दुनिया में बढ़ती असमानता


पंचानन मिश्रा

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इस तस्वीर को देखकर गरीबी पर आंसू बहाने की बजाए गहरी चिंता होनी चाहिए। भारतीय प्रजातांत्रिक गणराज्य की कल्पना में सभी तबकों में समाजिक बराबरी बनाने की संकल्पना की गई थी, लेकिन आजादी के छह दशक बाद भी उस संकल्पना पर हम अभी तक खरे नहीं उतर सके हैं। अमीरों और गरीबों के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। और इसकी बानगी सामाजिक संस्था ऑक्सफैम की एक ताजा रिपोर्ट में है। इसमें सामने आया है कि दुनिया के एक फीसदी अमीर लोगों के पास इतना पैसा है जितना बाकी 99 फीसदी लोगों के पास है। इसके साथ ही रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि 2016 तक यह आंकड़ा भी पार हो जाएगा और उन एक फीसदी लोगों के पास 99 फीसदी लोगों से भी अधिक धन हो जाएगा। हो।

गरीबी की परिभाषा

वैश्विक स्तर पर-वर्ल्ड बैंक की तरफ से गरीबी को सभी देशों के लिए एक सा परिभाषित किया गया है। कोई व्यक्ति अगर कहीं भी 1 डॉलर 25 सेंट यानि लगभग 60 रुपये से कम में रोज का गुजारा कर रहा है तो वह गरीब कहलाएगा।

भारत में गरीबी के पैमानों को लेकर भी कई तरह के सवाल उठते रहे हैं। योजना आयोग के आंकड़ों ने कई बार समाज में रोष तक पैदा किया है। सी. रंगराजन की अध्यक्षता वाली एक समिति ने देश में गरीबी के स्तर के तेंदुलकर समिति के आकलन को खारिज कर दिया। रंगराजन के मुताबिक देश में हर 10 में से 3 व्यक्ति गरीब है। रंगराजन समिति ने शहरों में प्रतिदिन 47 रपये से कम खर्च करने वाले को गरीब माना जबकि तेंदुलकर समिति के मामले में ये आंकड़ा 33 रुपये था। ये दिखाता है कि आंकड़ेबाजी यथार्थ से कितनी दूर है।

असल सवाल

लेकिन असल सवाल तो बराबरी का है। ऐसा क्यों नहीं है कि देश में पैदा होने वाले हर व्यक्ति को न्यूनतम सहूलियतें तो हासिल हों। चुनावों में आपको ऐसे वादे और दावे सुनने को मिल जाएंगे जिसमें सभी को शिक्षा और स्वास्थ्य की बातें सुनने को मिलेंगी लेकिन कभी भी अगर किसी की नहीं सुनी जाती तो वो गरीब है। यूरोप में संपन्नता है तो सरकारें अपने नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराना सुनिश्चित करती हैं।

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