ध्वस्त होती भारतीय न्याय व्यवस्था


अंजनी कुमार झा

12__40232705देर से न्याय मिलने के कारण लोग बाग का अब इस तंत्र से भी भरोसा उठ रहा है। ध्वस्त होते तीसरे खंभे पर भले ही उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायधीश टी.एस.ठाकुर ने आंसु बहाये पर समाधान कुछ नहीं निकल सका। प्रश्न उठता है कि क्यों शिखर पर बैठे न्याय तंत्र के मुखिये को इतना दुखी होना पड़ा? क्या नाजुक स्थिति का इलाज नहीं है? इससे पूर्व भी कई जजों ने पीड़ा व्यक्त की, किन्तु हल नहीं निकला। जब कार्य के घंटे बढाने, छुट्टियां कम करने की बात आती है तो सभी जजों का सुर एक होता है। यह चट्टानी एकता भी वैसी दिखती है जैसी दलों के विधायक, सांसद एकजुट हो जाते हैं। अब उन्हें महंगाई नहीं दिखती है। जजों की कम संख्या पर न्यायपालिका कार्यपालिका पर ठीकरा फोड़ती है। कार्यपालिका का तर्क है कि जब न्यायिक आयोग बनाने की बात हुई तो न्यायधीशों ने इसे दखलंदाजी बताते हुए इसे नकार दिया। भला कोलेजियम कौन-सा पाक-साफ है।
मामलों का द्रुत गति से निपटारा के लिए 70 हजार जज चाहिए। अदालतों में साढ़े तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं। छोटे से मामले में भी धैर्य चूकने वाले साल लग जाते हैं। जमीन-जायदाद के मुकदमे तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं। सजा होने से कहीं ज्यादा आरोपी जेल में सजा काट चुका होता है। मामले खुलने तक आरोपी वर्षों जेल में रहता है। आरोप सिध्द न होने तक वह समाज में अपराधी घोषित हो चुका होता है क्योंकि वह जेल में था। समाज के बदले बर्ताव से वह निर्दोष दोषी बन जाता है। यह देर से मिले न्याय का नतीजा है। रूल ऑफ लॉ प्रोजेक्ट के आकड़ों के अनुसार 1940-50 के दशक के मामले अदालतों में अब भी लंबित है। अदालतें 19वीं सदी के कानून को 20वीं सदी के ढ़ाचे से 21वीं सदी के विवादों के निस्तारण के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। फाइलों का बेतरतीब ढंग से रहना, कम्प्यूटरीकृत न होना, पेसकारी सिस्टम, वारंट, सम्मन की पुरानी पद्धति से न्याय में विलंब हो रहा है। रही-सही कसर वकीलों का लालच और जजों की सुविधा पूरी कर देती है। तारीख पर तारीख। घंटो मुवक्किल का इंतजार और परिणाम शून्य बटा सन्नाटा।images
कोलकाता उच्च न्यायलय द्वारा वीडियोग्राफी, दिल्ली हाईकोर्ट ने ई-कोर्ट तथा कुछ अदालतों द्वारा वीडियोकांफ्रेंसिग की सुविधा प्रदान की गई है, किन्तु ये काफी कम हैं। इसी कारण दूर-दूर से जेल में बंद आरोपियों को अदालत में लाया जाता है तो वे कोर्ट परिसर ट्रेन, वाहन से भाग जाते हैं। आधुनिक संचार तंत्र के लिए सरकार ने करोड़ो रुपये आवंटित किए हैं, किन्तु काफी धीमी गति के कारण आरोपी-वकील-कलर्क की बल्ले-बल्ले है। एक कागज की नकल निकालने में मुवक्किल के पसीने छुट जाते हैं। भ्रष्ट तंत्र नहीं चाहता है कि वीडियोकांफ्रेंसिग से सुनवाई हो। मामलों का पंजीकरण कुछ अदालतों में कम्प्यूटरीकृत हो गया है, किन्तु अधिकांश जगह मैन्युअल होता है जिसमें काफी हेरा-फेरी है। झूठे गवाहों के जरिए आरेपी बरी हो जाते हैं। थाने में रिपोर्ट लिखते ही झूठ का खेल शुरू हो जाता है। फिजूल के मुकदमों की बाढ़ आ गई है।
पूर्व मुख्य न्यायधीश लोढ़ा ने अदालतों की लंबी छुट्टियों पर सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट साल में 193 दिन, हाईकोर्ट 210 दिन और जिला कोर्ट औसत 245 दिन काम करते हैं। गुजरात में सेवानिवृत्त जजों की सहायता ली जा रही है। इलाहाबाद उच्च न्यायलय के जजों ने ग्रीष्मावकाश नहीं लेने का फैसला किया है। इससे सैकड़ो मामलों के निपटान की उम्मीद है। लोक अदालत के सुखद परिणाम सामने आ रहे हैं। गत दो दशक में 15.14 लोक अदालतों के माध्यम से सवा आठ करोड़ से अधिक मामलों का निष्पादन हुआ।
राजस्थान के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायधीश सतीश कुमार मित्तल का मत है कि सरकार ने बिजली, अदालत कक्ष, पानी, पर्याप्त जजों की व्यवस्था नहीं की है। केवल कोर्ट चलने से न्याय होने वाला नहीं है। जज होशियार हैं पर काम से दबे हैं। मजबूत न्यायपालिका के लिए अधीनस्थ कोर्ट के जज ईमानदार व सक्षम होने चाहिए। जज को किसी और से नहीं भगवान से डरना चाहिए। उनकी पीड़ा है कि कलेक्टर और एसपी न्यायपालिका को उचित सम्मान नहीं देते। सुनवाई टलवाने या हड़ताल के कारण न्याय में देरी होती है। सरकार कोर्ट की अनुमति देती है पर सुविधायें नहीं देती।
सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के समय के एक न्यायधीश के पास करीब 100 मुकदमे होते थे लेकिन आज हर जज के लिए 2600 से ज्यादा मुकदमे कतार में है। अमेरिका में एक जज के पास औसतन 81 मुकदमे ही होते हैं। उल्लेखनीय है कि 1987 में न्यायिक आयोग ने प्रति दस लाख आबादी पर जजों की संख्या दस से बढ़ा कर 50 करने की सिफारिश की थी लेकिन पालन न होने के कारण स्थिति भयावह हो गई है। आज जजों की संख्या प्रति दस लाख 16 है। मुख्य न्यायधीश टी.एस.ठाकुर ने रुधे गले से कहा है कि 1950 में सुप्रीम कोर्ट आठ जजों के साथ शुरू हुआ, तब 1215 मामले थे। एक जज पर सौ से ज्यादा मामले थे। 2014 में 31 जजों के पास 81 हजार से ज्यादा मामले हैं। देश में निचली अदालतल से सुप्रीम कोर्ट तक हर जज 2600 मामले सुनता है।
सुप्रीम कोर्ट
वर्ष लंबित मामले जज
1960 3,247 14
1977 14,501 18
1986 27,881 26

विभिन्न उच्च न्यायलयों में 38 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं। 470 पद रिक्त हैं। इस संबंध में राज्य सरकारों को कई बार पत्र भेजे गए हैं, किन्तु निष्क्रियता कायम रहने से लोगों का अदालत पर भरोसा कम हो रहा है, जबकि हकीकत कुछ और ही है जिससे आम जन फिर बेखबर है।

}

No Comments