दत्तोपंत ठेंगड़ी


डॉ. ओम प्रकाश मिश्र

भारतीय चिन्तनधारा के अतुलनीय मनीषी दत्तोपंत ठेंगडी; भारतीय अर्थचिंतन, समाज व्यवस्था एवं संपूर्ण राष्ट्र के लिये एक ऐसे संत के रूप में अवतरित हुए थे, जिनसे पूरा राष्ट्र-समाज प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है। वे एक ऐसी सरणि के संत तुल्य विचारक थे, जिन्होंने अपने प्रचार का लोभ कभी नहीं रखा । वे मात्र राष्ट्र व समाज के प्रति पूर्णतः समर्पित थे ।

कम लोगों को ज्ञात होगा कि महान विचारक दत्तोपंत ठेंगड़ी 1964 से 1976 तक राज्यसभा के सदस्य थे । 1968 से 1970 तक वे राज्यसभा उपाध्यक्ष मंडल के सदस्य रहे । उन्होंने हिंदी में 35 पुस्तकें, अंग्रेजी में 10 पुस्तकें व मराठी में 3 पुस्तकें लिखीं । एक दर्जन पुस्तकों की प्रस्तावना लिखी तथा उनके सैंकड़ों भाषण/उद्बोधन अविस्मरणीय थे । भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें प्रतिष्ठित पद्मभूषण जैसे उच्च अलंकरण से सम्मानित करने का प्रस्ताव जनवरी 2003 में उनकी स्वीकृति हेतु भेजा था, जिसे उन्होंने 28 जनवरी 2003 के पत्र द्वारा तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति को अत्यन्त विनम्रपूर्वक स्वीकार नहीं किया । वस्तुतः ऐसे लोग दुर्लभ हैं ।

भारत में वेदान्त के जिस आर्थिक दर्शन को स्वामी विवेकानन्द चरितार्थ देखने के इच्छुक थे, उसकी तार्किक परिणिति एकात्म मानव दर्शन के रूप में हुई । दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने 1970 फरवरी को दिए गये व्याख्यान में कहा था कि श्हमें सभी विचारधाराओं पर मनन करना है तो उनका अंधानुकरण न करते हुए उनके गुण-दोषों को हमें देखना होगा उनमें जो कुछ श्रेष्ठ है, उसे अंगीकार करने में हमें कोई आपत्ति नहीं है ।

अपने यहाॅं यह माना गया है कि व्यक्ति का संपूर्ण विकास होना चाहिए और उसे पूर्ण सुख प्राप्त होना चाहिए । अतः इस तरह की सामाजिक, आर्थिक रचना होनी चाहिए जिससे संपूर्ण सुख और विकास प्राप्त हो सके ।

भारत में व्यक्ति को भी मान्यता है और समाज को भी । दोनों में परस्पर कोई विरोध नहीं । जहाॅं यह सिद्वान्त माना गया कि प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण सुख और संपूर्ण विकास प्राप्त हो- इस तरह की सुविधा समाज को देनी चाहिए ।

राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता में विरोध न होकर वह अन्तराष्ट्रीयता का आधार बन जाता है । कोई व्यक्ति राष्ट्रीय है, इसलिए अन्तराष्ट्रीय न हो और अन्तरराष्ट्रीय है तो राष्ट्रीय न हो, ऐसा हमारे यहां नहीं दिखता ।

अपने यहाॅं जो रचना दी गयी है वह सनातन रचना है, नवीन नहीं है । इसे कुंडलित, सर्पिल या उत्तरोत्तर वृद्वि करने वाली (Spiral) अखण्ड मण्डलाकर रचना कहा जाता है । इसका प्रारंभ व्यक्ति से होता है और व्यक्ति को लेकर व्यक्ति से संबंध न तोड़ते हुए, उसी से संबंध बनाये रखते हुए अगला घेरा परिवार का है । उसे खण्डित न करते हुए उससे बड़ा घेरा समाज का है उसे खण्डित न करते हुए उसी से संबद्व अगला घेरा राष्ट्र का है । सातत्य रूप में सबसे ऊपर का घेरा मानवता का है और चरम शिखर पर चराचर विश्व का घेरा है ।

विश्व के दक्षिण भाग में बसे हुए देश सभी प्रकार के प्राकृतिक संपदा से पूर्ण होते हुए भी उत्तर के देशों के द्वारा शोषित होते हैं । विश्व अर्थव्यवस्था पश्चिम द्वारा नियंत्रित होती है । यह शोषण रहित व्यवस्था न होकर बाजारवाद पर आधारित है, इसमें परिवर्तन होना चाहिए । पॅूंजीवादी अर्थव्यवस्था और साम्यवादी अर्थव्यवस्था को त्यागकर एक तृतीय विकल्प (थर्ड वे) भारत को प्रस्तुत करना होगा ।पश्चिमीकरण आधुनिकीकरण नहीं है। पश्चिम के मापदण्डों द्वारा भारत जैसे प्राचीन देश को तोलना सर्वथा ठीक नहीं है ।

पश्चिमी अवधारणा के अन्तर्गत व्यक्ति, समाज, राष्ट्र एवं विश्व स्वतंत्र सत्ता है । भारतीय अवधारणा में व्यक्ति से पूरा जगत् एक ही सत्ता की अभिव्यक्ति है ।

इस प्रकार ठेंगड़ी जी ने समष्टि (MARCO) Or (MICRO) के मध्य तादात्म्य स्थापित किया है । उन्होंने बीज, अंकुर व पौधे के उदाहरण से इसे समझाया है । जैसे बीज से अंकुर और अंकुर से पौधा निकलता है तथा वहाॅं से शाखाएं एवं पल्लव निकलते हैं । उसमें से फूल और फल निकलते हैं । हर एक का आकार अलग है । अंकुर अलग है, पौधा अलग है, फूल अलग हैं । एक दूसरे का कोई संबंध नहीं दिखता ।
प्रतीत होता है कि यह अत्यन्त अराजक स्थिति (chaotic condition) है । लेकिन यह अराजक न होकर एक विकासक्रम है । बीज और अंकुर में कोई विरोध नहीं । इन सब में कोई विरोध नहीं है । सबसे छोटी इकाई से लेकर सबसे बड़ी इकाई तक एकात्म (Integration) है। सभी अपने-अपने दायरे में सत्य है । कोई एक दूसरे का विरोध नहीं करता । यह भारतीय विचार -पद्धति की विशेषता है ।
दत्तोपंत ठेंगड़ी जी भारत की व्याधियों से पूर्ण परिचित थे । भारतीय समाज में व्याप्त विखण्डनकारी प्रवृत्तियों पर उनकी दृष्टि थी । जातिवाद /जातीयता एक ऐसा रोग समझते थे कि उसका निदान आवश्यक है ।
जातिवाद की यह बुराई काफी पुरानी है। आर्थिक आधार पर कभी इसका जन्म हुआ था, परन्तु आज ये जातियाॅं व्यवसायगत न रहकर जन्म के आधार पर हो गयी है । हमारा जातिगत द्वेष, वैमनस्य और जातियाॅं -उपजातियाॅं बढ़ती ही जा रही है । किन्तु सबको हमें स्मरण कराना होगा कि हम सब एक ही समजा और एक ही भारत राष्ट्र के अंग है। इनके उत्थान-पतन, वैभव-पराभव, यश-अपयश के हम सब सहभागी है । विभिन्न जातियाॅं -उपजातियाॅं समाज के विभिन्न अवयव हैं । शरीर के सभी अवयव एक स्थान पर आना चाहे तो शरीर टूट जायेगा । एक अवयव दूसरे अवयव का काम नहीं कर सकता । इसका यह अर्थ नहीं कि शरीर के सभी अवयव मिलकर एक संघ (Federation) है । यदि शरीर के किसी अंग पर चोट होती है तो सारा शरीर कष्ट का अनुभव करता है। यही भाव सभी जातियों के बीच उत्पन्न करना है । एक का दुःख सबका दुःख है और एक का सुख सबका सुख है । यह भाव आज समाप्त होता जा रहा है ।
प्रौद्योगिकी (Technology) के विषय में उनके विचार भारतीय परिवेश को ध्यान में रखने के थे । जहाॅं एक श्रम बहुल अर्थव्यवस्था हो, वहाॅं अन्धाधुन्ध मशीनीकरण को वे बिल्कुल नहीं पसन्द करते थे । उन्होनें प्रो. ई.एक.शुमाखर के विचारों को श्रेष्ठ माना है ।
पाश्चत्य तंत्र से एक व्यक्ति को रोजगार देने के लिये अधिक पॅूंजी लगती है और यदि उचित तकनीक (Appripriate Technology) अपनायी जाये तो वही काम कम पूॅंजी में हो सकता है । डाॅ. शुभाकर की यह निश्चित धारणा है, बेराजगारी न बढ़ाकर, रोजगार-बढ़ाकर, अधिक उत्पादन करना हमारी आज की आवश्यकता है । एक रूपये की लागत से रोजगार बढ़ाने के बावजूद क्षमता (Efficiency) पर इसका विपरीत परिणाम न हो, यह देखने वाले तंत्र को इण्टरमीडिएट (intermediate) या उपयुक्त तकनीक (Appripriate Technology) कहा गया है । इसी सिद्वान्त के आधार पर अपने देश के अनुकूल नयी तकनीक का विकास किया जा सकता है ।

ठेंगड़ी जी सरलता की प्रतिमूर्ति थे । उनका जीवन अत्यन्त सादा था । एक कार्यकर्ता के अनुसार श्नहाने के बाद ठेंगड़ी जी ने मुझसे सुई धागा लाने के लिये कहा । मैंने पूछा क्या करेंगे सुई धागा तो उन्होंने पहनी हुयी बनियान दिखायी जो एक-दो जगह से उधड़ गयी थी और उनसे आग्रह किया कि लाइए मैं सिल दूूॅं । उन्होंने मनाकर दिया । स्वयं सुई धागा लेकर अपनी बनियान सिली। श्


बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर पर उनकी पुस्तक ष्डाॅ. अम्बेडकर और सामाजिक क्रान्ति की यात्राष् में उन्होंने डाॅ. अम्बेडकर के जीवन, विचारों व राष्ट्रभक्ति की विशद व्याख्या की है:- श्एक जुझारू पत्रकार, अडिग नेतृत्व का पराक्रमी संगठनकर्ता, सामाजिक अनुभूति रखनेवाला अर्थशास्त्री, कुशल विधिवेत्ता, भारत का संविधान बनानेवाला आधुनिक स्मृतिकार, दलित समाज को राजनीतिक शक्ति के रूप में विकसित करनेवाला राजनेता, कर्तव्यतत्पर व कर्तृत्ववान् प्रशासक, बौद्ध धर्म का युगानुकूल रूप प्रस्तुत कर धर्मचक्र प्रवर्तन करनेवाला धर्मवेत्ता, ऐसे बहुविध पहलुओं से डाॅ. अम्बेडकर के सार्वजनिक व्यक्तित्व व तूफानी जीवन प्रवाह का दर्शन हम लोगों ने किया । अनेक विचारकों, अभ्यासकों ने डाॅ. अम्बेडकर को सार्थक महामानव कहा है …………..ऐसे कुछ उदाहरणों से ध्यान में आता है कि बाबासाहब के मन में भावना, सार्द्रता, भावुकता, मानवीयता तो थी, पर वह उनके कर्तव्यपालन व मूल्यनिष्ठाओं से समझौता न करने वाली थी । यह सही है कि वे भगवान् नहीं थे, मानव थे, परन्तु यह भी सही है कि ऐसी कठोर कर्तव्यपरायणता से स्वीकार किये सार्वजनिक जीवन के पथ्य के कारण ही वे मानव से महामानव बने।

दत्तोपंत ठेंगड़ी जी व्यक्ति निर्माण व राष्ट्र निर्माण, दोनों के लिये संस्कारों की महत्ता प्रतिपादित करते हैं । नवम्बर 1978 में बंगलौर में दिए गये भाषण में वे कहते हैं –

श् अतः वाह्य सामाजिक -आर्थिक ढ़ांचा अधिक निर्णायक घटक नहीं है, बल्कि आन्तरिक ढ़ांचा मानव मस्तिष्क है जो अधिक निर्णायक है । यह वस्तुपरक नहीं है बल्कि व्यक्तिपरक है और जब तक मानव मस्तिष्क को उपयुक्त संस्कार नहीं दिए गये हैं, हम चाहे जो भी सामाजिक आर्थिक ढ़ांचा बना दें वह ज्यादा समय चलने वाला नहीं है । …………..कोई भी नया ढ़ांचा तब तक स्थायी या दीर्घकालिक नहीं हो सकता, जब तक कि व्यक्ति के मस्तिष्क को उचित प्रकार के संस्कारों से समृद्व न कर दिया जाय ।श्

ठेंगड़ी जी जैसे महान व्यक्तित्व से मुझे तीन बार दर्शन करने व मिलने का सौभाग्य मिला था । एक बार वे मेरे इलाहाबाद निवास पर मेरे स्व. पिता श्री शीतला प्रसाद मिश्र से मिलने आये थे । दो बार दिल्ली में 129, नार्थ एवेन्यू पर । परन्तु मैं तब तक महामनीषी के कृतित्व व व्यक्तित्व से अच्छी तरह परिचित न हो सका था । ठेंगड़ी जी सदृश्य सरल, विद्वान, राष्ट्रभक्त विचारक विरले ही हुये है ।

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