सदोष’ और तंग तालीम के कारण स्कूल-कालेज कारावास हो गया। 99 का फेर बच्चों में अपूर्णता की ग्लानि भरता है। इसलिये ईशोपनिषद् का ‘पूर्णमदः पूर्णमिद्म्’ आवश्यक है। शिक्षा मानव-समाज की संचित सीख है। वह उसे परम्परा और परिस्थिति के अनुसार ग्रहण करता है। तभी तो मेकाले ने अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार और तत्कालीन हिन्दु शिक्षा प्रणाली का बहिष्कार करते हुए अपने पिता को पत्र लिखा था, ‘अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव हिन्दुओं पर बहुत अच्छा पड़ रहा है और जो भी हिन्दु अंग्रेजी पढ़ते हैं, वे अपने धर्म और समाज के भक्त नहीं रह जाते। उनमें कुछ तो दिखावे भर के लिए हिन्दु रह जाते हैं, कुछ धर्म-विरोधी बन जाते हैं और कुछ ईसाई हो जाते हैं। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि यदि हमारी यह शिक्षा योजना चलाई जाती रही, तो तीस वर्षोंं में बंगाल के उच्च वर्गों में एक भी मूर्तिपूजक नहीं बचा रहेगा। मूल्यपरक शिक्षा व्यक्तित्व के निर्माण के साथ समाज व राष्ट्र के निर्माण का भी आधारस्तम्भ है। जो राष्ट्र नैतिक शिक्षा में जितना पिछड़ा रहता है, वह सभ्यता में भी उतना ही पीछे रहता है। नैतिक शिक्षा मनुष्य का चरित्र उदार बनाती है, जिससे वह समस्त संसार के प्रति मैत्री- भावना स्थापित करने में समर्थ होता है। यह व्यक्ति के विचार साम्य को दृढ़ करती है, जिससे मानव समाज सभ्य कहलाता है और उसमें एकता बनी रहती है।
जर्मनी के प्रसिद्ध शिक्षाविद् हरबर्ट स्पेंसर ने नैतिक शिक्षा का उद्देश्य पूर्ण जीवन का निर्माण बताया है। उनकी शिक्षा-प्रणाली से जर्मनी का कायापलट हो गया। स्टाइन, इन्वोल्ट आदि राजनतिज्ञों ने इसका अनुसरण किया और लोगों में चामत्कारिक परिवर्तन किये। बापू ने मूल्यपरक शिक्षा की औषधि को सार्वभौमिक रूप में प्रसारित किया। उनके मत में व्यक्ति का विकास एकांगी नहीं होना चाहिए। हमारे नागरिक दार्शनिक हों, वैज्ञानिक हों, शिल्पकार और चित्रकार हों, नीतिवान और सच्चरित्र हों तथा देशभक्ति और विश्वबन्धुत्व की कामना से ओतप्रोत हों तभी भारत का कल्याण होगा। हरबर्ट का कथन है कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है, ‘नैतिक विकास।’ बापू का भी विश्वास है कि ‘चरित्र-निर्माण शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है। गांधीजी ने चरित्र निर्माण को इतना अधिक महत्व दिया कि यदि उन्हें साक्षरता और चरित्र निर्माण में एक को चुनना होता, तो वे ‘चरित्र-निर्माण को चुनते।
लाला लाजपत राय ने ‘‘द प्राब्लेम आॅफ नेशनल एजुकेशन इन इण्डिया’ में मत प्रकट किया कि राष्ट्रीय शिक्षा उदात्त एवं प्रखर देशभक्ति के वातावरण से ओत-प्रोत हो। इसका भारत की पारिवारिक जीवन शैली से सम्बन्ध विच्छेद नहीं होना चाहिए, क्योंकि परिवार में से राष्ट्र का निर्माण होता है। राष्ट्रीय शिक्षा के द्वारा प्रत्येक बिन्दु पर राष्ट्रीय स्वभाव का पोषण होना चाहिए। राष्ट्रीय चरित्र का विकास होना चाहिए। ब्रिटेन के आदर्श ब्रिटेन के लिए अच्छे होंगे, पर भारत के लिए भारत के आदर्श ही अनुकूल होंगे।’’
गांधीजी ने 1914 में ‘हिन्दु स्वराज’ में सच्ची शिक्षा पर जो लिखा, वह आज भी प्रासंगिक है। ‘‘मेरा ख्याल है कि सच्ची शिक्षा इसमें नहीं है कि आप बच्चों को अक्षरों का ज्ञान करा दें। सच्ची शिक्षा तो बच्चों के चरित्र-निर्माण में है। जब तक बच्चे छोटे होते हैं और उनकी बुद्धि कोमल होती है तभी तक उन्हें इच्छानुसार मोड़ा या ढाला जा सकता है इसलिए यदि शिक्षक इसी उम्र में बच्चों को समझा दें कि जीवन में चरित्र ही सबसे पहली और आखिरी वस्तु है और यह कि अक्षर-ज्ञान तो चरित्र-गठन का साधन मात्र है, तो मैं शिक्षकों और बच्चों, दोनों का पाठशाला में जाना सार्थक समझूँगा। मूल्यपरक शिक्षा पर श्री अरविन्द और रवीन्द्र नाथ टैगोर ने काफी जोर दिया। अरविन्द आश्रम, अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा केन्द्र, शान्ति निकेतन, डीएवी, गीता स्कूल और सरस्वती शिशु मंदिर आदि ने कई प्रयोग किये, जो काफी सफल रहे।

स्कूलों में मूल्य आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सी.बी.ई.सी ऐसी किट और किताबें ला रहा है जो शिक्षकों को इस मामले में मदद कर सके। ताजा पहल में एक किट (टेनिंग मैनुअल) से पहली से पांचवीं तक के बच्चों को नैतिक शिक्षा उपलब्ध कराया जायेगा। शिक्षाविद् दीनानाथ बत्रा के विचार में यदि भारतीय आदर्शों से ओत-प्रोत परिवार है तब वह स्वतः संस्कारक्षम होगा। उसे आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता।

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4 Comments

  1. bk mishra says:

    nice article sir

  2. lalit mohan says:

    nice writing

  3. lalit mohan says:

    nice.

  4. lalit mohan says:

    Lekhak ne bahut hi jwalant mudde par bahut gambhir tarike se prakash dala hai. Yeh baat puri tarah se sahi hai ki aaj ham shiksha ke mool uddeshya se bhatak chuke hain.. Moolroop se siksha ka uddeshya janmanas ko vicharwan, chintansheel aur samaj ke vikas ke liye apna sarvaswa nyochawar karne wala sanskari Insaan taiyar karna hota hai.. .Lekin Maikale ki shiksha padhyati manav ko Insaan na banakar ek professional banana chahati hai jisne manav ko insaniyat se bahut door kar diya hai aur .. Us par bhi aaj ke shiksha sansthan jo ab siksha ki dukanein ban gayee hain aur dushit siksha pradan kar rahe hain.. Unse pas hokar bahar nikalne wale bachche sabhi tarah se luta hua mahsoos kar rahe hain. kyonki is siksha ko grahan karne ke baad na to wo achcha professional ban pa rahe hain, insaniyat se wo bahut door ja chuke hain.. aur apne jivan se nirash frustated jeev ban kar rah gaye hain… Lekhak ko mein is vishay ko uthane ke liye badhai dena chahta hoon….aur ye asha karta hoon ki lekhak isee tarah ke jwalant muddon ko uthate rahenge aur samaj ko en nayee sakaratmak shoch viksit karne par majboor karenge…